Search This Blog

Sunday, January 8, 2012

कचरा निरस्त हो जाता है।कबीर को हाशिये से केंद्र मे आने में ५०० साल लगे


पिछले दिनों नीरव जी के साक्षात्कार के कुछ अंश आपके सेवार्थ सौंपे थे आज कुछ अन्य प्रश्न और उनके उत्तर प्रस्तुत हैं--------
अरविंद पथिक--------विद्वता के केंद्र में स्थित होने से आपका आशय क्या मौलिकता से है क्या?पर क्या कोई भी रचनाकार पूर्णतया मौलिक होने का दावा कर सकता है,यहां तक कि 'मानसके तुलसी,भी वाल्मीकि की पुनरावृत्ति नहीं हैं क्या?पर इससे तुलसी का महत्व कम  तो नहीं हो जाता?

पं०सुरेश नीरव-----विद्वता के केंद्रनिष्ठ होने से मेरा तात्पर्य उसका अपने मूल से जुडा होना है।मूल का अर्थ है जड।इस मूल से ही मौलिक बना है।मूलतःयही बात सत्य है।मूल कभी अमौलिक नही होती और न कभी किसी मूल की प्रतिकृति।संपूर्ण विश्व में मनुष्य के  एक अंगूठे के निशान जैसा दूसरा नहीं मिलता।ना ही कोई एक पत्ता या फूल किसी दूसरे से मिलता जुलता है।संपूर्ण सृष्टि मौलिकता का विस्तार है।एक जैसी चीजें फैक्ट्रियों में ढाली जा सकती हैं प्रकृति में नहीं।प्रकृति की तो प्रकृति ही विभिन्नता है।मेरे कहने का अर्थ यह है कि जो मौलिक नहीं वह प्राकृतिक भी नहीं।प्लास्टिक के फूल एक जैसे हो सकते हैं,प्राकृतिक फूल  नहीं।
   लेखन भी लेखक की प्रकृति है।जैसा कि मैं कह चुका हूं कि प्रकृति हमेशा मौलिक होती है,इसलिये सार्थक लेखन वही होगा जो मौलिक होगा।हम इसे यूं भी कह सकते हैं कि भले ही संसार का सारा संगीत केवल सात सुरों में बंधा हो ,मगर गायक अपनी मौलिकता के साथ इसमें उपस्थित होता है।जो नहीं हो पाता वह मिमक्री करता है,पैरोडी करता है।लेखन में भी भाषा के व्याकरण और विषयवस्तु के समान होने के बावजूद रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति की प्रस्तुति में मौलिकता बरकरार रखता है। जहां तक आपने तुलसी और वाल्मीकि के माध्यम से पुनरावृत्ति का जो प्रश्न उठाया है तो हमें यह समझना होगा  कि राम के चरित्र को तुलसी और वाल्मीकि दोनो ने ही अपने लेखन की विषय-वस्तु भले  ही बनाया हो पर अभिव्यक्ति के स्तर पर दोनों ही मौलिक हैं।जो मौलिकता के प्रश्न को गंभीरता   से नहीं लेते उनका लेखन भले ही मौलिक न हो मगर अपराध मौलिक है।क्योंकि मौलिकता पर प्रश्नचिह्न लगाने का दुस्साहसिक कुकृत्य इससे पहले कभी किसी ने नहीं किया।
अरविंद पथिक----------फिर अच्छे मौलिक लेखक हाशिये पर क्यों हैं?
पं० सुरेश नीरव--------- मौलिकता ही मूल्यता है।मूल्य निर्धारण में बाजार का नियम काम करता है।सस्ती चीज बिकती है। महंगी के खरीदार कम हैं।मौलिक लेखक भी मूल्यवान होता है।इसलिये वह सार्वजनिक बाज़ारों के शो रूम का प्रदर्शन पदार्थ नहीं बन पाता।लेकिन समय की की छलनी जब छानती है तो जो छनकर आता है वह मूल्यवान ही होता है।,सार्थक ही होता है।कचरा निरस्त हो जाता है।कबीर को हाशिये से केंद्र मे आने में ५०० साल लगे।पीपा और मलूकराम   को अभी आना है।लेकिन वे आयेंगे ही।यूम भी मुख्यधारा के साथ बहना कोई तैराकी -पराक्रम नहीं।पराक्रम मुख्यधारा के विपरीत तैरने में है।इसलिये वह किनारे किनारे तैरता है।पर वही अपने अस्तित्व के साथ कहीं पहुंच पाता है।डूबता  भी वही है क्योंकि डूबने के लिये भी तो ज़िदगी चाहिये।----------------------------------------------------- (क्रमशः)
Post a Comment