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Thursday, December 6, 2012

डॉ आशुतोष वाजपेयी का घनाक्षरी छंद

शीत का आरम्भ सृंगार के संग हो इस भावना से एक घनाक्षरी छंद प्रस्तुत है स्नेह चाहूँगा

प्रीति हो प्रतीत रीत जब भी बढ़ी है शीत
उपवीत का पुनीत व्रत टूटने लगा
दिव्य है प्रकृति रूप जन जन हुआ भूप
कूप लबालब धैर्य कुम्भ फूटने लगा
भूला सभी शास्त्र बना रति का महान अस्त्र
वस्त्र का भी बोझ धीरे धीरे छूटने लगा
भावना प्रकृति कामिनी भी चंचला कि काम-
सोमपेय जान तरलाग्नि घूँटने लगा
कृतिकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ
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