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Saturday, June 4, 2011

भ्रष्टाचार मिटाने पर आमादा


हास्य-व्यंग्य-
भ्रष्टाचार ने बड़ौ दुख दीनौ
पंडित सुरेश नीरव
ऱाष्ट्रकुल खेलों में भरपेट भ्रष्टाचार का खेल खेलने के बाद भ्रष्टाचार मिटाओ का खेल आजकर देश में काफी लोकप्रिय हो रहा है। जिसे मौका मिलता है नही भ्रष्टाचार मिटाने पर आमादा हो जाता है। मीडिया भी क्रिकेट के बाद भ्रष्टाचार मिटाओ की लुभावनी झांकी को दिखाते हुए छलक-छलक जा रहा है। और लोगबाग भी बड़े श्रद्धा भाव से इस झांकी के देवताओं को निहारते हुए,राजनेताओं को गरियाने के अखंड कीर्तन में लगे हुए हैं। मीडिया जिस उत्साह से पहले संसार में प्रलय ला रहा था उसी आस्था के साथ अब वो भ्रष्टाचार मिटाने में जुट गया है। तिहाड़ जेल में पिकनिक मना रहे भ्रष्टाचार के सिद्ध खलीफा बड़े मुदित भाव से इस आयटम को लाफ्टर शो की जगह देख-देखकर अट्टहास कर रहे हैं। जैसे तलाक की धमकी के आगे  कभी शरीफ बीवियां थर-थर कांपने लगती थीं ठीक वैसे ही भ्रष्टाचार मिटाने की धमकी के आगे अब सरकार कांपने लगी है। वैसे भी कुछ लोग बीवी को सरकार और कुछ सरकार को बीवी ही समझते है। अभी अन्ना के अनशन से चौकन्ना सरकार संभलने-संभलने को थी कि अब उसे सताने योगीजी आ पहुंचे। सतयुग में जब कोई योगी उग्र तपस्या करता था तो उसकी तपस्या से इंद्र का सिंहासन डोल जाता था। अब कलयुग में तो इंद्र के सिंहासन को हिलाना ही योगियों की तपस्या हो गयी है। योगी खुद दिल्ली पहुंच जाते हैं,अपने चेले-चेलियों के साथ। मामला भ्रष्टाचार का जो ठहरा। और ये जनम-जनम के भ्रष्टाचार उखाड़ू।  
  पुराने ज़माने की कहानियों में राक्षस के प्राण पिंजरे में कैद किसी तोतो में हुआ करते थे। राक्षस को मारना असंभव होता था। फिर कोई बुढ़िया राजकुमार या राजकुमारी को पिंजरे के तोते का भेद बताती थी। भटकता हुए राजकुमार या राजकुमारी पिंजरे तक पहुंचते थे और  राक्षस की गर्दन मरोड़ देते थे। लगता है इन भ्रष्टाचारहटाओ नस्ल के उस्तादों को भी पता लग गया है कि सरकार के प्राण भ्रष्टाचार के तोते में ही बसते हैं।  वे जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के बिना सरकार तो बिना स्क्रीन का कंप्यूटर होती है। वे सरकार को धमकी देते हैं। मरोड़ूं तेरी गर्दन। हटाऊं भ्रष्टाचार। इधर धमकी दी करि उधर सरकार कदमों में गिरकर गिड़गिड़ाने लगती है-मेरी जान बख्श दो मेरे आका। बदले में जो चाहो ले लो। शास्त्रों में लिखा है कि ऐसे भावुक मौके पर अच्छी डील हो जाती है। सौ-सौ के नोट लेकर चुंगी से ट्रकों को छोड़ता नाकेदार, रिश्वत लेकर चोर को छोड़ता थानेदार,टेबिल के नीचे से नोट लेकर फाइल आगे बढ़ाता बाबू,दूध में पानी मिलाता दूधिया,सीमेंट में रेत मिलाता ठेकेदार अर्थात् भारत देश के नाना प्रकार के श्रेष्ठ आर्यजन कोरस में गा रहे हैं- स्वामीजी आएंगे...भ्रष्टाचार मिटाएंगे। ईमानदारी का हाथ...अन्ना के साथ। बाबा भ्रष्टाचारियों को फांसी देने की जिद पर अड़ गए हैं। सरकार की तो जान के लाले पड़ गए हैं। सरकार सोच रही है कि कहीं उसने सीरियसली भ्रष्टाचारियों को फांसी पर लटकाने का उत्सव शुरू कर दिया तो देश में शेष-विशेष कितने ग्राम लोग बच पांएगे। इघर बाबा भी सोच-सोचकर तनाव में है कि सरकार कहीं उनके मज़ाक को गंभीरता से न ले बैठे। और कहीं खेल-खेल में बाजी अन्ना लोकपाली के हाथ न आ जाए। बाबा की भूख-प्यास गायब है। वे अनचाहे ही अनशन की चपेट में हैं। भ्रष्टाचार हटाओं स्थल से लौटे कई लोगों की जेबें साफ हो गईं हैं। वे भुनभुनाते हुए गुनगुना रहे हैं- हो रामा...भ्रष्टाचार ने बड़ौ दुख दीनौ..।
आई-204,गोविंदपुरम,ग़ज़ियाबाद-201001

