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Sunday, January 8, 2012

प्रथम परमाणु बम के विस्फ़ोट को देखते हुए


मकबूलजी
आज आपकी ग़ज़ल का रसास्वादन किया। मज़ा आ गया। खासकर के इन दो शेरों में-
बिजलियाँ, काली घटा, चाँद से रौशन चेहरा
फिर सुनाएंगे कभी, चैन से अफ़साने को।

उम्र तो बीत चली, इंतज़ार में अपनी
कब क़रार आएगा, साक़ी तेरे दीवाने को।
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घनश्याम वशिष्ठजी
क्या फड़कता हुआ शेर कहा है। सुभानअल्लाह
ख्वाब टूटा होश में आया तुम्हें देखा तभी
क्या जलाल ए हुस्न था के होश मेरे उड़ गए 
घनश्याम वशिष्ठ
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आदरणीय श्री विश्वमोहन तिवारीजी,
भारतीय संस्कृति के गौरवमयी खजाने में छिपे अनमोल हीरे-जवाहरातों को आप जिस शाइस्तगी से जनमानस के सामने ला रहे हैं यकीनन वो एक महती अनुष्ठान है। आपको साधुवाद
१६ जुलाई १९४५ के न्यू मैक्स्को में ट्रिनिटी परीक्षण में‌ हुए प्रथम परमाणु बम के विस्फ़ोट को देखते हुए भावप्रवणता में उनके मुख से गीता के दो श्लोक अचानक फ़ूट पड़े :
 "यदि आकाश में एक सहस्र सूर्यों की कौँध एक साथ भभक उठे, ऐसी दीप्ति उस सर्वशक्तिमान की होगी। अब मैं तो स्वयं काल हो गया हूं, विश्व का विनाशक"
इसी आशय का कोरस 'डाक्टर एटोमिक'ओपेरा ( जान एडम्स) के अंक '' दृश्य '' में गाया है, संगीत लेखन प्रसिद्ध 'पीटर सैलर्स ने किया है।
(स्रोत : ' द् आइ आफ़ शिव' : ईस्टर्न मिस्टिसिज़म एन्ड साइन्स' - अमोरी द रैन्कुर)
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श्री भगवान सिंह हंसजी
आपने मेरे आलेख को खूब डूबकर पढ़ा है। और उसमें निहित विसंगति और वक्रोक्ति को बड़ी बारीकी से लेख में से निकालकर समीक्षा की प्लेट में रख दिया है। आपकी बहुमूल्य टिप्पणी हेतु बधाई।
श्रद्धेय श्री नीरवजी
आपका कुंए नेकी का डस्टबिन नामक हास्य-व्यंग्य बहुत ही अच्छा लगा| पढ़कर मजा आ गया| पंडितजी को बहुत-बहुत बधाई | प्रणाम | बाकई आज व्यवसायीकरण और गैरजिम्मेदारी
  निभाती राजनीति ने नेकी के लिए जगह ही कहाँ छोड़ी है | और तो और कहीं कहाँ कूंए उस नेकी के लिए एक आशियाना मिल जाते थे वे सब भी एक कचरागृह बना दिए है. एक तो नेकी कहीं  है ही नहीं  और कहीं मिल भी जाए अपने दर-किनारे तलाशती तो वह भी एक बदबूदार डस्टबिन में पड़ी नजर आती है.| साहब! कितना सटीक यह हास्य-व्यंग्य है और इस कतरदारसमय की  युगीन कुंठा पर खरा उतरता हैउस नेकी को तलाशिये , उसको कूड़ा मत बनने दीजिये| यह ही हमारे जीवन का जीवंत अवदान है |
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