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Friday, January 7, 2011

साक्षी भाव-प्रकृति और मौलिकता

आज ब्लॉग पर अपनी पोस्ट लिखने के बाद जब मैंने ब्लॉग का अवलोकन किया तो उसमें आदरणीय तिवारीजी और श्री प्रशांत योगीजी के सारगर्भित वक्तव्यों को पढ़ा। बड़ा ही सात्विक आनंद आया। सुख को धकेलकर जब चेतना आनंद को उपलब्ध होती है तो जरूर कुछ महत्वपूर्ण  ही होता है। शब्द की व्युतपत्ति और उसकी भावयात्रा की अगर बारीक पड़ताल की जाए तो व्यक्ति अपनी धारणाओं और अवधारणाओं का कौतुक ध्वस्त होते हुए स्वयं देख सकता है। लेकिन सबकी अपनी मान्यताएं और अवधारणाएं होती तो है हीं। अगर नहीं होंगीं तो ध्वंस किसका होगा। और ध्वंस ही निर्माण का कारण भी है। निर्माण और ध्वंस अन्योन्याश्रित हैं। बात प्रकृतिकी- मैं तो कृति को प्रकृति से ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं। कृति का संक्षेपीकरण है प्रकृति। ठीक वैसे ही जैसे देश से प्रदेश छोटा होता है,साधन से प्रसाधन बिलकुल अलग है और स्तुति से प्रस्तुति छोटी है वैसे ही कृति से प्रकृति छोटी है।प्रकृति भी कृति के अंतर्गत है। प्रकृति के अंतर्गत कृति नहीं है। इसलिए मनुष्य का कृतिक होना प्राकृतिक से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अब सवाल मौलिक होने का। मूल से मौलिक शब्द बनता है। मूल का अर्थ है-जड़। जड़ भरत सबसे ज्यादा मौलिक थे। क्योंकि वे मनुष्य होकर भी अपने पिछले जन्म की मौलिकता को नहीं भूले। पिछले जन्म में वे हिरण थे। मनुष्य होकर भी वे मौलिक रहे। ते मृत्युलोके भुवि भार भूता मनुष्यरूपेण मृगश्चरंति। ऐसे मैलिक हिरण पृथ्वी पर भार हैं। क्योंकि वे जड़ हैं। हर क्षण परिवर्तनशील जो है वही शाश्वत है। वही ऑलवेज़ है। इसलिए मौलिक होना कोई उपलब्धि नहीं बल्कि बीमारी है। मौलिक को जो सत्य का पर्याय समझते हैं उनके लिए अमौलिक होना झूठा होना है मगर ये उनका पूर्वग्रह है। भ्रांत धारणा है। साक्षीभाव को जहां तक मैं समझा हूं तो मैंने इसका अ़र्थ समझा है- अक्ष सहित। अक्ष का एक अर्थ आंख है तो दूसरा वह धुरी जिस पर कोई वर्तुलगति होती हो। वर्तुल गति, गति होकर भी यात्रा नहीं है। जैसे कोल्हू का बेल चलता रहता है पर कहीं नहीं पहुंचता। इसलिए साक्षी होना एक अर्थ में अक्ष से बंधे रहने की अवस्था है। जो गति में भी जड़ता का कारण बनती है।  जो कतई वरेण्य नहीं है। दूसरा अर्थ है- आंख सहित। तब एकाक्षी का मतलब हुआ- एक आंखवाला। तो फिर उसका साक्षीभाव तो खंडित ही हो गया। और अगर देखना ही महत्वपूर्ण है तो यह पश्य क्रिया तो पशु को भी उपलब्ध है। पश्यति सःपशु। अब अगर इस साक्षीभाव को ध्यान से देखना माना जाए तो लोचन से ध्यानपूर्वर्क देखनेवाला ही आलोचक है और  लोचन से ध्यानपूर्पक ताड़नेवाला ही लुच्चा भी कहलाता है। और अब प्रश्न यह भी कि आखिर देखता कौन है। कभी-कभी ऐसा होता है कि ठीक हमारी आंख के सामने से हमारा जाननेवाला निकल जाता है मगर हम उसे देख नहीं पाते। वह हमसे शिकायत करता है कि हमने उसे अनदेखा कर दिया तब हम कहते है कि हमें माफ करना हमारा उस वक्त ध्यान कहीं और था। मतलब ये हुआ कि देखती आंख नहीं है। देखता ध्यान है। देखती चेतना है। आंख नहीं देखती। और जो आंख देखती है क्या वह हमेशा सत्य ही होता है। रेगिस्तान में हिऱण की आंख नदी देखती है। मगर ये सत्य नहीं मरीचिका होती है। चलती रेल में हमें पेड़ पीछे भागते दिखते हैं। यह विस्थापनाभास है। तो आंख की साक्ष्य भी झूठी। साक्ष्यभाव शब्द दुर्घटित है इसकी जगह सचेतनभाव या ध्यानावलोकन शब्द ज्यादा सार्थक जान पड़ता है। ऐसा मैं समझता हूं। ये सब बातें मैंने इसलिए  की ताकि हम लाओत्से की यह बात समझ लें कि शब्द हमेशा छोटे पड़ते हैं,सत्य को अभिव्यक्ति देने में। हमें उस अवस्था को उपलब्ध होना है जहां शब्द से ज्यादा चुप्पी हमारे लिए ज्यादा अर्थवान हो जाए। योगीजी और तिवारीजी को मेरे मौन अभिवादन... बस इतना ही..
पंडित सुरेश नीरव
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