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Tuesday, May 10, 2011

पंक्तियां तो विश्वास और आस्था का मंत्र हैं-

 आदरणीय कर्नल विपिन चतुर्वेदीजी,
बहुत सुंदर गीत लिखा है आपने। ये पंक्तियां तो विश्वास और आस्था का मंत्र हैं-
मेरा मस्तक ऊँचा रहता, केसी भी आफत आई हो
मेरी न विश्व मैं मंजिल है, हर कठिन किनारा पथ मेरा
तूफ़ान भरे है मुझमें ही, तूफानी सागर रथ मेरा

तूफानों की ज्वाला मैं दमकाया है जीवन कुंदन को
ये युगों युगों तक गूंजेगा जो गीत सुनाऊंगा तुमको..
बधाई
पंडित सुरेश नीरव

Thursday, April 28, 2011

अच्छे शेर हैं

जबरदस्त शेर हैं
लोकमंगल को रोज लगभग बारह हजार लोग पढ़ रहे हैं।
आदरणीय गौड़ साहब,
आपके शेर जबरदस्ती के शेर नहीं हैं बल्कि जबरदस्त शेर हैं। आप ने बढ़िया शेर कहे हैं। बहुत ही सूक्ष्म संकेतों में बड़ी गहरी बातें हैं। बधाई..
सुरेश नीरव

Tuesday, March 15, 2011

हंसजी बहुत अच्छी होली लिखी



श्री भगवानसिंह हंसजी,आपकी होली की रचना बहुत अच्छी लगी। पूरी मस्ती है होली की। श्री प्रशांत योगीजी ने पर्यावरण को लेकर जो पंडित सुरेश नीरव की पंक्तियां उद्धृत की हैं,वह बहुत सामयिक और मार्मिक हैं। श्री तिवारीजी के अलेख से जानकारी मिली कि आज भी हमारे देश के वैज्ञानिक उपेक्षित ही हैं। पंडित सुरेश नीरव ने जानकारी काफी समीक्षात्मक दी है।

बैयां मेरी दोउ पकड लीनी,

मुखड़ा पै अबीर रगड़ दीनी,

और रगडी कालौंछ कारी ,

गालन की आब बिगारी रे।

आई रे होली आई रे । ।

सिर पै डारी बाल्टी भरकै,

आगे पीछे से तर करकै,

और लिपटके थपकी मारी

नीचे से टपकी सारी रे ।

आई रे होली आई रे ।

बैयां मेरी दोउ पकड लीनी,

मुखड़ा पै अबीर रगड़ दीनी,

और रगडी कालौंछ कारी ,

गालन की आब बिगारी रे।

आई रे होली आई रे । ।

सिर पै डारी बाल्टी भरकै,

आगे पीछे से तर करकै,

और लिपटके थपकी मारी

नीचे से टपकी सारी रे ।

आई रे होली आई रे ।जगदीश परमार

Thursday, March 10, 2011

दुर्लभ सामग्री है आपके महाकाव्य में

श्री भगवान सिंह हंसजी...
आपने अपने महाकाव्य में जटायु के पिता का नाम अरुण और माता का नाम श्येनी बताया है और उन्हें महर्षि कश्यप का प्रपौत्र बताया है। इतनी दुर्लभ जानकारी आपने जयलोकमंगल के पाठकों को दी है,इसके लिए आप यकीनन बधाई के पात्र हैं। मेरे पालागन..
पंडित सुरेश नीरव
तब वह खग मधुर मधुर भाषा। प्रभु दर्शन की मम अभिलाषा। ।
वत्स! जान मित्र हूँ स्वताता। नाम जटायु व वंश बताता। ।
राम के पूछने पर वह खग मधुर-मधुर बोलता है। आपके दर्शन की मेरी बहुत अभिलाषा थी। वत्स! यह जानो कि मैं आपके पिता का मित्र हूँनाम जटायु है। और मैं अपना वंश बताता हूँ।
कश्यप तिय ताम्रा जग सोही। उसकी सुता शुकी मन मोही । ।
शुकी पुत्री नाता जग माहीं। तासु विनता जन्म भू ताहीं। ।
कश्यप ऋषि की पत्नी ताम्रा जग में बहुत शोभित थी। उसकी पुत्री शुकी मन को मोहित करने वाली हुई। शुकी की पुत्री नाता जग में आयी। और उसकी पुत्री विनता ने प्रथ्वी पर जन्म पाया।
विनता के पुत्र सुहाए। गरुड़ औ , अरुण नाम कहाए। ।
प्रभु! वाही अरुण मेरे टाटा। विदुषी श्येनी है मेरी माता। ।
विनता के दो पुत्र हुए। एक गरुड़ और दूसरा अरुण। प्रभु! वही अरुण मेरे पिता हैं। मेरी माता का नाम श्येनी है जो बड़ी विदुषी है।

