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Thursday, March 3, 2011

प्रधानमंत्रीजी खाने और ढकोसले का मतलब भी जानें

प्रधानमंत्री जी, "भोजन करने", "खाने" और "भकोसने"
में अन्तर करना सीखिये…  
Indians eating more, Manmohan Singh, Sharad Pawar

हीरालाल पांडेय
कुछ दिनों पहले ही भारतवासियों ने हमारे लाचार और मजबूर प्रधानमंत्री के
मुखारविन्द से यह बयान सुना है कि “भारतीय लोग ज्यादा खाने लगे हैं
इसलिये महंगाई बढ़ी है…”, लगभग यही बयान कुछ समय पहले शरद पवार और मोंटेक
सिंह अहलूवालिया भी दे चुके हैं। तात्पर्य यह कि अब देश का उच्च नेतृत्व
हमारे “खाने” पर निगाह रखने की कवायद कर रहा है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता में आमतौर पर माना जाता है कि किसी व्यक्ति को
किसी के “भोजन” पर नज़र नहीं रखनी चाहिये। अक्सर सभी ने देखा होगा कि या
तो व्यक्ति एकान्त में भोजन करना पसन्द करता है अथवा यदि समूह में भोजन
कर रहा हो तो उस स्थल पर उपस्थित सभी को उसमें शामिल होने का निमन्त्रण
दिया जाता है… यह एक सामान्य शिष्टाचार और सभ्यता है। प्रधानमंत्री,
कृषिमंत्री और योजना आयोग के मोंटेक सिंह ने “भारतीय लोग ज्यादा खाने लगे
हैं…” जैसा गरीबों को “चिढ़ाने और जलाने” वाला निष्कर्ष पता नहीं किस आधार
पर निकाला है…। जब इन्हें बोलने का हक प्राप्त है तो हमें भी इनके
वक्तव्य की धज्जियाँ उड़ाने का पूरा हक है… आईये देखते हैं कि भारतीयों
द्वारा “ज्यादा खाने” सम्बन्धी इनका दावा कितना खोखला है…

व्यक्ति का मोटापा मापने का एक वैज्ञानिक तरीका है BMI Index (Body Mass
Index)। साबित तथ्य यह है कि जिस देश की जनता को अच्छा और पौष्टिक भोजन
सतत उचित मात्रा में प्राप्त होता है उस देश की जनता का BMI सूचकांक बढ़ता
है, हालांकि यह सूचकांक या कहें कि वैज्ञानिक गणना व्यक्तिगत आधार पर की
जाती है, लेकिन पूरी जनसंख्या का सामान्य औसत निकालकर उस देश का BMI
Index निकाला जाता है। आम जनता को समझ में आने वाली सादी भाषा में कहें
तो BMI Index व्यक्ति की ऊँचाई और वज़न के अनुपात के गणित से निकाला जाता
है, इससे पता चलता है कि व्यक्ति “दुबला” है, “सही वज़न” वाला है, “मोटा”
है अथवा “अत्यधिक मोटा” है। फ़िर एक बड़े सर्वे के आँकड़ों के आधार पर गणना
करके सिद्ध होता है कि वह देश “मोटा” है या “दुबला” है… ज़ाहिर है कि यदि
मोटा है मतलब उस देश के निवासियों को पौष्टिक, वसायुक्त एवं शुद्ध भोजन
लगातार उपलब्ध है, जबकि देश दुबला है इसका अर्थ यह है कि उस देश के
निवासियों को सही मात्रा में, उचित पौष्टिकता वाला एवं गुणवत्तापूर्ण
भोजन नहीं मिल रहा है… यह तो हुई BMI सूचकांक की मूल बात… अब एक चार्ट
देखते हैं जिसके अनुसार वैज्ञानिक रुप से कितने “BMI के अंक” पर व्यक्ति
को “दुबला”, “मोटा” और “अत्यधिक मोटा” माना जाता है… (Know About BMI)
इस चार्ट से साबित होता है कि पैमाने के अनुसार 16 से 20 अंक BMI वालों
को “दुबला” माना जाता है एवं 30 से 35 BMI अंक वालों को “बेहद मोटा” माना
जाता है। आमतौर पर देखा जाये तो देश में मोटे व्यक्तियों की संख्या का
बढ़ना जहाँ एक तरफ़ स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव के रूप में भी देखा जाता है
वहीं दूसरी तरफ़ देश की आर्थिक उन्नति और खुशहाली से भी इसे जोड़ा जाता है।
यह एक स्वाभाविक बात है कि जिस देश में आर्थिक सुरक्षा एवं कमाई अधिक
होगी वहाँ के व्यक्ति अधिक खाएंगे और मोटे होंगे… कम से कम BMI सूचकांक
के ग्राफ़ तो यही प्रदर्शित करते हैं (जो आप आगे देखेंगे)। मनमोहन सिंह और
अहलूवालिया ने यहीं पर आकर भारतीयों से भद्दा मजाक कर डाला… उन्होंने
महंगाई को “अधिक खाने-पीने” से जोड़ दिया।

हाल ही में इम्पीरियल कॉलेज लन्दन के प्रोफ़ेसर माजिद एज़्ज़ाती ने विज्ञान
पत्रिका “लेन्सेट” में एक शोधपत्र प्रकाशित किया है। जिसमें उन्होंने सन
1980 से 2008 तक के समय में विश्व के सभी देशों के व्यक्तियों के वज़न और
ऊँचाई के अनुपात को मिलाकर उन देशों के BMI इंडेक्स निकाले हैं। शोध के
परिणामों के अनुसार 1980 में जो देश गरीब देशों की श्रेणी में आते थे
उनमें से सिर्फ़ ब्राजील और दक्षिण अफ़्रीका ही ऐसे देश रहे जिनकी जनसंख्या
के BMI इंडेक्स में उल्लेखनीय वृद्धि हुई (अर्थात जहाँ के निवासी दुबले
से मोटे की ओर अग्रसर हुए)… जबकि 1980 से 2008 के दौरान 28 साल में भी
भारत के लोगों का BMI नहीं बढ़ा (सुन रहे हैं प्रधानमंत्री जी…)। 1991 से
देश में आर्थिक सुधार लागू हुए, ढोल पीटा गया कि गरीबी कम हो रही है…
लेकिन कोई सा भी आँकड़ा उठाकर देख लीजिये महंगाई की वजह से खाना-पीना करके
मोटा होना तो दूर, गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी ही हुई है (ये और बात है
कि विश्व बैंक की चर्बी आँखों पर होने की वजह से आपको वह दिखाई नहीं दे
रही)। BMI में सर्वाधिक बढ़ोतरी अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया एवं चीन में
हुई (ज़ाहिर है कि यह देश और वहाँ के निवासी अधिक सम्पन्न हुए हैं…)। शोध
के अनुसार सबसे दुबला और कमजोर देश है कांगो, जबकि सबसे मोटा देश है
नौरू। इसी से मिलता-जुलता शोध अमेरिका में भी 1994 में हुआ था जिसका
निष्कर्ष यह है कि 59% अमेरिकी पुरुष एवं 49% अमेरिकी महिलाएं “मोटापे”
की शिकार हैं। (BMI Index Survey The Economist)

हमारे “खाने पर निगाह रखने वालों” के लिये पेश है एक छोटा सा BMI आँकड़ा-

1990 में भारत का BMI था 20.70,
अमेरिका का 26.71,
कनाडा का 26.12 तथा
चीन का 21.90...

अब बीस साल के आर्थिक उदारीकरण के बाद स्थिति यह है –

2009 में भारत का BMI है 20.99,
अमेरिका का 28.46,
कनाडा का 27.50 और
चीन का 23.00...

ग्राफ़िक्स क्रमांक 1 - सन 1980 की स्थिति



ग्राफ़िक्स क्रमांक 2 - सन 2008 की स्थिति




(पहले और दूसरे ग्राफ़िक्स में हरे और गहरे हरे रंग वाले देशों, यानी अधिक
BMI की बढ़ोतरी साफ़ देखी जा सकती है…हल्के पीले रंग में जो देश दिखाये गये
हैं वहाँ BMI में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई…) इस लिंक पर जाकर विस्तार
में देखा जा सकता है… (Countrywise BMI Global Chart)

शरद पवार और मोंटेक सिंह जी, अब बताईये, कौन ज्यादा खा रहा है? भारत के
लोग या अमेरिका?

प्रधानमंत्री जी (आपके) सौभाग्य से “फ़िलहाल” अभी भी देश के अधिकांश लोग
आपको ईमानदार “मानते हैं”, प्रेस कान्फ़्रेंस में आपने भले ही स्वीकार कर
लिया हो कि आप लाचार हैं, मजबूर हैं, हुक्म के गुलाम हैं… लेकिन फ़िर भी
देश का गरीब आपसे यही कहेगा कि “हमारे खाने-पीने” पर निगाह रखने की बजाय,
आप टेलीकॉम में राजा के “भकोसने”, गेम्स में कलमाडी के “भकोसने”, लवासा
और शक्कर में शरद पवार के “भकोसने”, हाईवे निर्माण में कमलनाथ के
“भकोसने”, आदर्श सोसायटी में देशमुख-चव्हाण के “भकोसने” पर निगाह रखते…
तो आज हमें यह दुर्दिन न देखना पड़ते…

यदि आप इतने ही कार्यकुशल होते तो निर्यात कम करते, सेंसेक्स और कमोडिटी
बाज़ार में चल रही सट्टेबाजी को रोकने के कदम उठाते, कालाबाज़ारियों पर
लगाम लगाते, बड़े स्टॉकिस्टों और होलसेलरों की नकेल कसते, शरद पवार को
बेवकूफ़ी भरी बयानबाजियों से रोकते… तब तो हम जैसे आम आदमी कुछ
“खाने-पीने” की औकात में आते… लेकिन यह तो आपसे हुआ नहीं, बस बैठेबिठाए
बयान झाड़ दिया कि “लोग ज्यादा खाने लगे हैं…”।

दिल्ली के एसी कमरों में बैठकर आपको क्या पता कि दाल कितने रुपये किलो
है, दूध कितने रुपये लीटर है और सब्जी क्या भाव मिल रही है? फ़िल्म दूल्हे
राजा में प्रेम चोपड़ा का प्रसिद्ध संवाद है… “नंगा नहायेगा क्या और
निचोड़ेगा क्या…”… यही हालत आम जनता की है जनाब…। अपनी आँखें गरीबों के
"खाने" पर लगाने की बजाय, दिल्ली के सत्ता गलियारों में बैठे “भकोसने
वालों” पर रखिये… इसी में आपका भी भला है और देश का भी…
=============

(“खाने” और “भकोसने” के बीच का अन्तर तो आपको पता ही होगा या वह भी मुझे
ही बताना पड़ेगा? चलिये बता ही देता हूं… येद्दियुरप्पा ने अपने बेटों को
10-12 एकड़ जमीन बाँटी उसे कहते हैं "खाना", तथा देवेगौड़ा और एसएम कृष्णा
ने अपने बेटों को 470 एकड़ जमीन बाँटी, इसे कहते हैं "भकोसना"…। बंगारू
लक्ष्मण ने कैमरे पर जो रुपया लिया उसे कहते हैं "खाना", और हरियाणा में
जो "सत्कर्म" भजनलाल-हुड्डा करते हैं, उसे कहते हैं "भकोसना")…

ना ना ना ना ना ना…प्रधानमंत्री जी,  इस गणित में सिर मत खपाईये कि 60
साल में कांग्रेस ने कितना "भकोसा" और भाजपा ने कितना "खाया"… सिर्फ़ इतना
जान लीजिये कि भारत में अभी भी 30% से अधिक आबादी को कड़े संघर्ष के बाद
सिर्फ़ एक टाइम की रोटी ही मिल पाती है… "खाना और भकोसना" तो दूर की बात
है… जनता की सहनशक्ति की परीक्षा मत लीजिये…
हीरालाल पांडे

Saturday, February 26, 2011

स्वातंत्र्य वीर सावरकर को शत-शत नमन

स्वातंत्र्य वीर सावरकर की 26 फरवरी को पुण्यतिथि है.
सूर्यप्रकाश
यह धरा मेरी यह गगन मेरा,
इसके वास्ते शरीर का कण-कण मेरा.

