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Monday, December 27, 2010

सोच में कुछ और था वो सामने कुछ और है


आदरणीय पंडित सुरेश नीरवजी,
क्रिसमस की छुट्टियों से लौटकर आया तो आपके धर्मशाला प्रवास का सुखद समाचार पढ़ा। और साथ में ताजा-तरीन गजल भी। निश्चित ही अगर माहौल अच्छा मिल जाए तो रचनाएं भी अच्छी होती हैं। यह श्री प्रशांत योगीजी के सान्निध्य का परिणाम है कि अत्यंत उम्दा शेरों की सौगात लेकर आप लौटे हैं। मैं उन्हें भी धन्यवाद देता हूं और आपको बधाई भी..
सोच में कुछ और था वो सामने कुछ और है
ढालता हूं मैं उसे पर ढल रहा कोई और है

इक जहां रौशन है तुझमें क्या तुझे मालूम है
जिस्म तो नीरव है तेरा पल रहा कोई और है॥
० श्री प्रशांत योगीजी का सत्य पर आलेख बहुत विचारवान है।
० श्री बीएल गौड़ साहब की रचना बहुत सामयिक है।
० श्री भगवानसिंह हंसजी की ब्रजभाषा में लिखी प्रतिक्रिया रोचक है।
आप सभी को नववर्ष की अग्रिम शुभकामनाएं॥
ओ. चांडाल
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