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Tuesday, December 28, 2010

योगीजी ऐसा क्यों करते हैं


श्री नीरवजी...
आपके कटनी पहुंचने के समाचार सुन-सुनकर हम सभी हर्षित हैं। आज श्री प्रशांत योगीजी ने आपकी गजल की तारीफ में जो कहा है वह अपने आप में एक गजल है। कहां-कहां से शब्द निकालकर लाते हैं। लगता है उर्दू का काफी गहरा अध्ययन किया है। मगर जब दर्शन की बात करते हैं तो हिंदी में उतर आते हैं। क्या वह ये समझते हैं कि अध्यात्म की भाषा हिंदी ही हो सकती है। उर्दू नहीं। ऐसा भेद क्यों करते हैं,यह समझ के बाहर है मेरे लिए। बहरहाल, लिखते बढ़िया हैं। बधाई..
डाक्टर प्रेमलता नीलम
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