इन पंक्तियों को चरितार्थ करने वाले क्रांतिकारियों के आराध्य देव स्वातंत्र्य वीर सावरकर की 26 फरवरी को पुण्यतिथि है. लेकिन लगता नहीं देश के नीति-निर्माता या मीडिया इस हुतात्मा को श्रद्धांजलि देने की रस्म अदा करेंगे. लेकिन चलिए हम तो उनके आदर्शों से प्रेरणा लेने का प्रयास करें. भारतभूमि को स्वतंत्र कराने में जाने कितने ही लोगों ने अपने जीवन को न्योछावर किया था. लेकिन उनमें से कितने लोगों को शायद हम इतिहास के पन्नों में ही दफन रहने देना चाहते हैं. इन हुतात्माओं में से ही एक थे विनायक दामोदर सावरकर. जिनकी पुण्य तिथि के अवसर पर आज मैं उनको शत-शत नमन करता हूँ.
क्रांतिकारियों के मुकुटमणि और हिंदुत्व के प्रणेता वीर सावरकर का जन्म 28 मई, सन 1883 को नासिक जिले के भगूर ग्राम में हुआ था. इनके पिता श्री दामोदर सावरकर एवं माता राधाबाई दोनों ही धार्मिक और हिंदुत्व विचारों के थे. जिसका विनायक दामोदर के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा. वीर सावरकर के हृदय में छात्र जीवन से ही ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह के विचार उत्पन्न हो गए थे. छात्र जीवन के समय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से वीर सावरकर ने मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की प्रेरणा ली. सावरकर ने दुर्गा की प्रतिमा के समय यह प्रतिज्ञा ली कि- ‘देश की स्वाधीनता के लिए अंतिम क्षण तक सशस्त्र क्रांति का झंडा लेकर जूझता रहूँगा’.
वीर सावरकर ने लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में पूना में विदेशी वस्त्रों कि होली जलाकर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की घोषणा की. इसके बाद वे लोकमान्य तिलक की ही प्रेरणा से लन्दन गए. वीर सावरकर ने अंग्रेजों के गढ़ लन्दन में भी क्रांति की ज्वाला को बुझने नहीं दिया. उन्हीं की प्रेरणा से क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा ने सर लॉर्ड कर्जन की हत्या करके प्रतिशोध लिया. लन्दन में ही वीर सावरकर ने अपनी अमर कृति 1857 का स्वातंत्र्य समर की रचना की. उनकी गतिविधिओं से लन्दन भी काँप उठा. 13 मार्च,191. को सावरकर जी को लन्दन में गिरफ्तार कर लिया गया. उनको आजीवन कारावास की सजा दी गयी. कारावास में ही 21 वर्षों बाद वीर सावरकर की मुलाकात अपने भाई से हुई. दोनों भाई 21 वर्षों बाद आपस में मिले थे, जब वे कोल्हू से तेल निकालने के बाद वहां जमा कराने के लिए पहुंचे. उस समय जेल में बंद क्रांतिकारियों को वहां पर कोल्हू चलाना पड़ता था.
वर्षों देश को स्वतंत्र देखने की छह में अनेकों यातनाएं सहने वाले सावरकर ने ही हिंदुत्व का सिद्धांत दिया था. स्वातंत्र्य वीर सावरकर के बारे में लोगों के मन में कई भ्रांतियां भी हैं. लेकिन इसका कारण उनके बारे में सही जानकारी न होना है. उन्होंने हिंदुत्व की तीन परिभाषाएं दीं-
(1)- एक हिन्दू के मन में सिन्धु से ब्रहमपुत्र तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक संपूर्ण भौगौलिक देश के प्रति अनुराग होना चाहिए.
(2)- सावरकर ने इस तथ्य पर बल दिया कि सदियों के ऐतिहासिक जीवन के फलस्वरूप हिन्दुओं में ऐसी जातिगत विशेषताएँ हैं जो अन्य देश के नागरिकों से भिन्न हैं. उनकी यह परिभाषा इस बात की परिचायक है कि वे किसी एक समुदाय या धर्म के प्रति कट्टर नहीं थे.
(3)- जिस व्यक्ति को हिन्दू सभ्यता व संस्कृति पर गर्व है, वह हिन्दू है.
स्वातंत्र्य वीर सावरकर हिंदुत्व के प्रणेता थे. उन्होंने कहा था कि जब तक हिन्दू नहीं जागेगा तब तक भारत की आजादी संभव नहीं है. हिन्दू जाति को एक करने के लिए उन्होंने अपना समस्त जीवन लगा दिया. समाज में व्याप्त जातिप्रथा जैसी बुराइयों से लड़ने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया. सन 1937 में सावरकर ने कहा था कि-
”मैं आज से जातिओं की उच्चता और नीचता में विश्वास नहीं करूँगा, मैं विभिन्न जातियों के बीच में विभेद नहीं करूँगा, मैं किसी भी जाति के व्यक्ति के साथ भोजन करने को तत्पर रहूँगा. मैं अपने आपको केवल हिन्दू कहूँगा ब्राह्मण, वैश्य या क्षत्रिय नहीं कहूँगा”. विनायक दामोदर सावरकर ने कई अमर रचनाओं का लेखन भी किया. जिनमें से प्रमुख हैं हिंदुत्व, उत्तर-क्रिया, 1857 का स्वातंत्र्य समर आदि. वे हिन्दू महासभा के कई वर्षों तक अध्यक्ष भी रहे थे. उनकी मृत्यु 26 फरवरी,1966 को 22 दिनों के उपवास के पश्चात हुई. वे मृत्यु से पूर्व भारत सरकार द्वारा ताशकंद समझौते में युद्ध में जीती हुई भूमि पकिस्तान को दिए जाने से अत्यंत दुखी थे. इसी दुखी मन से ही उन्होंने संसार को विदा कह दिया. और क्रांतिकारियों की दुनिया से वह सेनानी चला गया. लेकिन उनकी प्रेरणा आज भी हमारे जेहन में अवश्य होनी चाहिए केवल इतने के लिए मेरा यह प्रयास था कि उनके पुण्यतिथि पर उनके आदर्शों से प्रेरणा ली जाये. स्वातंत्र्य वीर सावरकर को उनकी पुण्यतिथि पर उनको शत-शत नमन्…प्रवक्ता से

