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Tuesday, October 16, 2012

गुरुदेव से मेरी पहली मुलाक़ात.....

कविताएँ मै पहले भी लिखा करता था. बड़े व्यक्तित्वों का सुखद सानिध्य मुझे पहले भी प्राप्त था. पहले भी कुछ लोग मुझे मेरे काम के लिए जानते थे. इन्टरनेट पर मेरे कई मित्र बने. उनमें कई बेहद बड़े कवि भी हैं. उन्ही में से एक व्यक्ति जिनका सम्मान मै आज अपने बड़े भाई कि तरह करता हूँ, हैं अरविन्द पथिक जी. इन्टरनेट पर अपनी एक दो कविताओं कि लिंक मैंने उनको दी, जिसे सुनकर उन्होंने मुझे अपने अनुज की तरह सौहार्द्र दिया. बातें आगे बढ़ी तो उन्होंने मुझे अपने कवि कुनबे के बारे में बताया जिनके पितामह है "पंडित सुरेश नीरव". मैंने आपका नाम पहले भी सुना था. इन्टरनेट पर भी आपको देखा था. लेकिन उसी तरह जैसे मैने हरिवंश राय जी को या प्रेम चंद जी को देखा पढ़ा था. बहुत तीव्र इच्छा होने के बाद भी मै अरविन्द भैय्या से नही कह सका कि मै नीरव जी से मिलना चाहता हूँ क्योंकि मै इस बात से डरता था कि एक 'बहुत कुछ' एक 'कुछ नही' से कैसा व्यवहार करेगा?
एक दिन शाम को यूँ ही नेट पर बात करते हुए अरविन्द भैय्या ने मुझसे पूछा की फ्री में पढोगे? मै ले चलूँगा. बहुत अजब सा प्रश्न था. मैंने जीवन में कभी फ्री में नहीं पढ़ा था. लेकिन बात खोदने पर पता चला कि फ्री का अर्थ केवल बिना पैसे के था. पैसो के बदले मुझे सुरेश नीरव जी से मिलने का जो सौभाग्य प्राप्त होने वाला था उसके आगे २-४ हज़ार रुपयों की क्या कीमत? मैने झट हाँ कर दी. शाम को मै अपनी मोटरसाइकिल से अरविन्द जी से मिलने पहुच गया. वाहन से वो मुझे अपने घर ले गए. ऐसा एक पल को भी नही लगा कि ये उनकी और मेरी पहली मुलाक़ात है. अरविन्द जी किसी भी तरह की औपचारिकता का पालन नहीं करने देते. पानी पीने के बाद हम दोनों उनकी गाडी में बैठ कर गुरुदेव के निवास स्थान की तरफ बढे. उन्होंने मुझे बताया कि कभी इसी तरह मेरी मुलाक़ात नीरव जी से हुई थी. तब तुम्हारी जगह मै था और मेरी जगह वो थे. सुनकर एक अजीब सी खुशी हुई कि वाकई इतिहास अपने आपको दोहराता है. रास्ते में कुंवर 'बेचैन' जी भी साथ आ गए. वो भी एकदम सरल स्वभाव के. बच्चे की सी मासूमियत उनके आचरण में.

खैर, हम गुरुदेव के निवास पर पहुंचे. मै मन ही मन सोच रहा था कि उनके चरण स्पर्श करूँ? या गाडी का दरवाज़ा उनके लिए खोलूं? या...

इसी उधेड़बुन में था कि गुरुदेव गाडी के समीप आ पहुचे. मैंने झट से गाडी से उतर के उनके पैर छुए और दरवाज़े के पास आकार खड़ा हो गया. अरविन्द भैय्या ने खुद ही मेरा परिचय करवाया कि ये लड़का बहुत अच्छी कविता पढता है, फेसबूक पर फलां करता है और छात्र है. केवल छात्र होना किसी भी कवि के लिए अभिशाप की तरह होता है. मैंने अक्सर अनुभव किया है की बड़े लोग आपको तब तक कवि नहीं मानते जब तक अप किसी सरकारी दफ्तर में उच्च पद पर आसीन न हों या, पत्रकारिता से किसी न किसी रूप में न जुड़े हों. लेकिन गुरुदेव ने कहा "बहुत अच्छा" और उसके बाद मेरे बारे में पूछने लगे मुझसे. उसके बाद उन्होंने मेरा जो परिचय आने वाले बाकी लोगों से करवाया मै खुद हैरान रह गया. मेरा पद उन्होंने नहीं बदला, न कोई अतिशयोक्ति की, लेकिन फिर भी मुझे अपने छात्र मात्र होने पर गर्व हुआ. हमारी बहुत सी बातें हुई उसके बाद.


कार्यक्रम से लौटने तक गुरुदेव को मै 'नीरव जी' से 'गुरुदेव' मान चुका था. आज भी उनसे मेरा वही गुरु-चेले का रिश्ता है. जैसे उनके सैकड़ों, हज़ारों चेले हैं. लेकिन मेरे लिए वो अकेले ही गुरुदेव हैं. और सदैव वो ही रहेंगे.

उन्होंने मेरी कई गलतियों को माफ किया. कभी डांटा, तो कभी प्यार किया. लेकिन हमेशा मुझे कुछ न कुछ सिखाया. मै आशा करता हूँ की मुझे जीवन भर वो सिखाते रहे और किसी दिन मै अपना नाम और अपने कर्म बड़ा करके उनको उनकी गुरुदक्षिणा दे सकूँ और वो गर्व से कह सकें कि ये मेरा छात्र है. जीवन भर का छात्र. 


उनको मेरा शत-शत प्रणाम.....!!!
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