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Thursday, October 18, 2012

देश का भविष्य महिलाओं पर निर्भर होता है.

लेखिकाः सोनाली मिश्रा 
दोस्तों,
आज फिर से महिलाओं की बात करें. चूंकि मैं मानती हूं कि किसी भी देश का भविष्य उसकी महिलाओं पर निर्भर होता है. आज बहुत गर्व होता है कि महिलाएं सफलता के नए आयाम स्थापित कर रही हैं, हर क्षेत्र में नए झंडे गाढ़ रहीं हैं, किन्तु मैं ये देखती हूं कि जिस क्षेत्र में उन्हें सबसे ज्यादा काम करना चाहिए उसी में वे पिछड़ रही हैं. अर्थात परिवार के मोर्चे पर, मैं मानती हूं कि महिलाओं में वह क्षमता है कि वे घर और बाहर के मोर्चे को बखूबी संभाल सकती हैं. और उनकी क्षमता का लोहा दुनिया मानती है. फिर आज घर बिखर क्यों रहे हैं. तलाक के मामले बढ़ क्यों रहे हैं? क्या वैयक्तिक स्वतंत्रता सामाजिक रिश्तों से ऊपर हो रही है? यदि हां तो यह बहुत ही दुःख की बात है. याद रहे कि परिवार को एक बनाए रखने की जिम्मेदारी अभी भी महिलाओं की ही है, और इसमें सबसे बड़ी बात है पति के अहम को ठेस पहुंचाए बिना अपना मुकाम हासिल करना. हालांकि यह बहुत कठिन है, किन्तु नामुमकिन नहीं, यह सच है कि पति अपनी पत्नी को आगे तो बढ़ाना चाहता है किन्तु अपने अहम को भी संतुष्ट रखना चाहता है. ये एक ऐसा विरोधाभास है जिसे हमें समझना होगा और इसे संभालते हुए आगे बढ़ना होगा. पति के लिए पत्नी उसका गर्व और अभिमान होने के साथ साथ अभी अभी उसकी संपत्ति के समान होती है. हालांकि ये अवधारणा अब बदल रही है और पति अपनी पत्नी के सच्चे जीवन साथी बनते नजर आ रहे हैं, किन्तु इसे पूरी तरह बदलने में अभी समय लगेगा. एक परिवार यदि टूटता है तो केवल एक परिवार नहीं समाज टूटता है, और अंतत: देश टूटता है. विखंडित परिवार से हम एक आदर्श संतान की कामना कैसे कर सकते है. एक परिवार में नारी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. मैंने कई परिवारों में देखा है कि माँ के रूप में कई महिलाएं अपनी असुरक्षा को अपनी संतानों में हस्तांतरित कर देती हैं, और फिर उनकी संतानें भी उसी डर के साए में जीतीं हैं जिसमें उन्होंने अपनी ज़िंदगी जी. याद रखें कि इंसान जन्म हमें बहुत ही मुश्किल से मिलाता है और नारी के रूप में, अर्थात जननी और शक्ति के रूप में हमें जन्म देने के लिए प्रभु का कोटि कोटि धन्यवाद देना चाहिए. माँ के रूप में हमें इस स्रष्टि का सबसे बड़ा दर्जा मिलाता है फिर किस बात की कुंठा? अगर थोड़ी बहुत तरकीबों से पति का अहम संतुष्ट रह सकता है तो क्या अपने परिवार को और सबसे बढकर अपनी संतान के लिए ये करने में कोई हर्ज है क्या? जब मैं नौकरी करती थी तो एक महिला मुझे बस में मिलती थी, रोज ही अपने पति के साथ हुए लड़ाई झगडो के बारे में बताती थी. बोलती थी कि उसका पति उसकी कोई बात नहीं सुनता, उसकी ऑफिस की तकलीफों को नहीं बांटता. आदि आदि, आलम ये था कि बोलचाल तक नहीं थी दोनों में. मैंने उससे कहा कि मेरी दो तीन तरकीबों से काम करो और देखना कैसे तुम्हारे हनीमून के दिन वापस आ जाते हैं, पति कैसे तुम्हारा कहना मानता है” वह तैयार हो गई. मैंने उससे कहा कि पहली बात अपने ऑफिस की बातों की चर्चा उसके साथ करनी बंद कर दो, जब वह थका हार आता है तो वह तुमसे अपने मन की बाते करना चाहता है न कि तुम्हारे ऑफिस की बाते सुनना चाहता है. और दूसरा जब वह ऑफिस से आए तो बस खुश होकर उसे चाय दो, और पानी दो, थोड़े समय तक उसे आराम करने दो और जब वह रात को खाना खाए तब उससे अपनी समस्या कहो. अपनी छोटी छोटी बातें अपने आप सुलझाना सीखो और बड़ी समस्या को अपने पति को यह कह कर अहसास कराओ कि चूंकि वे पुरुष है और घर के स्वामी, तो वही हल कर सकते हैं.” ये बातें उसकी समझ में थोड़ी थोड़ी आईं और उसने इन्हें अमल में लाना शुरू किया. फिर मैंने नौकरी छोड़ दी तो कई दिनों तक मुलाकात नहीं हुई, उस दिन ऐसे ही बाज़ार में मिली तो बता रही थी कि क्या तरकीब थी. उसके और उसके पति के बीच संबंध सामान्य होने लगे हैं और अपने बेटे के सामने भी लड़ाई करना बंद कर दिया है और उनका बेटा पढाई में भी अच्छा करने लगा है.

कहने का अर्थ ये कि यदि कुछ तरकीबों का इस्तेमाल कर हम पढ़ी लिखी महिलाएं अपना घर संसार संवार सकती हैं तो उसमें हर्ज कैसे?
( अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति)
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