Tuesday, February 1, 2011

भारत का नाम भारत क्यों पड़ा

 सूर्यकांत बाली
इस लेख में हम सिर्फ भारत का गुणगान करेंगे। भारत का गुणगान करना तो एक तरह से अपना ही गुणगान करना हुआ। तो भी क्या हर्ज है? गुणगान इसलिए करना है क्योंकि उनको, उन पश्चिमी विद्वानों को जो हमें सिखाने का गरूर लेकर इस देश में आए थे, उनको बताना है कि हमारे देश का जो नाम है, वह वही क्यों है।
वे जो अहंकार पाले बैठे थे कि इस फूहड़ (उनके मुताबिक) देश के वाशिंदों को उन्होंने सिखाया है कि राष्ट्र क्या होता है, राष्ट्रीय एकता क्या होती है, उन्हें बताना है कि इस देश के पुराने, काफी पुराने साहित्य में पूरी शिद्दत से दर्ज है कि भारत नामक राष्ट्र का मतलब क्या होता है और क्यों होता है? और उन तमाम इतिहासकारों को भी जिन्हें पश्चिमी विद्वानों द्वारा पढ़ाए गए भारतीय इतिहास के आर-पार सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है, यह बताना है कि अपने देश का नाम रूप जानने के लिए उन्हें अपने देश के भीतर ही झांकना होता है। तेरा राम तेरे मन है।
महाभारत का एक छोटा सा संदर्भ छोड़ दें तो पूरी जैन परम्परा और वैष्णव परम्परा में बार-बार दर्ज है कि समुद्र से लेकर हिमालय तक फैले इस देश का नाम प्रथम तीर्थंकर दार्शनिक राजा भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष पड़ा। महाभारत (आदि पर्व-2-96) का कहना है कि इस देश का नाम भारतवर्ष उस भरत के नाम पर पड़ा जो दुष्यन्त और शकुन्तला का पुत्र कुरूवंशी राजा था। पर इसके अतिरिक्त जिस भी पुराण में भारतवर्ष का विवरण है वहां इसे ऋषभ पुत्र भरत के नाम पर ही पड़ा बताया गया है।
वायुपुराण कहता है कि इससे पहले भारतवर्ष का नाम हिमवर्ष था जबकि भागवत पुराण में इसका पुराना नाम अजनाभवर्ष बताया गया है। हो सकता है कि दोनों हों और इसके अलावा भी कुछ नाम चलते और हटते रहे हों, तब तक जब तक कि भारतवर्ष नाम पड़ा और क्रमश: सारे देश में स्वीकार्य होता चला गया। आप खुश हों या हाथ झाड़ने को तैयार हो जाएं, पर आज पुराण-प्रसंगों को शब्दश: पढ़ना ही होगा। जिनमें इस देश के नाम के बारे में एक ही बात बार-बार लिखी है। अपने देश के नाम का मामला है न? तो सही बात पता भी तो रहनी चाहिए।
भागवत पुराण (स्कन्ध-5, अध्याय-4) कहता है कि भगवान ऋषभ को अपनी कर्मभूमि अजनाभवर्ष में 100 पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें से ज्येष्ठ पुत्र महायोगी भरत को उन्होंने अपना राज्य दिया और उन्हीं के नाम से लोग इसे भारतवर्ष कहने लगे, ‘येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठ: श्रेष्ठगुण आसीद् येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति।’ दो अध्याय बाद इसी बात को फिर से दोहराया गया है।
विष्णु पुराण (अंश 2, अध्याय-1) कहता है कि जब ऋषभदेव ने नग्न होकर गले में बाट बांधकर वन प्रस्थान किया तो अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को उत्तराधिकार दिया जिससे इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ गया, ‘ऋषभाद् भरतो जज्ञे ज्येष्ठ: पुत्रशतस्य स: (श्लोक 28), अभिषिच्य सुतं वीरं भरतं पृथिवीपति: (29), नग्नो वीटां मुखे कृत्वा वीराधवानं ततो गत: (31), ततश्च भारतं वर्षम् एतद् लोकेषु गीयते (32)।’
लिंग पुराण देखा जाए। ठीक इसी बात को 47-21-24 में दूसरे शब्दों में दोहराया गया है, ‘सोभिचिन्तयाथ ऋषभो भरतं पुत्रवत्सल:। ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेन्द्रिय महोरगान्। हिमाद्रेर्दक्षिण वर्षं भरतस्य न्यवेदयत्। तस्मात्तु भारतं वर्ष तस्य नाम्ना विदुर्बुधा:।’ यानी (संक्षेप में) इन्द्रिय रूपी सांपों पर विजय पाकर ऋषभ ने हिमालय के दक्षिण में जो राज्य भरत को दिया तो इस देश का नाम तब से भारतवर्ष पड़ गया। इसी बात को प्रकारान्तर से वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में भी कहा गया है।
अब बताइए कि जो विदेशी लोग और हमारे अपने सगे उनके मानस पुत्र किन्हीं आर्यों को कहीं बाहर से आया मानते हैं, फिर यहां आकर द्रविड़ों से उनकी लड़ाइयां बताते हैं, उन्हें और क्या बताएं? और क्यों बताएं? क्यों न उन लोगों के लिए कोशिश करें जो जानना चाहते हैं और जिनके इरादे नेक हैं?
पर सवाल यह है कि ऋषभ-पुत्र भरत में ऐसी खास बात क्या थी कि उनके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ गया? भरत के विशिष्ट चरित्र का वर्णन करने के लिए इस देश के पुराण साहित्य में उनके तीन जन्मों का वर्णन है और प्रत्येक जन्म में दो बातें समान रूप से रहीं। एक, भरत को अपने पूर्व जन्म का पूरा ज्ञान रहा और दो, हर अगले जन्म में वे पूर्व की अपेक्षा ज्ञान और वैराग्य की ओर ज्यादा से ज्यादा बढ़ते चले गए। इनमें दूसरा जन्म हिरण का बताया गया है।
तीन जन्मों वाली बात पढ़ कर तार्किक दिमाग की इच्छा होती होगी कि ऐसी कल्पनाएं भी भला क्या पढ़नी हुई? बेशक कुछ लोग कहना चाहेंगे कि कई बार तर्क का रास्ता ऐसे अतार्किक बीहड़ में से भी निकल आता है। पर इस संबंध में जैन परम्परा तर्क के नजदीक ज्यादा नजर आती है जहां उनको एक ही जन्म में परम दार्शनिक अवधूत के रूप में चित्रित किया गया है। भरत अपने पिता की ही तरह दार्शनिक राजा थे। बल्कि उनसे भी दस कदम आगे निकल गए थे। जब भरत अपने पुत्रों को राज्य देकर तपस्या के लिए वन गमन कर गए तो आत्मज्ञान में लीन होकर सब कुछ भूल बैठे, लेकिन हिरण के एक छोटे से बच्चे पर उनकी तमाम ममता टिक गई और इसलिए उन्हें अपने अगले जन्म में हिरण बनना पड़ा।
दार्शनिक राजा भरत के बारे में जितनी कथाएं पुराणों में दर्ज हैं वे जाहिर है कि हमें कहीं पहुंचाती नहीं। पर उनके नाम के साथ ‘जड़’ शब्द जुड़ा होने और उनके नाम पर इस देश का नाम पड़ जाने में जरूर कोई रिश्ता रहा है जिसे हम भूल चुके हैं और जिसे और ज्यादा खंगालने की जरूरत है। आज चाहे हमारे पास वैसा जानने का कोई साधन नहीं है और न ही जैन परम्परा में मिलने वाला भरत का वर्णन इसमें हमारी कोई बड़ी सहायता करता है। पर राजा भरत ने खुद को भुलाकर, जड़ बनाने की हद तक भुलाकर देश और आत्मोत्थान के लिए कोई विलक्षण काम किया कि इस देश को ही उनका नाम मिल गया।
चूंकि मौजूदा विवरण काफी नहीं, आश्वस्त नहीं करते, कहीं पहुंचाते भी नहीं, पर अगर जैन और भागवत दोनों परम्पराएं भरत के नाम पर इस देश को भारतवर्ष कहती हैं तो उसके पीछे की विलक्षणता की खोज करना विदेशी विद्वानों के वश का नहीं, देशी विद्वानों की तड़प ही इसकी प्ररेणा बन सकती है। पर क्या कहीं न कहीं इसका संबंध इस बात से जुड़ा नजर नहीं आता कि यह देश उसी व्यक्तित्व को सिर आंखों पर बिठाता है जो ऐश्वर्य की हद तक पहुंच कर भी जीवन को सांसारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना के लिए होम कर देता है?
पर जिस भारतवर्ष के नामकरण के कारण को हम पूरी संतुष्टि देने वाले तर्क की सीमा रेखा तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं, उस भारत का भव्य और भावुकता से सराबोर रंगबिरंगा विवरण हमारे पुराण साहित्य में मिल जाता है जिसमें ‘वन्देमातरम्’ और ‘सारे जहां से अच्छा’ गीतों जैसी अद्भुत ममता भरी पड़ी है। विष्णु पुराण कहता है कि उसी देश का नाम भारतवर्ष है जो समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में है, ‘उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’ (2,3,1)। इसमें खास बात यह है कि इसमें जहां भारत राष्ट्र का वर्णन है वहां हम भारतीयों को ‘भारती’ कहकर पुकारा गया है।
भारत के चारों हिस्सों में खड़े पर्वतों का विवरण इससे ज्यादा साफ क्या होगा, ‘महेन्द्रो मलयो सह्य: शुक्तिमान् दक्ष पर्वत:। विंध्यश्च पारियात्राश्च सप्तैते कुलपर्वता:’ (विष्णु पुराण 2,3,3)। फिर अनेक नदियों के नाम हैं, पुराने भी और वे भी जो आज तक चलते आ रहे हैं। भारत शरीर के इस सपाट वर्णन के बाद कैसे विष्णु पुराण अपने पाठकों को हृदय और भावना के स्तर पर भारत से जोड़ता है वह वास्तव में पढ़ने लायक और रोमांचकारी है। कवि कहता है कि हजारों जन्म पा लेने के बाद ही कोई मनुष्य पुण्यों का ढेर सारा संचय कर भारत में जन्म लेता है, अत्र जन्मसहस्राणां सहस्रैरपि संततम्। कदाचिद् लभते जन्तुर्मानुषं पुण्यसंचयात् (विष्णु 2,3)। स्वर्ग में बैठे देवता भी गा रहे हैं कि वे धन्य हैं जो भारत भूमि के किसी भी हिस्से में जन्म पा जाते हैं-
गायन्ति देवा: किल गीतकानि
धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय:
पुरूषा सुरत्वात् (वि.पु. 2,3)।
क्या किसी राष्ट्रगान से कम भावुकता इन पद्यों में है? ठीक इसी तरह से सरल लय और बांध देने वाली भावुकता से भरा इस देश का वर्णन भागवत पुराण (स्कन्ध 5, अध्याय 19, श्लोक 21-28) के आठ श्लोकों में मिलता है जिन्हें अगर हमारे संविधान लेखकों ने पढ़ लिया होता तो उन्हें राष्ट्र गान की खोज के लिए भटकना न पड़ता।
जाहिर है कि ऋषभ पुत्र भरत के नाम पर जब इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा होगा तो धीरे-धीरे ही पूरे देश को यह नाम स्वीकार्य हो पाया होगा। एक सड़क या गली का नाम ही स्वीकार्य और याद होने में वर्षों लग जाते हैं तो फिर एक देश का नाम तो सदियों की यात्रा पार करता हुआ स्वीकार्य हुआ होगा, वह भी तब जब संचार साधन आज जैसे तो बिल्कुल ही नहीं थे।
पर लगता है कि महाभारत तक आते-आते इस नाम को अखिल भारतीय स्वीकृति ही नहीं मिल गई थी, बल्कि इसके साथ भावनाओं का रिश्ता भी भारतीयों के मन में कहीं गहरे उतर चुका था। ऊपर कई तरह के पुराणसंदर्भ तो इसके प्रमाण हैं ही, खुद महाभारत के भीष्म पर्व के नौवें अध्याय के चार श्लोक अगर हम उद्धृत नहीं करेंगे तो पाठकों से महान अन्याय कर रहे होंगे। धृतराष्ट्र से संवाद करते हुए, उनके मन्त्री, जिन्हें हम आजकल थोड़ा हल्के मूड में ‘महाभारत का युद्ध-संवाददाता’ कह दिया करते हैं, संजय कहते हैं-
अत्र ते वर्णयिष्यामि वर्षम् भारत भारतम्।
प्रियं इन्द्रस्य देवस्य मनो: वैवस्वतस्य च।
पृथोश्च राजन् वैन्यस्य तथेक्ष्वाको: महात्मन:।
ययाते: अम्बरीषस्य मान्धातु: नहुषस्य च।
तथैव मुचुकुन्दस्य शिबे: औशीनरस्य च।
ऋषभस्य तथैलस्य नृगस्य नृपतेस्तथा।
अन्येषां च महाराज क्षत्रियाणां बलीयसाम्।
सर्वेषामेव राजेन्द्र प्रियं भारत भारतम्॥
अर्थात् हे महाराज धृतराष्ट्र, अब मैं आपको बताऊंगा कि यह भारत देश सभी राजाओं को बहुत ही प्रिय रहा है। इन्द्र इस देश के दीवाने थे तो विवस्वान् के पुत्र मनु इस देश से बहुत प्यार करते थे। ययाति हों या अम्बरीष, मन्धाता रहे हो या नहुष, मुचुकुन्द, शिबि, ऋषभ या महाराज नृग रहे हों, इन सभी राजाओं को तथा इनके अलावा जितने भी महान और बलवान राजा इस देश में हुए, उन सबको भारत देश बहुत प्रिय रहा है।
प्रवक्ता से

Friday, January 7, 2011

छोरा बदनाम हुआ

‘ओ नवीन रहबरो, आग को हवा न दो
पीढिय़ों के दर्द की यह गलत दवा न दो
आपसी दुराव के सभी बयान रोक दो
देश बांटने की हर प्रवृत्ति को लगाम दो
द्वेषपूर्ण भाषणों की वृत्ति को विराम दो
यह प्रवृत्ति देश में नया विवाद लाएगी
और लग गई ये आग फिर न बुझने पाएगी।’’