Monday, March 7, 2011

मम स्वामी को बता बयारा। तरु लता को भी मम इशारा।

श्री भगवान सिंह हंसजी 
आपके बृहद भरत चरित को पढ़कर बड़ा सात्विक आनंद आता है। आज का प्रसंग तो बहुत ही भावुक है। आपको बहुत बधाई.
पंडित सुरेश नीरव
हा स्वामी! बिलोक इस ओरा। रावण को दो दंड कठोरा। ।
जोर जोर से सीय विलापा । क्रूर ने दिया बहु संतापा। ।
हा स्वामी! इस देखो। इस रावण को कठोर दंड दो। सीता जोर- जोर से इस तरह विलाप कर रही है उस क्रूर ने मुझे बहुत दुःख दिया है।
मम स्वामी को बता बयारा। तरु लता को भी मम इशारा। ।
हे गोदावरी! मम प्रणामा। स्वामि से कहो हरी स्वभामा। ।
हे बयार! तू जाकर मेरे पति को बता दे। हे तरु-लता! मैं तुम को भी इशारा करती हूँ। हे गोदावरी! मैं तुझे भी प्रणाम करती हूँ। तुम सब जाकर मेरे स्वामि को कहो कि प्रभु! तुम्हारी पत्नी का रावण ने हरण कर लिया है।

Sunday, March 6, 2011

बहुत अलग अंदाज़ में आपने शेर कहे हैं


आदरणीय नीरवजी..
आपकी आज की ग़ज़ल पढ़ी। बहुत अलग अंदाज़ में आपने शेर कहे हैं। और हर शेर ही ग़ज़ल का हासिले मुकाम शेर है। बहुत उम्दा थी आपकी ग़ज़ल और इन शेरों का तो कहना ही क्या है-
मैं खो गया था अंधेरों में बुझ-बुझा के कहीं
चराग उसने बनाया है फिर जला के मुझे
oo
छिपे हैं जलते हुए लम्हों के दिए मुझमें
उजाला घर में कर इकबार तू बुला के मुझे

oo
टहलने निकला है वो आज आसमानों में
सुलगती छांव में बेआसरा सुला के मुझे।

oo
डॉक्टर प्रेमलता नीलम

Tuesday, March 1, 2011

हर बार एक आंसू व्यर्थ ही बहेगा !!



दिन चढेगा तू आगे बढेगा
रोशनी के लिए लड़ेगा
खून का घूँट पीना पड़ेगा
अब अगर दिन ढल गया
और तू कुछ कर सका
तुझे जो मिली नयी ज़िंदगी
उसको तू व्यर्थ कर गया ! दिन तो ढलेगा
गर मर-मर के तू जिएगा
हर बार एक आंसू व्यर्थ ही बहेगा !!
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आत्मीय मंजुऋषि..
आपकी रचना बहुत संवेदनशील और अर्थपरक है।ऐसी रचनाएं मन में आशा की एक किरण जगाती हैं और नया विश्वास देती हैं जीने का। आप मन हो जो मन की आंखों से सबके मन में झांकने की कुव्वत रखता है। मेरे स्नेह..
डॉक्टर प्रेमलता नीलम
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हमारी भानवाओं को प्लीज अन्यथा न लें।


