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Thursday, November 24, 2011

तुम्हारे सिर पे ही हम शांति का ताज़ धरते है


तेरे कर्मो के कुछ छींटे हम पर भी पडेंगे ही
मज़हबी ज़ुनूं में अंधे यहां पर भी लडेंगे ही
ये दौर-ए-एटम है कुछ भी बच ना पायेगा
नस्लें खत्म हो जायेंगी इंसा छटपटायेगा
टाल सकता है तो अब भी टाल दे होनी
ना करे ईश्वर कहीं घट जाये अनहोनी
हमें भी रंज़ होगा क्योंकि तू हिस्सा हमारा है
हज़ारों साल से तो एक ही किस्सा हमारा है
बंटी धरती बंटी नदियां बंटे दिल भी हमारे हैं
मगर अब क्या करें ज़ब एक ही पुरखे हमारे हैं
लिखते-सोचते ये सब कलम भी कांपमगर फौलाद हैं हम ज़ुल्म यह भी झेल जायेंगे
इंसानियत के लिये ज़ां पर खेल ज़ायेंगे
क्योंकि धोखे ज़ुल्म दहशत से हम परहेज़ करते हैं
हम तो युद्ध में ही नेज़े अपने तेज़ करते हैं
विषैले तीर हाथों से बढकर तोड देते हैं
सीने अडा देते हैं तोपें मोड देते हैं
अतः अब बंद कर दे नफरतों की इस सियाही को
बढकर रोक ले इस दौडकर आती तबाही को
हर किसी की बस इसमें ही भलाई है
जिसमे जल रहा है आग तूने ही लगाई है


तुम्हारे सिर पे ही हम शांति का ताज़ धर
चलो मिल-ज़ुल के हम दोनो अब इसको बुझाते हैं
चमन फूल खुशियों के मिलकर    हम सजाते हैं
अमन के दौर फिर आज़ से आगाज़ करते हैंते है जाती है
मज़हबी सोच आखिर में क्या-क्या गुल खिलाती है?
तेरे पापों का कुछ बोझा हम भी हम भी तो उठायेंगे
ज़डों को नष्ट होते देख हम भी तिलमिलायेंगे
नफरतों के दाग यहां पर भी पडेंगे ही
मज़हबी ज़ुनूं मे अंधे यहां पर भी लडेंगे ही

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