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Friday, February 24, 2012

जोड़-जोड़कर


ग़ज़ल
ग़ज़लों में जी रहा हूं मैं अपने को जोड़कर
लफ्जों में आंसुओं की जगह छोड़-छोड़कर

गुमनाम ही रहेंगे ये पत्थर तो हाथ के
बिखरूंगा कांच-सा मैं खनक रोज़ छोड़कर

सोचा ही था कि तुझ पे मैं कोई ग़ज़ल कहूं
अल्फाज़ आ रहे हैं हाथ जोड़-जोड़कर

एहसास में हैं सिलवटें माथे पे है शिकन
निकले हैं ख्वाब नींद को यूं तोड़-तोड़कर

आखिर में उसने यादों की माला बना ही ली
अश्कों के मोतियों को कहीं जोड़-जोड़कर।
पंडित सुरेश नीरव



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