जीवन में कभी-कभी अतीत में गहराई से झांकना बड़ा ही अच्छा लगता है और सुखद भी। भारतवर्ष में जिस तंत्र में हम रह रहे हैं और हम जिसे प्रजातंत्र कहते हैं वह आजादी के 6 दशक बाद कैसा सिद्ध हो रहा, इस पर मैं टिप्पणी करना चाहता हूं। मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान में हिन्दुत्व की बात करना या हिन्दू होना गुनाह हो गया है। हिन्दुओं के खिलाफ एक सुनियोजित षड्यंत्र रचा जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष नामक शब्‍द भारत के माथे पर कोढ़ बन कर उभरा है। यह आज भी इस राष्ट्र के लिए कलंक है। धर्म चेतना का विज्ञान है अत: यह हमेशा एक ही रहता है।
हिन्दू समाज को पहले पश्चिम के विद्वानों ने निशाना बनाया। धर्मनिरपेक्षता को हथियार बनाकर हिन्दुत्व के मान बिन्दुओं पर आघात पहुंचाया गया। महात्मा गांधी के जमाने से ही कांग्रेस तुष्टिकरण की नीतियों पर चल पड़ी थी, जो आज तक चल रही है। कम्‍युनिस्ट और अन्य दलों ने भी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमान, ईसाइयों को विशेषाधिकार दिए जाने की मांग शुरू कर दी। वोटों के लालच में इस शब्‍द का खुला दुरुपयोग किया जाने लगा। जब भी कभी हिन्दू हितों की बात की जाती है तो उन्हें साम्‍प्रदायिक करार दिया जाता है और धर्मनिरपेक्षता विरोधी बताकर खिलाफत की जाती है। इस तरह धर्मनिरपेक्ष शब्‍द को हिन्दू विरोध का पर्यायवाची बना डाला गया है। कांग्रेस आज इसका उत्तर दे सकती है कि क्‍या उसने ही मुस्लिमों के खिलाफत आंदोलन का समर्थन कर कट्टरवाद और अलगाववाद को बढ़ावा नहीं दिया था? समस्याओं की तथ्यपरक समीक्षा का समुचित समाधान निकालने के विपरीत गांधी और नेहरू कल्पना लोक में विचरण करते रहे। वे हिन्दुओं को समझाते रहे कि हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं हैं। दोनों ही भारतीय राष्ट्र का अंग हैं, गांधी जी कहते रहे ‘‘हिन्दुस्तान का बंटवारा मेरी लाश पर ही हो सकता है।’’ नेहरू जी कहते रहे ‘‘पाकिस्तान एक वाहियात सपना है।’’
''राजेन्द्र बाबू ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया डिवाइडेड’ में लिखा ‘‘पाकिस्तान असम्‍भव है’’ यह मानने वाले नेताओं ने ही बंटवारा स्वीकार किया। शांति और अहिंसा का घूंट पिलाकर हिन्दुओं को निहत्था और कायर बनाया। उसके बाद भारत का गवर्नर जनरल माउंट बेटन को ही रहने दिया किन्तु पाक का गवर्नर जिन्ना को स्वीकार कर लिया। परिणामस्वरूप पाकिस्तानी पुलिस, सेना और दंगाइयों के संयुक्त अभियान में लाखों हिन्दू कत्ल कर दिए गए। हिन्दुओं की अपार सम्‍पत्ति छीन ली गई। असंख्‍य महिलाओं का बलात्कार और अपहरण हुआ तथा वहीं रह रहे सभी हिन्दुओं का जबरदस्ती धर्मांतरण हुआ।'' आजादी के बाद भी कांग्रेस और अन्य दलों ने सत्ता के लिए हमेशा हिन्दुवादी संगठनों को निशाना बनाया। इसे देश का दुर्भाग्य कहें या पंडित नेहरू का सौभाग्य कि उन्होंने भी उस समय तेजी से शक्तिशाली हो रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कुचलने का प्रयास किया। महात्मा गांधी की हत्या का घृणित आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। दिन-रात दुष्प्रचार कर जनता के मन में संघ के प्रति घृणा भर दी और इस तरह अपनी पार्टी और वंश का राजनीतिक मार्ग प्रशस्त कर दिया। महात्मा गांधी की हत्या में संघ निर्दोष पाया गया और दो वर्ष बाद उससे प्रतिबंध हटा लिया गया। कई बार संघ पर प्रतिबंध लगाया गया और हटाया गया। कांग्रेस आज भी पुराना खेल खेल रही है और तुष्टीकरण की नीतियों के चलते हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम ने पहले भगवा आतंकवाद शब्‍द का प्रयोग किया। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन सिमी की तुलना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कर दी और फिर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह अनर्गल आरोप लगा दिया कि संघ की पाक की खुफिया एजैंसी आईएसआई से सांठगांठ है। पहले मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी के बाद संघ को निशाना बनाया गया जबकि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ‘अभिनव भारत’ का संघ से कोई संबंध ही नहीं है। अब राजस्थान पुलिस ने अजमेर बम धमाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार का नाम चार्जशीट में शामिल कर फिर षड्यंत्र का संकेत दे दिया है। इस षड्यंत्र के पीछे कांग्रेस की संकीर्ण राजनीतिक सोच नजर आ रही है। अभी इन्द्रेश कुमार के खिलाफ पुलिस के पास कोई पुख्‍ता सबूत नहीं है। जांच में क्‍या निकलता है, यह कहा नहीं जा सकता लेकिन क्‍या राहुल गांधी के वक्तव्य को सच साबित करने के लिए इन्द्रेश कुमार को निशाना तो नहीं बनाया गया? बिहार चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस मुस्लिम वोटों की खातिर किसी भी हद तक जा सकती है और जांच एजैंसियों का दुरुपयोग कर सकती है। यह उसका पुराना खेल भी रहा है। देशवासियो जानो कांग्रेस की असलियत को। सरकार की नाक के नीचे हुर्रियत नेता गिलानी और लेखिका अरुंधति राय कश्मीर की आजादी का राग अलापते हैं और उनके खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज करने से इन्कार कर दिया जाता है। जिहादी आतंकवाद और नक्‍सली हिंसा का दायरा बढ़ रहा है। कट्टरपंथी पाक का झंडा लहरा रहे हैं लेकिन कांग्रेस हिन्दू आतंक का ढिंढोरा पीट रही है। आर्य पुत्रो ऐसे षड्यंत्रों से सावधान रहो। खादीधारी मेमने बड़े खतरनाक हैं, उन्होंने आग लगाई तो हिन्दू जनमानस को संगठित होना ही होगा और हिन्दू राजनीति को स्वर देना ही होगा।
हमारी आवाज़ से साभार
प्रस्तुतिःहीरालाल पांडेय

इस्लाम देश भी आत्मा और पितरों की मान्यता को स्वीकारता है


 इजिप्ट और भारत
पंडित सुरेश नीरव
इजिप्ट जाने से पहले मन में जिज्ञासा है कि आखिर इजिप्ट और भारत में क्या समानताएं रही होंगी या कि क्या समानताएं आज भी हैं तो  सबसे पहले मुझे जो समानता दिखी वह है नदी की सभ्यता। हमारी सभ्यता सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से जानी जाती है तो मिश्र की सभ्यता भी नील नदी की सभ्यता कहलाती है।  हमारे यहां नीलगिरि के नाम से पर्वत है तो मिश्र में नील नदी है। हमारे यहां जितने पूजनीय नीलकंठ महादेव हैं उतनी ही पूजित नील नदी है। हमारे भगवान राम नील-नीलज सुंदरम हैं। हमारे भगवान राम की सेना में भी एक सेनापति नील है। तो कहीं-न-कहीं हमारी संस्कृति ने मिश्र की संस्कृति को छुआ अवश्य है। अब यदि मिश्र के अर्थ की पड़ताल करें तो मिश्र हमारे यहां अत्यंत सम्मानसूचक शब्द है। और बहुत आदरणीय व्यक्ति के साथ लगाया जाता रहा है-मसलन-वसिष्ठ मिश्र और मंडन मिश्र। नील नदी के किनारे बसे इस देश की सभ्यता ने हो सकता है कि इसे मिश्र होने का दर्जा हासिल करवाया हो। नीलअंबर हमारे यहां शनि को कहते हैं। नील नदी के वासी शनि के उपासक थे। हो सकता है इसीलिए उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण नदी का नाम नील रखा हो। अब बात इजिप्ट की। इजिप्ट में इ का अर्थ है- कामदेव,जीतना,क्रोध करुणा, आश्चर्य ,पुकारना और खिड़की। जिप्त का अर्थ है-जीतना। तो वह देश जिसने आश्चर्य को जीत लिया हो। वह इजिप्ट है। जहां से अज्ञात की खिड़की खुलती हो। जिस खिड़की से क्रोध करुणा को पुकारता हो। भारत की तरह इजिप्ट में भी अध्यात्म की विरासत है। यहां पिरामिड और मेफिंस हैं। मेफिस का मतलब है- होम ऑफ का। यानीकि आत्मा का घर। ये मेफिंस आत्मा के मंदिर हैं। परमात्मा को तो सब पूजते हैं मगर आत्मा को मंदिर में बैठाकर पूजनेवाला देश इजिप्ट ही है। पहले इजिप्ट को केमरेट कहा गया यानीकि काली धरती। रेड सी के पास होने के कारण इसे डेशरेट भी कहा जाने लगा। इसी शब्द ने आगे सफर किया तो डेजर्ट शब्द बना। डेशरेट का मतलब है-लाल धरती। यहां सहरा बहुत हैं इसलिए डेजर्ट रेगिस्तान का पर्याय बन गया। रमदान यहां का स्थानीय त्योहार है। इस अव,र पर लोग फानुसी जलाते हैं हमारे यहां भी राम आगमन पर दीपावली मनाई जाती है। और दिए जलाए जाते हैं। हमारे देश में पितरों को पूजने की परंपरा है। और हम मानते हैं कि हमारे पितृगण सूर्यलोक से भी ऊपर पितृलोक में निवास करते हैं। इजिप्ट के कवि अब्दुलरहमान आबनूसी की पुस्तक बोट ऑफ मिलियंस में भी वर्णन है कि मरने के बाद आत्माएं नाव में बैठकर सूर्यलोक जाती हैं। और हर रात अंधेरा का विशाल सांप सूरज पर हमला करता है। पितरों की आत्माएं उसे रोज नाव में बैठाकर सुरक्षित घरती पर ले आती हैं। इस कारण ही सुबह होती है। इस प्रकार इस्लाम देश भी आत्मा और पितरों की मान्यता को स्वीकारता है। कुछ ऐसी समानताएं मैंने इजिप्ट और भारत की संस्कृति में देखी हैं। अगर हमारे यहां ताजमहल है तो इजिप्ट के हिस्से में भी विश्वप्रसिद्ध पिरामिड हैं। यदि हमारे यहां हीर-रांझा हैं तो इजिप्ट में भी किलियोपेट्रा और मार्क एंटनी हैं। जिन्हें जब सीजर अगस्टस गिरफ्तार कर लेता है तो ये प्रेमी युगल आत्म हत्या कर लेता है। हमारे यहां अगर शाहजहां और मुमताज की प्रेम कथाएं हवाओं में गूंजती हैं तो इजिप्ट में भी फराओ अकनातेन और नेफरीतीती की प्रेमकथाएं इतिहास में दर्ज हैं। इजिप्ट पर भी तुर्क,रोम,फ्रांसिसी और अंग्रेजों का राज्य रहा है भारत पर भी मुगल, प्रेंच,पुर्तगाल और अंग्रेजों का कब्जा रहा है। भारत भी कृषि प्रधान देश है तो इजिप्ट भी कृषि प्रधान देश है। आज भारत भी स्वतंत्र गणतंत्र है तो इजिप्ट भी स्वतंत्र गणतंत्र है। पिरामिड के वास्तु को भारत ने अत्यंत वैज्ञानिक माना है। हमारे यहां अब ज्योतिषि घर में सुख-समृद्धि और संपन्नता के प्रतीक रूप में पिरामिड रखने की सलाह दे रहे हैं। शायद यही समानताएं हैं भारत और इजिप्ट के बीच में जिस कारण हम आज इजिप्ट में हैं।

