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Monday, February 7, 2011

नर्म-नर्म आहट पर पांव चल रहे होंगे



मंजु ऋषि की कविता पढ़ी। पूरा बुद्ध का दर्शन अपनी पंक्तियों में कह दिया है। बुद्ध ने कहा
था कि संसार में सब नष्टवान है सिर्फ दुख है जो मरता नहीं है। दुख शाश्वत और सनातन है। दुख के द्वार से ही दुख के पार जाया जा सकता है। यही तो मंजु ने कहा है-
प्रेम के अलावा
सिर्फ दुःख है
जिसकी किस्में नहीं होती
वह अपने भदेस रूप अपनाए
रंग के साथकरता है
चहलकदमीप्रेम के अलावा सिर्फ दुःख है
जिसकी मृत्यु नहीं
. इसके बाद ब्रह्ममर्षि पंडित सुरेश नीरव की ग़ज़ल पढ़ी। कितने कोमल प्रतीक और बिंब योजना को ग़ज़ल में पिरोया है लगता है ग़ज़ल अपने होंठों से कोई मीठा-सा गीत गा रही है। आंसुओं की सूरत में दर्द ढ़ रहे होंगे। तन्हा-तन्हा बस्ती में फूल से खयालों के नर्म-नर्म आहट पे पांव चल रहे होंगे। हर शेर लाजवाब है। बहुत गर्व होता है नीरव तुम्हें पढ़कर। मेरी उमर तुम्हे लग जाए।
धूप में
परिंदों के पंख जल रहे हों
गे
आंसुओं की सूरत में दर्द ढल रहे होंगे
तन्हा-तन्हा बस्ती में फ़ूल से ख़यालों के
नर्म-नर्म आहट पर पांव चल रहे होंगे
गर्म-गर्म सांसों के रेशमी अलावों में
मोम के बदन तप कर आज गल रहे होंगे
चांद-जैसी लड़की के शर्बती से नयनों में
ख्वाब कितने तारों के रात पल रहे होंगे
जुगनुओं की बस्ती में भोर ले के निकले हो
सबकी आंखों में नीरव आप खल रहे होंगे।
जगदीश परमार
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