मंजुश्रषिजी
आपके शुभ दर्शन ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद नसीब हुए हैं। आप बीच-बीच में मंजुजी कहां चली जाती हैं। अगर कोई बहुत बड़ी मजबूरी हो तो भी हम उम्मीद करते हैं कि आप ब्लाग पर सूचना जरूर दिया करें। कि आप इतने दिन ब्लाग पर नहीं आसकेंगी। हमारी भानवाओं को प्लीज अन्यथा न लें। आपकी रचना बहुत अच्छी लगी। आपको बधाई॥
छत की मेरी मंडेर करे आज ठिठोली है
बहुत दिनों के बाद चिरैया बोली है
ओमप्रकाश

Sunday, February 27, 2011

कहे मक़बूल हम ऐसे मददगारों से डरते हैं

मक़बूलजी
सचमुच ऐसे मददगारों से डरकर ही रहना चाहिए जो मदद करने के लिए पहले आदमी को अपने जाल में फांसकर निरीह बना देते हैं। और लतीफेबाजों ने तो तदजीब का कचूमर निकाल ही दिया है। मुबारकां.मुबारकां
पंडित सुरेश नीरव
अलिफ़ तहज़ीब की जिनके कभी ना पास आई हो
लतीफ़ेबाज़ जो होते, वो फ़नकारों से डरते हैं।

पहले जाल में फांसे, बना कर बात मीठी जो
कहे मक़बूल हम ऐसे मददगारों से डरते हैं।
मृगेन्द्र मक़बूल

Wednesday, February 23, 2011

अब आंखों से आंसू ही झरते रहेंगे

था बेहतर उसूलों की चर्चा न करते
अब आंखों से आंसू ही झरते रहेंगे
सभी बंदिशों की उड़ाकर के धज्जी
जो पीते हैं  पीकर वो मरते रहेंगे
हे कुर्सी पर काबिज़ मिनिस्टर ये जब तक
गलीचों पे चमचे पसरते रहेंगे
खड़े जो इलैक्शन में हो जाएं शायर
तो ना घाट के और न घर के रहेंगे
आदरणीय पंडित सुरेश नीरवजी
बहुत ही मार्मिक ग़ज़ल आपने कही है। एक-एक शेर लाजवाब है। इन शेरों में हंसी भी है,करुणा भी है और व्यंग्य भी है। बधाई..
हीरालाल पांडेय

Wednesday, January 5, 2011

खुशियाँ हो गईं बाँझ

श्री बी.एल.गौड़ साहब,
जीवन के संघर्ष और फिर तमाम मुश्किलों से मिली सफलता मैं रिश्ते किस तरह समय के हाथ से रेत के कणों से बिखर जाते हैं इसका बहुत ही मार्मिक चित्रण आपने कविता में किया है।  बहुत कुछ पाकर संवेदनाओं के स्तर पर कितना रीत जाता है आदमी। इस व्यथा-कथा का सुंदर चित्रण है आपकी कविता। खासकर ये पंक्तियां-
प्रखर धूप जीवन की
जाने कब सुरमई हुई
फिर धीरे धीरे चुपके चुपके
उतरी आँगन सांझ
अंतर कलह पी गई रौनक
खुशियाँ हो गईं बाँझ
आनन् फानन चौड़े आँगन
होने लगी चिनाई
सूनी आँखों अम्मा ताके
जबरन रोक रुलाई
कटे पेढ़ से घर के मुखिया
बैठे द्वार अकेले
टाक रहे सूने अम्बर में
विगत काल के मेले
एक आस पर अब तक जीवित
ना जाने कब आते जाते
किसी राह में फिर मिल जाए
बची खुची वह गज़ब ख़ुशी।
सार्थक कविता के लिए बधाई..
पंडित सुरेश नीरव