Wednesday, December 22, 2010

आयातित संस्कॉति के खतरे

रंजन जैदी
खतरे सामने हैं. नई पौध एक नई संस्कृति को जन्म दे रही है. रफ्ता-रफ्ता यह मेट्रो-संस्कृति गावों से उसकी सांस्कृतिक व सामाजिक अस्मिता झपट लेने की तरफ अपने कदम बढ़ा चुकी है. इसका लाभ मीडिया को हो रहा है और मीडिया का व्यवसायिक तंत्र इस भयानक परिवर्तन के आर्थिक-तंत्र से गठबंधन कर एक ऐसी पीढ़ी को निरंतर विनाश की ओर लिये जा रहा है जो हमारे देश का भविष्य है और उसी भविष्य से भावी पीढ़ियों का स्थायित्व जुड़ा हुआ है. इस वर्तमान पीढ़ी की उम्र १३ से १९ वर्ष की है जो इंस्टेंट कल्चर के बीच जी रही है.यह इंस्टेंट-कल्चर पश्चिमी देशों की आयातित संस्कृति की नहीं, भारतीय मीडिया के व्यवसायिक-तंत्र की देन है क्योंकि पश्चिम की संस्कृति अपने उदारवाद की उबाऊ बैसाखियों से मुक्त होने की जिजीविषा लिये भारतीय संस्कृति की ओर देख रही है लेकिन हमारी मेट्रो संस्कृति का मीडिया तंत्र पश्चिम की ओर देख रहा है और वही तय कर रहा है कि बच्चों को क्या खाना, देखना, सीखना, अनुभव करना, पढना और पहनना चाहिए. जंक-फ़ूड, नए फैशन, साबुन की किस्में, टूथ-पेस्ट और टीवी के कार्यक्रम व सिनेमा आदि इसके प्रमाण हैं. व्यवसायिक-तंत्र बच्चों के ही माध्यम से बच्चों के स्वभाव में परिवर्तन ला रहा है. मीडिया-परिवारों में बच्चे की जिद प़र जो सेंसेशन क्रियेट किया जाता है और फिर उसकी इच्छा को आसानी से पूरा कर दिया जाता है, वह सेंसेशन जब परदे से निकलकर आम घरों में प्रवेश करता है तो परिवार एक नए द्वंद्व का शिकार हो जाता है. यहीं से पैसा कमाने और बच्चों की ख्वाहिशों प़र लुटाने का एक नया सिलसिला शुरू हो जाता है. जो परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते हैं, उन परिवारों के बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से हीन भावना के शिकार होने लगते हैं. यहीं से शुरू होती है वह त्रासदी जिसमें बच्चे जिद्दी, चिडचिडे, अभद्र, अव्यवहारिक और असंयत होत्ते देखे जा सकते हैं. इन्हें इस स्थिति में लाने वाले इनके माँ-बाप, स्कूल का परिवेश और संगत कम दोषी नहीं होता है. परिवार में घुसपैठ करने वाले ब्रैंड नेम की लैसिनिंग मीडिया बच्चों से कराता है. घर में कौन से ब्रैंड का टीवी, कैमरा/हैण्डीकैम, पेस्ट, जींस, टॉप, शर्ट्स, क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक, स्प्रे किस माल से लाया जा सकता है, ये बच्चे बताते है. उनकी नालेज प़र माँ-बाप फूले नहीं समाते और कहीं-कहीं तो माँ-बाप नोटों की गड्डियां देकर इस ज़िम्मेदारी से भी मुक्त हो जाते हैं कि उनके पूत-कपूत उनसे बेहतर सामान लाने में सक्षम है क्योंकि वे ऐसाकर उन्हें सेल्फ-कांफिडेंट बना रहे होते हैं.  मीडिया का व्यावसायिक तंत्र इसी स्थिति  को क्रियेट करना चाहता है, माल-कल्चर का स्थायित्व भी इसी मायावी संस्कृति के फलने-फूलने प़र टिका हुआ है. लेकिन यह संस्कृति एक ऐसे भयानक जंगल को जन्म दे रही है जहाँ कालांतर में मानवीय-सौहार्द्र को निगलने वाले हिंस्र पशु भारत की भावी पीढ़ियों को एक-एक कर निगल जायेंगे और कांक्रीट का जंगल भारतीय सभ्यता और संस्कृति से ख़ाली हो जायेगा. तब देश में न परिवार होंगे, न पारिवारिक रिश्ते. न कोई बंधन होगा, न कोई व्यवस्था. न कोई नीति होगी, न व्यवस्था. अराजकता के उस साम्राज्य में अपराध अपने चरम प़र होगा और माएं अपने बच्चों को औलाद कहने के लिये भी तरसेंगी. पैसे की चाह, हविस की होड़ और रिश्तों का लोप तब सब कुछ  छिन चुका होगा. क्या हमारी पीढ़ी के इस अपराध को  आने वाली नसले माफ़ कर पाएंगीं? वर्ष २०११ की महत्वपूर्ण चुनौतियों में एक चुनौती यह भी होगी. नव-वर्ष की आप सबको शुभकमनाएं.        

Thursday, December 16, 2010

जिनका जीवन हमें प्रेरणा देता है

हीरालाल पांडेय
एक संत हर बात में से कोई सार्थक संदेश देने का प्रयास करते थे। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि क्या मृत्यु में भी कोई ऐसा संदेश है ? संत ने कहा – हां, दादा जी, दादी जी, पिताजी, माता जी आदि की मृत्यु में एक सार्थक संदेश है कि आना और जाना सृष्टि का अटल नियम है। यदि यह न हो, तो सृष्टि नष्ट हो जाएगी। जो पहले आया है, वह पहले जाएगा। घर में बुजुर्ग की मृत्यु होने पर हम कुछ दिन रो-धोकर फिर काम में लग जाते हैं; पर यदि किसी युवक अथवा बच्चे की मृत्यु हो जाए; किसी बाप को अपने बच्चे की अर्थी कन्धे पर लेकर जानी पड़े, तो वे माता-पिता इस बोझ को जीवन भर नहीं सह पाते। जीवन ही उन पर भार बन जाता है। मेरे आवास के पास एक बहुत दुबला-पतला, बीमार सा धोबी कपड़े प्रेस करता था। प्रायः उससे राम-राम होती थी। एक दिन मैंने उससे उसकी बीमारी का कारण पूछा, तो उसने बताया कि उसका 18 साल का बेटा अचानक बीमार होकर मर गया, बस तब से यह दुख उसके सीने में बैठा है। यद्यपि अब दूसरा बेटा भी 18 साल का होकर काम में लग गया है; पर पहले वाले की याद नहीं जाती। इतना कहकर वह रोने लगा। मैं क्या कहता, चुपचाप वहां से उठ गया।
पर कुछ ऐसे जीवट वाले लोग भी होते हैं, जो अपने इस दुख को भी समाज हित में अर्पित कर लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं।
गहलौर घाटी, बिहार के दशरथ मांझी को यदि याद करें, तो 1960 में उनकी गर्भवती पत्नी फगुनी देवी की मृत्यु ने उनके जीवन की दिशा बदल दी, जो घास काटते समय पहाड़ी से गिरने के बाद गांव और शहर के बीच की दूरी अधिक होने के कारण समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी। बीच में एक पहाड़ी थी, जिसके कारण गांव से 20 कि.मी की यात्रा कर ही शहर पहुंच सकते थे।
दशरथ मांझी ने संकल्प कर लिया कि वह इस पहाड़ में से रास्ता निकाल कर रहेगा। वे प्रतिदिन सुबह छेनी-हथौड़ा लेकर पहाड़ को बीच से तोड़ने में लग जाते। उनकी 22 साल की साधना और परिश्रम के आगे पहाड़ भी झुक गया और उसने रास्ता दे दिया। अब गांव और शहर के बीच की दूरी मात्र एक कि.मी ही रह गयी। 17 अगस्त, 2007 को उनकी मृत्यु हो गयी; पर शासन तब तक उस एक कि.मी की दूरी को पक्का नहीं करा सका।

