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Wednesday, December 22, 2010

आयातित संस्कॉति के खतरे

रंजन जैदी
खतरे सामने हैं. नई पौध एक नई संस्कृति को जन्म दे रही है. रफ्ता-रफ्ता यह मेट्रो-संस्कृति गावों से उसकी सांस्कृतिक व सामाजिक अस्मिता झपट लेने की तरफ अपने कदम बढ़ा चुकी है. इसका लाभ मीडिया को हो रहा है और मीडिया का व्यवसायिक तंत्र इस भयानक परिवर्तन के आर्थिक-तंत्र से गठबंधन कर एक ऐसी पीढ़ी को निरंतर विनाश की ओर लिये जा रहा है जो हमारे देश का भविष्य है और उसी भविष्य से भावी पीढ़ियों का स्थायित्व जुड़ा हुआ है. इस वर्तमान पीढ़ी की उम्र १३ से १९ वर्ष की है जो इंस्टेंट कल्चर के बीच जी रही है.यह इंस्टेंट-कल्चर पश्चिमी देशों की आयातित संस्कृति की नहीं, भारतीय मीडिया के व्यवसायिक-तंत्र की देन है क्योंकि पश्चिम की संस्कृति अपने उदारवाद की उबाऊ बैसाखियों से मुक्त होने की जिजीविषा लिये भारतीय संस्कृति की ओर देख रही है लेकिन हमारी मेट्रो संस्कृति का मीडिया तंत्र पश्चिम की ओर देख रहा है और वही तय कर रहा है कि बच्चों को क्या खाना, देखना, सीखना, अनुभव करना, पढना और पहनना चाहिए. जंक-फ़ूड, नए फैशन, साबुन की किस्में, टूथ-पेस्ट और टीवी के कार्यक्रम व सिनेमा आदि इसके प्रमाण हैं. व्यवसायिक-तंत्र बच्चों के ही माध्यम से बच्चों के स्वभाव में परिवर्तन ला रहा है. मीडिया-परिवारों में बच्चे की जिद प़र जो सेंसेशन क्रियेट किया जाता है और फिर उसकी इच्छा को आसानी से पूरा कर दिया जाता है, वह सेंसेशन जब परदे से निकलकर आम घरों में प्रवेश करता है तो परिवार एक नए द्वंद्व का शिकार हो जाता है. यहीं से पैसा कमाने और बच्चों की ख्वाहिशों प़र लुटाने का एक नया सिलसिला शुरू हो जाता है. जो परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते हैं, उन परिवारों के बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से हीन भावना के शिकार होने लगते हैं. यहीं से शुरू होती है वह त्रासदी जिसमें बच्चे जिद्दी, चिडचिडे, अभद्र, अव्यवहारिक और असंयत होत्ते देखे जा सकते हैं. इन्हें इस स्थिति में लाने वाले इनके माँ-बाप, स्कूल का परिवेश और संगत कम दोषी नहीं होता है. परिवार में घुसपैठ करने वाले ब्रैंड नेम की लैसिनिंग मीडिया बच्चों से कराता है. घर में कौन से ब्रैंड का टीवी, कैमरा/हैण्डीकैम, पेस्ट, जींस, टॉप, शर्ट्स, क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, स्प्रे किस माल से लाया जा सकता है, ये बच्चे बताते है. उनकी नालेज प़र माँ-बाप फूले नहीं समाते और कहीं-कहीं तो माँ-बाप नोटों की गड्डियां देकर इस ज़िम्मेदारी से भी मुक्त हो जाते हैं कि उनके पूत-कपूत उनसे बेहतर सामान लाने में सक्षम है क्योंकि वे ऐसाकर उन्हें सेल्फ-कांफिडेंट बना रहे होते हैं.  मीडिया का व्यावसायिक तंत्र इसी स्थिति  को क्रियेट करना चाहता है, माल-कल्चर का स्थायित्व भी इसी मायावी संस्कृति के फलने-फूलने प़र टिका हुआ है. लेकिन यह संस्कृति एक ऐसे भयानक जंगल को जन्म दे रही है जहाँ कालांतर में मानवीय-सौहार्द्र को निगलने वाले हिंस्र पशु भारत की भावी पीढ़ियों को एक-एक कर निगल जायेंगे और कांक्रीट का जंगल भारतीय सभ्यता और संस्कृति से ख़ाली हो जायेगा. तब देश में न परिवार होंगे, न पारिवारिक रिश्ते. न कोई बंधन होगा, न कोई व्यवस्था. न कोई नीति होगी, न व्यवस्था. अराजकता के उस साम्राज्य में अपराध अपने चरम प़र होगा और माएं अपने बच्चों को औलाद कहने के लिये भी तरसेंगी. पैसे की चाह, हविस की होड़ और रिश्तों का लोप तब सब कुछ  छिन चुका होगा. क्या हमारी पीढ़ी के इस अपराध को  आने वाली नसले माफ़ कर पाएंगीं? वर्ष २०११ की महत्वपूर्ण चुनौतियों में एक चुनौती यह भी होगी. नव-वर्ष की आप सबको शुभकमनाएं.        
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