Search This Blog

Tuesday, January 10, 2012

महेश चंद्र पुनेठा की कवि‍ता-

बर्फबारी
महेश चंद्र पुनेठा
10 मार्च, 1971 को उत्‍तराखण्‍ड के सीमांत जनपद पि‍थारोगढ़ के सि‍रालीखेत गाँव में जन्‍में युवा कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा की कवि‍ता-
बर्फ उतर रही है भू पर
फर…फर…फर…
धीरे…धीरे…धीरे…
कविता उतर रही है जैसे
कागज पर चुपके…चुपके
बर्फ के फाहे गिरते
जैसे सेमल के पेड़ से
झड़ रही हो रूई
बदल रहा है भू दृश्य
बर्फ के पत्थर
बर्फ के टीले
बर्फ के पहाड़
बर्फ के फूल
बर्फ की छतें सफेद
निस्तब्धता फैली चारों ओर
सो गई हो प्रकृति
जैसे बर्फ की रजाई ओढ़
मसूरी/नैनीताल जैसे हिल स्टेशनों में
बर्फवारी की लुत्फ लेने
हफ्तों पहले से
बुक कराये गये होटलों से
निकल पड़े होंगे टूरिस्ट
गर्म कपड़ों में लदे-फदे
चमका रहे होंगे फ्लैश
बना रहे होंगे बर्फ की मूर्तियाँ
फेंक रहे होंगे बर्फ के गोले
एक-दूसरे पर
पर यहाँ
दूध वाला कर रहा है इंतजार
बर्फवारी रुकने का
देख रहा है बार-बार
आसमान की ओर
मौसम के खुलने-घिरने की तरह
बदल रहे हैं भाव
उसके चेहरे पर
शाम की रोटी की चिन्‍ता
साफ-साफ पढ़ी जा सकती है
उसके आँखों की डोरों पर।
बोचड़ उतार रहा है
बकरी की खाल
बर्फबारी में ही
सिर पर बंधे गमछे से
कानों को
ढकने का असफल प्रयास करते हुए
जो बार-बार
हट जा रहा है कानों पर से।
और लछिमा
कर रही है गोठ-पात
निपटा रही है घर-भर के काम
काँपते-सिकुड़ाते
बीच-बीच में
बर्फाये हाथों को
सगड़ को दिखाते हुए
बर्फ उतर रही है भू पर
धीरे…धीरे…धीरे…
फर ..फर…फर…।
अनुराग शर्मा ने ये कविता मेल पर भेजी है।
Post a Comment