देश की तमाम पृथक्तावादी शक्तियों को सहयोग कर रहा है अमेरिका

गौतम चौधरी
विगत दिनों कश्‍मीर पर जोरदार बयानबाजी कर कथित समाजसेविका और सचमुच की लेखिका अरूंधती राय एकाएक चर्चा में आ गयी। फिर तहलका पत्रिका के हिन्दी संस्करण में मैंने, अपने को माओवादी चिंतक कहने वाले, वारवरा राव का साक्षात्कार पढा। उस साक्षात्कार में वारवरा, देश में सक्रिय सभी आतंकियों से अपना संबंध जोडते हुए दिल्ली को संयुक्त रूप से दुष्मन घोषित कर रहे हैं। फिर किसी ने देश के गृहमंत्री पी0 चिदंबरम किसी से पूछ लिया कि जब कष्मीरी अलगाववादी नेता गिलानी पर राष्ट्रद्रोह का अभियोग चल सकता है तो अरूंधती पर क्यों नही? देश का गृहमंत्रालय संभाल रहे चिदंबरम साहब के अपने तर्क है, लेकिन इसी देश में कांची कामकोटि पीठ के पू0 शंकराचार्य को गलत आरोप में गिरफ्तार किया गया। स्वयं चिदंबरम भगवा रंग को आतंक से जोडकर प्रचारित कर रहे हैं। एक साध्वी को बिना किसी ठोस सबूत के विगत कई वर्षों से परेशान किया जा रहा है और इतने से मन नहीं भरा तो वर्तमान सत्ता अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोई अनरगल कारण ढुंढ रही है। जब से इस देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई है तब से लेकर अब तक तीन बार संघ पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। सत्ता के वर्तमान गतिविधि से इस आषंका को बल मिलने लगा है कि संघ पर नये सिरे से प्रतिबंध लगाने की योजना एक बार फिर बनायी जा रही है।
देश के अंदर प्रेषित विचार और घट रही घटनाओं की मीमांसा यह कह रही है कि देश के तमाम आतंकवादी और देश तोड़क शक्तियों के बीच एक खतरनाक गठजोड बन गया है। विचार करके देखें तो जो लोग कश्‍मीर एवं पूर्वोत्तर के आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं वही लोग देश के अंदर माओवादी आतंकवाद के भी समर्थक हैं। अगर गौर से देखा जाये तो जिन शक्तियों के द्वारा कश्‍मीरी अलगाववादी नियंत्रित हो रहे हैं वही शक्ति पूर्वोत्तर के अलगाववादियों को सह दे रही है। फिर देश के अंदर सक्रिय माओवादियों को भी उसी शक्तियों से समर्थन मिल रहा है। गहराई से विचार करने और तथ्यों के अवलोकन से लगता है कि देश में सक्रिय उन तमाम पृथ्क्तावादी शक्तियों को किसी एक ही स्थान से नियेंत्रित किया जा रहा है। अपने भारत में हर चिंतन के लोग बसते हैं और हर का अपना अपना दृष्टिकोण भी है। ऐसा कोई आज से नहीं हमारे देश में पूर्व से होता रहा है। हमारे देश में जहां सारिपूत्र उपगुप्त थे तो घुर नियतिवादी अजित केशकम्बली भी अपने श्रावकों के साथ विचरते थे। मखरी गोशाल जैये धुर भौतिकवादी चारवाक दार्शनिक भी भारत में ही पैदा हुआ। महात्मा बुध्द के समर्थकों में महात्मा आनंद थे तो दूसरी ओ लघुपंथक का भी अपना संप्रदाय था। विचारों में भिन्नता हमारे देश की विशेषता रही है लेकिन जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रष्न खडा होता था तो देश के सभी विचारक महाकुभ में एकत्रित होकर आसन्न समस्या का समाधान भी करते थे। आर्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने आर्यावर्त के सभी विचारकों को संगठित कर नये सिरे से मगध साम्राज्य की नीव रखी। हालांकि चाणक्य सम्राट अजातशत्रु के महामात्य आर्य वार्शकार के राजनीतिक चिंतन का विस्तार थे लेकिन देश में संस्कृति के आधार पर राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा देने में चाणक्य सफल रहे। ऐसा कोई पहली बार रहीं हुआ। भारतीय प्रायद्वीप पर इस प्रकार की राजनीतिक घटनाएं कई बार हो चुकी है। यह इसी देश में हुआ जब सबसे कम आयु के संन्यासी महात्मा सुखदेव ने नैमिसारण्य में हजारों संयासियों को आने वाले धर्म की शिक्षा दी थी। हमारे विचारक और चिंतक कभी राष्ट्र, संस्कृति और मानवता की शर्तों पर समझौता नहीं किया। इसीलिए हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है – एके सदविप्रणांम बहुधा बदंति! यानि एक ही सत्य को विद्वान कई तरह से पेश करते हैं। परंतु आज देश में आतंकवाद और अलगाववाद को सकारात्मक बताया जा रहा है। फिर संयुक्त राज्य अमेरिका में जब से आतंकी हमले हुए हैं उसके बाद से भारत में भी आतंकवाद पर नये सिरे सोचा जाने लगा है। क्या है न कि अमेरिकी अपनी समस्या को वैश्विक बनाना अच्छी तरह से जानते हैं और आज का भारतीय कूटनीति अमेरिका की समस्या को अपनी समस्या बनाने में मानों मजा आ रहा हो। हमारे देश में भी अब अमेरिका की तरह आतंकवाद पर दृष्टिकोण बनाया जाने लगा है लेकिन हम इस दृष्टिकोण में यह भूल जाते हैं कि भारत में आतंकवाद को बढावा देने में जिन शक्तियों का योगदान है उन शक्तियों की धुरी आज के संयुक्त राज्य अमेरिका ही है। हमारे देश में तीन प्रकार का अलगाववाद है। एक को पाकिस्तान इस्लाम के आधार पर सह दे रहा है। पाकिस्तान के कूटनितिज्ञों का कहना है कि अंग्रेजों से पहले भारत पर मुगलों का कब्जा था और मुगल मुसलमान थे इसलिए पूरे भारत पर इस्लाम का ही नियंत्रण होना चाहिए। पूर्वोत्तर के अलगाववादियों का तर्क है कि भारत पर अंग्रेजों का शासन था, अंग्रेज ईसाई थे इसलिए भारत पर ईसाई धर्म के मानने वालों का शासन होना चाहिए। अपने देश में एक तीसरे प्रकार का भी अलगाववाद है। यह अलगाववाद, आतंकवाद से पनपा है। जब भारत के अंदर राष्ट्रीय आन्दोलन चल रहा था उस समय दुनिया में साम्यवाद अपना पैर जमा रहा था। ऐसे भारत में साम्यवादी दल की स्थापना का कोई दिन तारिख निश्चित नहीं है। यहां तक कि कोई स्थान भी निष्चित नहीं है। स्वतंत्रता आन्दोलन में जहां-तहां सक्रिय कुछ आन्दोलनकारी रूस को आधार बनाकर देश की आजादी की बात करने लगे थे कुछ आन्दोलनकारियों ने कानपुर में एक मंच बनाया। फिर सन 1925 को ताशकंद में एक संगठन की नींव रखी गयी जिसका नाम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी रखी गयी। इस संदर्भ में आज से 13-14 साल पहले मैंने नवभारत टाईम्स में एक लघु आलेख पढा। आलेख संपादकीय पन्ने पर छपा था। उस लेख को आधार मानें तो भारत के कुछ क्रांतिकारी मानवेन्द्र नाथ राय के कहने पर तृतिये अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी सम्मेलन में मास्को गये। उस समय मानवेन्द्र नाथ राय मैक्सिको से प्रतिनिधि बन कर उस सम्मेलन में आये थे। मास्को जाने वालों में से भारत के एम0 वर्कतुल्ला, राजा महेन्द्र प्रताप, लाला हरदया आदि सात लोग थे। हालांकि भारत में आजादी की लडाई में लेनिन का समर्थन लेने ये लोग वहां गये थे लेकिन लेनिन ने भारत की आजादी की लडाई में समर्थन से इनकार कर दिया। यह जानकार आज के साम्यवादियों को आष्चर्य होगा कि जब भारत के राष्ट्रभक्त भारत की आजादी के लिए लड रहे थे उसी समय मानवेन्द्र नाथ राय जैसे घुर साम्यवादी आजादी की लडाई का यह कहकर विरोध कर रहे थे कि यह लडाई भारत के व्यापारी, भूमिपति और सामंतों के द्वारा खरी की गयी लडाई है। इस प्रकार की बातें मनगढंत नहीं है। इसके मुकम्मल प्रमाण भी खोजने पर मिल जाएंगे। जब हमारे राष्ट्रभक्त मैनचेस्टर और ब्रिटिस कोलंबिया के कपडों की होली जला रहे थे उस समय भी साम्यवादियों ने विरोध किया था और कहा था कि ऐसा करने से इग्लैंड के मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे। तो भारत में आज जो तीसरे प्रकार का अलगाववाद है उसकी गंगोत्री साम्यवाद की वह सोच है जिसे इस देश में कभी व्यापक महत्व नहीं दिया गया।
एक बात यह भी सत्य है कि दुनिया का कोई भी अलगाववाद न तो बिना पैसे से चल सकता है और न ही अन्य किसी देश की सहायता से चलाया जा सकता है। हमारे देश में जो अलगाववाद है वह भी किसी न किसी देश के सहयोग और उक्सावे पर ही चल रहा है। पूर्वोत्तर के आतंकवादियों को वेटिकन से सहयोग मिल रहा है। इस्लामी आतंकवाद को पाकिस्तान से सहयोग मिल रहा है तथा साम्यवादी चरमपंथियों को चीन का सहयोग मिल रहा है। लेकिन यह केवल देखने में आता है, वास्तव में तीनों प्रकार के आतंकवाद को दुनिया में पूजीपरस्तों का सहयोग मिल रहा है। चीन से अमेरिका इसलिए नहीं खौफ खात है कि चीन उससे ज्यादा प्रभावशाली है, समस्या यह है कि चीन में लगे तमाम कल कारखानों में अमेरिकी व्यापारियों का पूंजी लगा हुआ है। चीन का अर्थतंत्र अमेरिका के व्यापारियों द्वारा नियंत्रित होता है। पाकिस्तान को खुलेआम अमेरिका आर्थिक और सामरिक सहयोग कर रहा है। रही बात बेटिकन की तो बेटिकन को आज सबसे ज्यादा दान अमेरिकी कैथोलिक ईसाई व्यापारियों से प्राप्त हो रहा है। कुल मिलाकर देखें तो भारत में सक्रिय आतंकियों को एक ही स्थानों से आर्थिक, वैचारिक और सामरिक सहयोग मिल रहा है। अब रही बात भारतीय बुध्दिजीवियों की तो यहां बुध्दिजीवियों के चार खेमे हैं। एक जिसे साम्यवादी खेमा कहा जाता है, दूसरा पूंजीवादी खेमा है तीसरा मध्यममार्गी खेमा है तथा चौथा राष्ट्रवादी खेमा है। राष्ट्रवादी खेमे को छोडकर तीन अन्य की आर्थिक स्थिति का मुआयना करें तो लगेगा कि आखिर इनके पास इतने पैसे आ कहां से रहे हैं? साम्यवादी विचारक, चिंतक कहने के लिए केवल सर्वहारा हैं। इनके जीवन शैली को कोई जाकर देखे। मेधा पाटेकर, स्वामी अग्नवेश, अरूणधति राय, संदीप पांडेय, वारवरा राव, विनायक सेन, तिस्ता शेतलवार, मुकुल सिंहा, राजदीप सरदेसाइ, बरखा दत्त आदि को पैसा कहां से आता है। हर के अपने अपने एनजीओ हैं और उन एनजीओ को किसी न किसी रूप में पूंजीवादी देषों से पैसा प्राप्त हो रहा है। भारत में पता लगाया जाये कि भारतीय गैर सरकारी संगठनों को सबसे ज्यादा पैसा कहां से आ रहा है तो मुझे पक्का विष्वास है कि अमेरिका से ही आ रहा होगा। ऐसे इस विषय पर किसी ने किताब भी लिखी है। उसे पढकर और ज्यादा सही ढंग से इन विषयों को समझा जा सकता है। हां इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो लोग राष्ट्रवादी चिंतन के खेमे में हैं उनमें से भी कुछ को बाहरी पैसा पहुंच रहा होगा, लेकिन वहां नियंत्रण के लिए कुछ संगठन भी है जिसके कारण विदेशी पैसे का पहुंचना निर्वाध नहीं है। ऐसो में देखें तो यह लगता है कि चाहे भारत के आतंकवादी अलगाववादी हों या उनको समर्थन करने वाले बुध्दिजीवी दोनों को एक ही स्थान से पैसा प्रप्त हो रहा है। फिर देश के तमाम अलगाववादियों का कही न कही से संबंध है और उस संबंध को और मजबूत करने के लिए देश के अंदर सक्रिय पूंजीवादी साम्यवादी अंतर संबंध अपनी भूमिका को लगातार मजबूत करता जा रहा है। इस परिस्थिति में देश की जनता को उन बुध्दिजीवियों से सतर्क रहना चाहिए जो केवल पूंजीपरस्त देषों के लिए काम कर रहे हैं। याद रहे ये लोग न तो कष्मीरी जनता के प्रति वफादार हैं और न ही पूर्वोत्तर के प्रति। न तो ये माओवादियों के हैं और न ही इस्लाम के। ये तो पूंजीपरस्त ईसाइयों के लिए ही काम कर हरे हैं जिसका खामियाजा हम सभी को भुगतना पड रहा है। थोडी समझदारी और अंतरसंबंधों से हमारा राष्ट्रीय सामाजिक ढांचा मजबूत हो सकता है। इस दिशा में प्रयास की जरूरत है और इन विदेशी पैसों पर पल रहे चारणों को सबक सिखलाने की जरूरत है।
प्रवक्ता से साभार

