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Monday, December 27, 2010

हम हैं वहीं हम थे जहां

आदरणीय योगीजी ने धार्मिक ग्रंथों के अनुशीलन को लेकर जो बात कही है वह अक्षरशः सत्य है कि हम पढ़ते हैं मगर कोई चीज आचरण में नहीं उतारते। इसलिए एक जासूसी उपन्यास और धार्मिक ग्रंथ में कोईफर्क नहीं रह जाता है और हम वहीं खड़े रह जाते हैं जहां हम कल खड़े थे। पढने और अनुशीलन में जमीन आसमान का फर्क होता है।ठीक कहते हैं योगीजी कि-
सचतो यह है ,की तुम आज भी वहीँ खड़े हो जहां गीता के प्रादुर्भाव से पहले खड़े थे !तुम आज भी वही हो जो किसी ओशो या मीरा के आने से पहले थे !किसी चैतन्य के आने से तुम्हारी सोच नहीं बदली !कितने ही धर्म-ग्रंथों का बोझ लिए तुम जी रहे हो लेकिन धर्म से वंचित हो ! गीता तुम्हारे घर में है ,फिर भी कोसों की दूरियां हें ! हर रोज़ बाइबल और कुरान के सामने बैठते हो लेकिन क्राइस्ट और मोहम्मद से दूर ही रहते हो ! हजारों की संख्या में बुद्ध की प्रतिमाएं स्थापित कर लाखों करोडो लोग बोद्ध बन गए लेकिन बुद्ध से वंचित रह गए !
पंडित सुरेश नीरवजी,
आपकी सफल धर्मशाला यात्रा के लिए आपको बधाई। आपने योगीजी के लिए तो कविता ही कर दी है अपने आभार में..वल्लाह क्या बात है..
मुकेश परमार
संपादकःमानव जागृति
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