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Sunday, January 8, 2012

आप छात्र जीवन में दुर्दांत भावुक कवि थे

श्री अरविंद पथिकजी
आपकी नज्म में जो लफ्जों की सौंधी महक है वह उम्र के कच्चे मन की अमराई में  पढ़नेवाले को बरबस ही खींच ले जाती है। नज्म का जो कविता संसार है वो रोमानी होते हुए भी यथार्थ से गलबहियां करता दिखता है। अब ऐसी नाजुक मिजाज़ नज्में नहीं लिखी जा रही हैं। जिस दौर में आपके शायर मन ने आंखें खोली होगीं वो दौर साहिर लुधियानवी,कैफ भोपाली और फैज अहमद फैज की महक से गमकता कविता का दौर था। इसलिए आप इतनी अच्छी नज्म लिख सके। वह भी छात्र जीवन में। वैसे जिंदगी का सबसे अछ्छा लेखन छात्र जीवन में ही होता है। समय के साथ संवेदनाओं की पीतल भी बूढ़ी हो जाती है। बधाई..
तेरे तसव्वुर में भरते हैं नये-नये रंग
तेरी यादों के फूल हर वक्त झरते हैं
मेरे दोस्त इस तनहाई पे अफसोस न जता
तनहाई में ही तो मैं बात तुझसे करता हूं
किसी और का हो जाऊं ये मशवरा ना दे
अब तो इस खयाल से भी डरता हूं
ज़िंदगी को पूरी शिद्दत से जिया है मैने
मैं टुकडे-टुकडे जीने का तरफदार नहीं
सपनों के खंडहर में गुज़ारी नहीं राते जिसने
ज़माने की रंगीनियों का वह हकदार
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