Wednesday, December 1, 2010

ईमानदार प्रधानमंत्री का भ्रष्टतंत्र

हमारे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की ईमानदारी का ढिंढोरा पीट कर कांग्रेस पार्टी संसदीय जांच समिति से इस तरह भागने की कोशिश कर रही है जैसे विपक्ष सलीब पर ईसा मसीह को टांगने की कोशिश कर रहा हो
मगर क्या यह देश जुलाई 2008 में बुलाये गए संसद के उस विशेष सत्र की घटना को भूल सकता है जब अमरीका के साथ होने वाले परमाणु करार पर लोक सभा की स्वीकृति की मोहर लगवाने के लिए अल्पमत में आई मनमोहन सरकार ने विपक्ष में बैठे सांसदों का मत खरीदा था और लोकसभा की मेज पर नोटों के बण्डल रखे गए थे ?? तब कौन सी ईमानदारी का परिचय इस देश की जनता को मिला था ? क्या ईमानदार की परिभाषा यह है कि महात्मागांधी के तीन बंदरों की तरह बुरा मत देखो, बुरा मत सुनों, और बुरा मत कहो पर अमल करते हुए बुरे काम को होते हुए देखा कर दीवार की तरफ मूंह करके खड़े हो जाओ | डा. मनमोहन सिंह ने इस देश के प्रधानमंत्री है कोई कुटिया में बैठे भागवत भजन करने वाले साधु नही कि हर बात को हरि -इच्छा पर छोड़ कर देश की सरकार चलाते रहे और अपने ईमानदार होने का सबूत देते रहे | यह किसी ईमानदारी है जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एक अफसर को देश का मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने के लिए मजबूर करती है ? या कैसी ईमानदारी है जो अपने ही मंत्रीमंडल के एक मंत्री यह नही कह पाती कि 2-जी स्पेक्ट्रम के लाइंसेस तो बांटो मगर ज़रा यह भी ध्य ान कर लो कि इसमें देश कू कोई नुक्सान ना हो | यह कैसी ईमानदारी है जो परमाणु दायित्व विधेयक को झटके में संसद में पारित कराने की कोशिश करती है और जब इस पर विवाद उठता है तो इस विधेयक में संशोधन कर दिया जाता है ? इस विधेयक को पारित कराते समय संसद को विश्वास दिलाया जाता है कि परमाणु हादसे होने पर मुआवजे के निपटारे के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय संधि से जुड़ने की कोई जल्दी नही है मगर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के भारत आने से पहले ही विएना में इस संधि पर भारत हस्ताक्षर कर देता है ? क्या ईमानदारी यह होती है कि राष्ट्र मंडल खेल आयोजन के नाम पर रोज नए-नए घोटाले उजागर होते रहे और प्रधानमंत्री इनके खत्म होने के बाद एक जांच समिति का गठन कर दे ? क्या ईमानदारी यह होती है कि क्रिकेट के नाम पर अईपीएल की कोचीच टीम को खरीदने के लिए उसके ही मंत्रीमंडल का का सदस्य बीच रास्ते में ही पकड़ लिया जाए ? क्या ईमानदारी इसे कहते है कि भारी संसद में जब उसके ही मंत्रिमंडल का सदस्य 2-जी लाईसेंस घोटाले पर विपक्षी सांसदों से यह कहे कि मुझे क्यों पकड़ते हो, मैंने तो सारा काम अपने सरपरस्त प्रधानमंत्री की जानकारी में ला कर ही किया है और प्रधानमंत्री चुपचाप बैठा रहे ? दरअसल हकीकत ये है कि डा.मनमोहन सिंह के रूप में कांग्रेस पार्टी के खानदानी राज को एक ऐसा मोहरा मिल गया है जो उसका उपयोग मनचाही जगह पर जैसे चाहे वैसे कर सकता है मगर यह देश मुर्दा इंसानों की बस्ती नही है | पूरी दुनिया के सबसे जवाब मुल्क् की नोजवान पीढ़ी को कांग्रेस खानदानी विरासत के मायाजाल में नहीं बाँध सकते | कौन नही जानता कि मनमोहन सिंह दुर्घटनावश राजनीति में विश्व बैंक की सलाह पर स्व.नरसिंहराव द्वारा 1991 में वित्त मंत्री बनाए गए थे और उनकी ही वित्तीय नीतियों के चलते भारत के कृषि क्षेत्र को कंगाल कर किया गया था | कौन नही जानता कि पंडित नेहरू की आर्थिक नीतियों की बुनियाद पर खड़े हो कर इस देश ने विश्व का सबसे बड़ा बाजार बनने की क्षमता अर्जित की थी मगर मनमोहन सिंह की आरती नीतियों ने तो अस्पतालों को भी होटलों में तब्दील काके गरीब आदमी से बीमारी में ईलाज कराने का हक तक छीन लिया | वह कांग्रेस किस मूंह से भ्रषटाचार से निपटने की बात कर सकती है जिसने अपना प्रधानमंत्री ही ऐसे कमजोर राजनीत से बे-जान व्यक्ति को चुना है जिससे उसका भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी रहे | इसका प्रमाण तो महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण है जिसने मुम्बई में केवल तीन-चार फ्लैटो के लिए ही अपना ईमान बेच दिया और ईमानदार मुख्यमंत्री का क्या हाल आज के कांग्रेसी निजाम में होता है इसका प्रमाण श्री के.रोसैया है जिसने झुन्झला कर मुख्यमंत्री का पद ही छोड़ दिया मगर कांग्रेसी इसका गुणगान नही करेंगे क्यों कि ये त्याग थोड़े ही है ? यह तो स्वास्थ्य की वजह से दिया गया इस्तीफा है | यह पलायनवाद की पराकाष्ठा है | इन्होने मनमोहनसिंह को यह सोच कर कुर्सी पर बिठाया होगा कि राज हमारा रहेगा और नाम बादशाह का होगा | इन्होने मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, और इंदिरा गांधी की विरासत के बाद राजीव गांधी, सोनिया गांधी और इसके बाद राहुल गांधी को इसलिए युवा नायक के रूप में महिमा मंडित करना शुरू कर दिया जिससे सत्ता के सारे सुख बिना सत्ता में रहते हुए मिल सके | मगर क्या यह देश और इसकी जागरूक जनता सोई हुई है जो यह तक नही समझ सकता कि राजनीति के ये धुरंधर प्रतीक जो उसके सामने पेश किये जा रहे है वे नकल से इम्तिहान पास करने वाले लोग है | इनमें तो इतनी भी कुव्वत नही कि वे प्रश्न पात्र के उत्तर अपने ज्ञान के बूते पर लिख सके | और देखिये क्या संगत बिठाई गई अपने जैसे ही उधार के कांग्रेसी मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर उनके मुंह से ही कहलवाया गया कि कांग्रेस का नया युवा नायक पूरे देश की आशा की किरण है मगर बिहार की जनता ने बता दिया है कि पीतल पर सोने का पानी एक समय के बाद उतरता ही है | इसलिए देशवासियों जागो और अपने पैरों पर खडा होना सीखो और अब सारे मुल्क को बिहार और गुजरात बना डालो नही तो ये मनमोहन सिंह के भ्रष्ट तंत्र में इस देश को रसातल पर जाने से कोई नही रोक पायेगा | उठो देशवासियों ये भारत की धरा तुम्हे पुकार रही है | 
– कुशल सचेती(अलवर)
प्रवक्ता से साभार

