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Sunday, January 8, 2012

मंत्र जप’




पंडित दयानंद शास्त्री
जिस शब्द में बीजाक्षर है, उसी को ‘मंत्र’ कहते है। किसी मंत्र का बार-बार उच्चारण करना ही ‘मंत्र जप’ कहलाता है। लेकिन
प्रश्न यह उठता है। कि वास्तव में मंत्र जप क्या है? जप से क्या परिणाम निकलता है?
हमारे मन को दो भागों में बांटा जा सकता है- 1. व्यक्त चेतना expressedConsciousness तथा 2. अव्यक्त चेतना Latent consciousness
हमारा जो जाग्रत मन है, उसी को व्यक्त चेतना कहते हैं। अव्यक्त चेतना में हमारी अतृप्त इच्छाएं, गुप्त भावनाएं इत्यादि विद्यमान हैं। व्यक्त चेतना की अपेक्षा अव्यक्त चेतना अत्यन्त शक्तिशाली हैं। हमारे संस्कार, वासनाएं- यह सब अव्यक्त चेतना में ही स्थित होते हैं। किसी मंत्र का जब जप होता है, तब अव्यक्त चेतना पर उसका प्रभाव पड़ता है। मंत्र में एक लय होती है, उस मंत्र ध्वनि का प्रभाव अव्यक्त चेतना को स्पन्दित करता है। मंत्र जप से मस्तिष्क की सभी नसों में चैतन्यता का प्रादुर्भाव होने लगता है और मन की चंचलता कम होने लगती है। मंत्र जप के माध्यम से दो तरह के प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
1. मनोवैज्ञानिक प्रभाव Psychological effects
2. ध्वनि प्रभाव ; Sound Effects – मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा ध्वनि प्रभाव के समन्वय से एकाग्रता बढ़ती
है और एकाग्रता बढ़ते से इष्ट सिद्धि का फल मिलता ही है। मंत्र जप का मतलब है इच्छा शक्ति को तीव्र बनाना। इच्छा शक्ति की तीव्रता से क्रिया शक्ति भी तीव्र बन जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप इष्ट का दर्शन या मनोवांछित फल प्राप्त होता ही है। मंत्र अचूक होते हैं। तथा शीघ्र फलदायक भी होते है।
मंत्र जप और स्वास्थ्य- लगातार मंत्र जप करने से उच्च रक्तचाप, गलत धारणायें, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं। मंत्र जप का साइड इफेक्ट यही है। मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दीप्त करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है। ‘क्ली’, ‘ह्नी’ इत्यादि बीजाक्षरों को एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर हृदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व उनके विकार नष्ट होते हैं। जप के लिए ब्रहा मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय परा वातावरण शांन्ति पूर्ण होता रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहल या शोर नहीं होता। कुछ विशिष्ठ साधनाओं के लिए रात्रि का समय अत्यन्त प्रशस्त होता है। गुरू के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए। सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है।
अपूर्व आभा- मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे पर एक अपूर्व तेज छलकने लगता है, चेहरे पर एक अपूर्व आभा आ जाती है।
आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वस्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगंे, तो इसके परिणाम स्वरूप मुखमण्डल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही।
प्रवक्ता से साभार
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