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Thursday, March 10, 2011

दुर्लभ सामग्री है आपके महाकाव्य में

श्री भगवान सिंह हंसजी...
आपने अपने महाकाव्य में जटायु के पिता का नाम अरुण और माता का नाम श्येनी बताया है और उन्हें महर्षि कश्यप का प्रपौत्र बताया है। इतनी दुर्लभ जानकारी आपने जयलोकमंगल के पाठकों को दी है,इसके लिए आप यकीनन बधाई के पात्र हैं। मेरे पालागन..
पंडित सुरेश नीरव
तब वह खग मधुर मधुर भाषा। प्रभु दर्शन की मम अभिलाषा। ।
वत्स! जान मित्र हूँ स्वताता। नाम जटायु व वंश बताता। ।
राम के पूछने पर वह खग मधुर-मधुर बोलता है। आपके दर्शन की मेरी बहुत अभिलाषा थी। वत्स! यह जानो कि मैं आपके पिता का मित्र हूँनाम जटायु है। और मैं अपना वंश बताता हूँ।
कश्यप तिय ताम्रा जग सोही। उसकी सुता शुकी मन मोही । ।
शुकी पुत्री नाता जग माहीं। तासु विनता जन्म भू ताहीं। ।
कश्यप ऋषि की पत्नी ताम्रा जग में बहुत शोभित थी। उसकी पुत्री शुकी मन को मोहित करने वाली हुई। शुकी की पुत्री नाता जग में आयी। और उसकी पुत्री विनता ने प्रथ्वी पर जन्म पाया।
विनता के पुत्र सुहाए। गरुड़ औ , अरुण नाम कहाए। ।
प्रभु! वाही अरुण मेरे टाटा। विदुषी श्येनी है मेरी माता। ।
विनता के दो पुत्र हुए। एक गरुड़ और दूसरा अरुण। प्रभु! वही अरुण मेरे पिता हैं। मेरी माता का नाम श्येनी है जो बड़ी विदुषी है।
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