Tuesday, October 26, 2010

लोग खुश हैं कि इतनी दरिद्रता भोगने के बाद भी प्रेमीजी मरे नहीं हैं


हास्य व्यंग्य-
षष्टिपूर्ति बनाम शोक सभा
0 पं. सुरेश नीरव
और साहब बेचारे प्रेमीजी आखिर बाकायदा सठिया ही गए। मतलब ये हुआ कि जीवन के पूरे साठ पतझड़ झेलकर भी वे अभी तक नाटआउट हैं। लोग खुश हैं कि इतनी दरिद्रता भोगने के बाद भी प्रेमीजी मरे नहीं हैं। वे कुछ दिन और कष्ट भोगें उनकी यही अखंड अमंगल कामनाएं हैं। अगर प्रेमीजी कवि नहीं होते और स्थानीय स्तर पर उनका अंतर्राष्ट्रीय सम्मान नहीं होता तो वे कब के मर-मरू लेते मगर सम्मान की इक बारीक-सी डोर ने उन्हें भवसागर से पार जाने से अभी तक रोके रखा है। लेकिन आज प्रेमीजी ऐसे छटपटा रहे हैं-जैसे प्राणरक्षक दवाओं के अभाव में हार्टअटैक पड़ने पर कोई मरीज़ तड़फड़ाता है। उनकी छटपटाहट भी जायज है। है क्या कि योग्य-अयोग्य-यथायोग्य नाना प्रकार के चेलों की प्रेमीजी ने समय-असमय और कुसमय,भूरी-भूरी प्रशंसा कर उन्हें साहित्य में स्थापित करने का हमेशा ही भावुक प्रयास किया। और इस चक्कर में बेचारे खुद स्थापित नहीं हो पाए। और उस पर सिला ये कि आज प्रेमीजी के एक भी शिष्य ने उनकी षष्ठिपूर्ति का कोई आयोजन करना तो दूर भूले से भी कोई प्रस्ताव तक नहीं रखा। ऐसे भी बुरे दिन आंएगे, प्रेमीजी ने कभी सोचा भी नहीं था। अपने खानदानी वयोवृद्ध मकान की छत पर हर रविवार प्रेमीजी कवि गोष्ठी किया करते। कवियों को चाय-नाश्ता भी कराते। फिर तय है कि अध्यक्षता भी खुद ही करते। किसी और के अध्यक्ष बनने का तो सवाल ही नहीं उठता था। लालकिले में जब बहादुरशाह जफर मुशायरा कराते थे तो वे भी तो सदारत खुद ही किया करते थे। हमारे प्रेमीजी बहादुरशाह जफर से कम थोड़ी ही हैं। वे अपने मुहल्ले के बाकायदा बहादुरशाह जफर हैं। और न ही उनका मकान किसी लालकिले से कम है। न खुद प्रेमीजी की नज़र में और न मुहल्लेवालों की नज़र में। यूं भी प्रेमीजी और बहादुरशाह जफर में कई भयानक समानताएं हैं। मसलन- जफर साहब बेचारे नाम के ही बादशाह थे। नगर के लोगबाग प्रेमीजी को भी नाम का ही कवि मानते हैं। जफरसाहब बेचारे अपने ही राज्य के सेठों से पैसा कर्ज लेकर राज्य चलाते थे मगर मुशायरा करने से बाज नहीं आते थे ऐसे ही हमारे प्रेमीजी भी बेचारे हाईक्वालिटी की कड़की झेलते हुए भी कवि गोष्ठी करने पर हमेशा आमादा रहते हैं। मौका मिला नहीं कि तड़ से कवि गोष्ठी पेल दी। और जैसे अंग्रेज लोग सदाबहार कड़के नवाब के लालकिले को ललचाई नज़रो से देखते थे वैसे ही मुहल्ले के प्रोपर्टीडीलर प्रेमीजी के खानदानी दौलतखाने को निहारा करते हैं। वे हमेशा इसी फिराक में रहते हैं कि जरा-सा मौका मिले और वे मुहल्ले के बहादुरशाह जफर को रंगून रवाना करें। आज मुहल्ले का बहादुरशाह जफर अपने किले की छत पर बेचैन होकर घूम रहा है। उसे अपनी बदनसीबी के आगे बहादुरशाह की बदनसीबी छोटी लग रही है। प्रेमीजी बुदबुदाते हैं कि कितना है बदनसीब जफर-जैसी ग़ज़लें दोस्तों को ही नहीं फिरंगियों को भी सुनाकर बादशाह ने तो अपने दिल की भड़ास निकाल ली थी मगर उनकी गजलों को सुनने दुश्मन की तो भली चलाई चेले तक नहीं आ रहे हैं। मगर इतनी दुर्दांत बदनसीबी में भी मैंने जफरसाहब की तरह रोने-धोने की कोई रचना नहीं की। आखिर दिलेरी भी तो कोई चीज होती है। प्रेमीजी ने अपनी पीठ थपथपाकर खुद को ही किंगसाइज शाबाशी दी। यूं भी गर्दिश के दिनों में दाद देने में आदमी को आत्मनिर्भर होने में ही भलाई है। भला दूसरा कौन शाबाशी देता है गर्दिश के दिनों में। और वैसे भी आज कौन किसको शाबाशी दे रहा है। ये दौर ही लंगड़ी और टंगड़ी मारने का दौर है। लंगड़ी मारकर जो अपने से आगेवाले को पटक लेता है,वो खुद अपने को शाबाशी दे लेता है। और फिर सतर्क होकर वह पीछेवाले को घूरता है कि कहीं वो भी इसी फार्मूले से उसे गच्चा न दे दे। शास्त्रो में श्रषि-मुनि कह गये हैं कि सावधानी हटी कि दुर्घना घटी। टंगड़ी मारनेवाला अपने को समझाता है कि शाबाशी का हैंगओवर जरा-सा भी लंबा खिंचा नहीं कि पीछेवाला फटाक से धड़-धड़ाम कर देगा। इस वक्त प्रेमीजी को इस तनहाई के मौसम में तमाम तरह की टांगे अपनी ओर आती दिखाई पड़ रही हैं। हर टांग टंगड़ी मारने की मुद्रा में आगे बढ़ रही है। और बेबस प्रेमीजी इस टंगड़ी के बवंडर में गहरे धंसते चले जा रहे हैं। और फिर अचानक शाबाश..शाबाश के कोरस में में वे ऐसे धंसने लगते हैं जैसे खुले सीबर की कीचड़ में खल्लास गुटखे का पाउच। जो कीचड़ में रहकर भी अपनी चमक की ठसक बरकरार रखता है। प्रेमीजी की प्रतिभा का पाउच गर्दिशों की कीचड़ में गिरकर भी कतई मलिन नहीं हुआ। इस खल्लास पाउच की कालजयी चमक उम्र के साठ पतझड़ झेलकर भी आज तक टनाटन बरकरार है। ये बात और है कि आज चेलों का विश्वासघात प्रेमीजी को टेंसया रहा है। टेंशन में वे बड़बड़ा रहे हैं कि लंका में तो एक ही विभीषण था मगर मैं तो अनजाने में विभीषणों की नर्सरी का ही मैनेजर बना हुआ था। दिल्ली की जमीन की रेट की तरह उनका गुस्सा बढ़ने लगा। आंसूओं की प्रदूषित यमुना का जल कीचड़ की तरह आँखों में बजबजा उठा। प्रदूषण के भार से चरमराएं आंसुओं का गाल पर रेंगना तो दूर वे आंखों में ही किसी मोटे सेठ की तरह हांफते हुए दम तोड़ने लगे। प्रेमीजी सोच रहे हैं कि कुछ लोग तो 80 साल में भी राजभवन में कन्याएं बुला लेते हैं और मैं बदवसीब अपने निजीभवन में ही दो-चार टुच्चे चेलों के लिए तरस रहा हूं। हाय री किस्मत। कोई भी चेला षष्टिपूर्ति का प्रस्ताव लेकर नहीं आया। कहीं षडयंत्र शिरोमणि शास्त्रीजी ने तो मेरे चेलों को नहीं भड़का दिया। उनके शगूफे तो वैसे भी आईफ्ल्यू की तरह तुरंत शहर में फैल जाते हैं। उनका मन ऐसी ही डिजायन की तमाम लघुऔर दीर्घशंकाओं से भर गया। अंतर्द्वद्व की ऐसी भीषण मारक वेला में अदम्य साहस का परिचय देते हुए प्रेमीजी ने अपनी सांसों की झाड़ू को अपने फेंफड़ों में उतारकर ऐसी कलात्मकता से खंगाला कि अगर बाबा रामदेव इस प्राणायाम को देख लेते तो शर्म से पानी-पानी हो जाते। वैसे अगर प्रेमीजी कवि न होकर सिर्फ एक औसत फालतू आदमी ही होते तो यकीनन रामदेव से ज्यादा कारगर कारनामे कर दिखाते। लेकिन जिस कविता के खातिर प्रेमीजी ने इस गुप्त प्रतिभा का हंसते-हंसते बलिदान कर डाला हाय री किस्मत उसी कविता की बदौलत वे आज बेचारे घर के रहे ना घाट के। प्रेमीजी इधर चिंतन की सूंघनी से नथुनों को परफ्यूम्ड करने में लगे थे कि तभी सांसों की झाड़ू ने फेंफड़ों से फ्लोराइड पेस्ट की तरह श्वेतधवल यौगिक का धमाकेदार उत्तर्जन कर,सन्नाटे के कानों में शास्त्रीय संगीत उड़ेल दिया। मुहल्ले के लोगों ने इस कातर ध्वनि को प्रेमीजी की आखिरी सांस का उत्सवनाद समझा। कुछ निठल्ले एक्ट्रा उत्साह में भरकर-जबतक सूरज चांद रहेगा.. प्रेमीजी का नाम रहेगा के मुबारक नारों को हवा में उछालकर भांगड़ा करने लगे। प्रोपर्टीडीलरों तक जब यह मंगलकारी समाचार पहुंचा तो प्रेमीजी के पार्थिव शरीर पर पहले पुष्पचक्र कौन रखेगा इस मुद्दे पर घमासान छिड़ गया। इधर प्रचंड कफ-विस्फोट से थके प्रेमीजी छत की मुंडेर से ऐसे लटक गए-जैसे आंधी के बाद खंभे से टूटा बिजली का तार जो लटका भी होता है और जुड़ा भी होता है। ऐसे ही गजब का संतुलन बनाए हठयोगी की तरह लटकायमान मुद्रा में अपनी ही शवयात्रा की खुशगवार चहलपहल को प्रेमीजी फटी-फटी आंखों से देखकर भरपेट आनंदित होने लगे। भयानक कड़की के सांचे में तराशे गए इस दुर्दांत साहित्कार को बचाने के लिए उनके पास जाने के विचार को लोग आत्महत्याकारी पराक्रम मान रहे थे। इसलिए दूर से ऐसे ही आनंद लेने लगे जैसे कि कोई मंत्री बाढ़ग्रत क्षेत्र के दृश्यों के लेता है। इसी बीच कुछ खोजी पत्रकारों का जत्था और सूंघा चैनलचारियों का गैंग कंधे पर बेताल की तरह कैमरा लटकाए प्रेमीजी की ऊर्ध्वपातित मुद्रा के शाट्स लेने लगा। अफगानिस्तान में भूमिगत हुए तालिबानों की तरह प्रेमीजी के चमचे मौत की इस पावन बेला में अचानक प्रकट होने लगे। ट्रैफिक रेडलाइट पर जैसे भिखारियों का स्वयंसेवीदल प्रकट होता है वैसे ही प्रेमीजी के चेले चैनलिया कैमरों के सामने आपस में इस बात पर लड़ने लगे कि प्रेमीजी के जीवन पर पहले कौन बोलेगा। चैनल के समझदारलोगों ने शोक सभा के लिए गैंगवार नाम से चमचों की इस मुठभेड़ का लाइव टेलीकास्ट करना शुरू कर दिया। बीच-बीच में कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए चमगादड़ की तरह उल्टा हुआ लटका प्रेमीजी का पार्थिव शरीर क्लोजअप में दिखाया जाता। एक अकादमी के लीलाधारी अधिकारी कवि जो पूरी ईमानदारी से प्रेमीजी का नाम कविसम्मेलन की लिस्ट से कटवाते रहे थे आज पेशेवर रूदाली का डीलक्स एडीशन बने उनके लिए कैमरे के आगे मगरमच्छ के आँसू बहा रहे थे। ये आंसू नामक पदार्थ खुशी के लम्हों में  भी सक्रिय हो जाता है,इसलिए जो लोग इन सज्जन की फितरत से वाकिफ थे वे इन आंसुओं का इल्जाम खुशी के ही माथे मढ़ रहे थे। खैर साहब तीन घंटे के इस रंगारंग कार्यक्रम का भरपूर आनंद लेने के बाद छत से वैसी ही शैली में आकाशवाणी हुई जैसी कि कंस द्वारा मथुरा में कन्या को पटककर मारते समय हुई थी। प्रेमीजी चैनलचारियों से कह रहे थे- एक बाइट मेरी भी ले लेना भैया। मैं साठ साल का हो गया हूं। बिना षष्ठिपूर्त समारोह कराए कैसे मर सकता हूं। और अगर आप समझ रहे हैं कि मैं मर गया हूं तो समझलें कि आप कोई टीवी सीरियल देख रहे हैं जहां अक्सर हीरो या हिरोइन मर-मर के जिंदा हो जाते हैं। मुझे अपनी शोकसभा का उत्सव देखकर इतनी प्रन्नता हुई कि ऐसी शोकसभा के लिए एक बार तो क्या मैं हजार बार भी मर सकता हूं। और मर-मर कर जिंदा हो सकता हूं। ऐसी शानदार शोकसभाएं तो मुर्दों के लिए पुनर्जीवारिष्ट का काम करती हैं।
आई-204,गोविंद पुरम,गाजियाबाद
मो,9810243966



रमाकांत पूनम के दोहे...

पल-पल परिवर्तन करे प्रतिभा पावन नीर
परा शक्ति अतिप्रबल है ज्यों विरहा की पीर

 कभी ना मारे मन मरे भोगे भोग अनेक
विश्लेषण कर स्वयं का शेष रह गया एक

 यदि प्रवीण ना कल्पना काहे रचता गीत
पूनम मन में धारि ले गुरुसम होत न मीत

 लिखा रही मां शारदे लिख जाएं इकदंत

कवि केवल मध्यस्थ है आप और भगवंत।
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