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Wednesday, September 18, 2013

जाम को छूकर ...

पेश है एक ग़ज़ल ..आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा..
ग़ज़ल-
आपके घर का जो औरों को पता देते हैं
कितने नादान हैं जो शोलों को हवा देते हैं
कितना नाज़ुक है तेरी यादों का हंसता ये वुजूद
बोझे सांसों के बदन जिसका झुका देते हैं
उनके दरवाजों पर होती नहीं आतिशबाजी
दिल जलाकर जो दिवाली का मज़ा देते हैं
कभी बिजली कभी बादल कभी तनहाई का डर
ऐसे मिलने के बहाने भी मज़ा देते हैं
उनके जीवन में कभी उठती नहीं हैं लहरें
अपनी धड़कन को जो पत्थर का बना देते हैं
ख़ुद को नज़रों से ज़माने की छिपाने को चलो
रेशमी जुल्फों का ये परदा गिरा देते हैं
मिल के इक साथ घरौंदे जो बनाए थे कभी
उनको हाथों से चलो आज मिटा देते हैं
जिक्र होता है हमारा यूं नए रिंदों में
जाम को छूकर वो मयखाना बना देते हैं।
-पंडित सुरेश नीरव
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