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Sunday, February 13, 2011

भाषा के कट्टरपन को खारिज करता है वहीं उसको अनावश्यक महत्व देने की अतार्किक प्रवृति पर भी लगाम कसता है।

 आदरणीय श्री  विश्वमोहन तिवारीजी 
आप एक सार्थक अभियान से लौटे हैं,इस हेतु आपको कोटिशः बधाई। आप स्वयं अपने आप में एक जीवंत संस्थान हैं और आपकी शीतल-स्निग्ध छाया में तमाम संस्थाएं पुष्पित-पल्लवित होती रही हैं ,और हो भी रही हैं।
0 मैं भी आज ग्वालियर तथा भोपाल के लिए रवाना हो रहा हूं। और वहां अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन के समारोह में भाग लूंगा।
0अंग्रेजी की वैकल्पिक उपयोगता पर आपका आलेख जहां भाषा के कट्टरपन को खारिज करता है वहीं उसको अनावश्यक महत्व देने की अतार्किक प्रवृति पर भी लगाम कसता है।
इन पंक्तियों में आपने काफी-कुछ कह दिया है-
हमें अंग्रेजी भाषा अवश्य सीखना चाहिये, किन्तु एक अतिरिक्त उपयोगी भाषा की तरह, न कि अपनी भाषाओं की कीमत पर। संस्कृति के भ्रष्ट होने के अतिरिक्त अंग्रेजी में जीवन जीने की दो महत्वपूर्ण हानियां और हैं।एक तो हम सीखी गई विदेशी भाषा में अनुसंधान तथा सृजन उतनी कुशलता तथा उत्कृष्टता से नहीं कर सकते जितना अपनी मातृभाषा में आत्मसात किये ज्ञान के द्वारा। तभी इज़राएल जैसा देश जिसकी आबादी हमारी आबादी के एक प्रतिशत से भी कम है, विज्ञान में ग्यारह नोबेल पुरस्कार ले चुका है – हमारे एक के स्थान पर । इज़राएल जो 1948 में जन्मा और उसने हिब्रू को राष्ट.भाषा बनाया जो किसी भी देश की भाषा नहीं थी। योरोपीय देशों को तो छोड़ ही दें, अपनी भाषाओं में कार्य करते हुए जापान, चीन, कोरिया भी वैज्ञानिक प्रपत्रोंं, पीएचडी, अनुसंधानों आदि में हमसे आगे हैं और समृद्धि में भी। आर्थिक समृद्धि तथा आर्थिक स्वतंत्रता आज विज्ञान – प्रौद्योगिकी की समृद्धि पर निर्भर करती है। अर्थात अंगे्रजी की गुलामी हम जिस उद्देश्य से कर रहे हैं वह भी पूरा नहीं हो सकता। और विडम्बना है कि इस भोगवादी नशे में कोई इस सरल सत्य को भी नहीं समझना चाहता !
मेरे प्रणाम...
पंडित सुरेश नीरव
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