Friday, November 26, 2010

परंपरा को लाइटली लेना भी हमारी परंपरा है।


हास्य-व्यंग्य-
परंपरा की परंपरा
पंडित सुरेश नीरव
हमें गर्व है कि हम हिंदुस्तानी हैं। जहां आज भी परंपराओं को निभाने की परंपरा जिंदा है। भले ही आदमियत मर चुकी हो। पैदा होने से लेकर मरने तक यहां आदमी परंपराओं को निभाता है। सच तो यह है कि यहां आदमी परंपराओं को ही ओढ़ता है औऱ परंपराओं को ही बिछाता है। परंपराएं ही पीता है, परंपराएं ही खाता है। और खुशी की बात ये है कि इन परंपराओं को सबसे पहली गिफ्ट वह अपनी फेमिली से पाता है। भले ही सभ्यता के विकास के साथ-साथ देश में जंगल और परिवार के आकार दोनों ही छोटे हो गए हों मगर हमारी निष्ठाएं इनके आकार की चिंता किए बिना भी बदस्तूर बरकरार हैं। पहले सौ-सौ सदस्योंवाले परिवार और हजार-हजार पेड़वाले जंगल हुआ करते थे। अब दो-या-तीन पेड़ों के जंगल और दो या तीन बच्चोंवाले विराट परिवार ही देश की शोभा के लिए रह गए हैं। शरीफों के सर्किल में तो अब पत्नी ही फेमिली का पर्याय हो गई है। आजकल जो भी निमंत्रण आता है उसके एक कोने में विद फेमिली या सपरिवार शब्द का डेकोरेटिव जुमला जरूर लिखा रहता है। मंहगे कार्ड पर इस डेकोरेटिव शब्द के लिखने से उसकी सज-धज में थोड़ा और इजाफा हो जाता है।  वैसे इस जुमले को लिखनेवाले और पढ़नेवाले दोनों ही इसे उतनी ही गंभीरता से लेते हैं जितना कि सिगरेट पीनेवाला पेकेट पर सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है-जैसी फालतू की सूचनाओं को लेता है। ऐसे डेकोरेटिव जुमले लिखना हमारी परंपरा है। और परंपरा को परंपरा की तरह ही लाइटली लेना भी हमारी परंपरा है। कोई भी सीरियसली इसे दिल पर नहीं लेता है। पर क्या करें
परंपरा हमारा कभी पीछा ही नहीं छोड़ती हैं। अब देखिए न कि जैसे ही छात्रवर्ग को अक्षरज्ञान होता है, वह विद्यालय की प्रसाधन-भित्ति को अपनी अंतरंग,कोमल-मुलायम अभिव्यक्ति का कैनवस मानते हुए उसे प्रतिदिन अपनी मनपसंद आत्मीय आकृतियों और वाक्यसूत्रों से सजाकर एक अनकहा रचनात्मक सुख प्राप्त करता है। औपचारिकतौर पर ऐसा सुख उसे शादी के बाद ही मिलता है। मुझे लगता है कि स्कूली टायलेट की दीवारों को अक्षऱ-आकृति मंडित करने की परंपरा हमारे देश में तब से चली आ रही है जब शिक्षा का माध्यम पाली,प्राकृत और संस्कृत हुआ करते थे। और आज जबकि हिंदी को पछाड़कर अंग्रेजी मीडियम के कुकुरमुत्ती कान्वेंट पाठशालाएं देश में फल-फूल रही हैं तब भी तक्षशिला से कान्वेंट तक हमने अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जन्मसिद्ध अधिकार को पूरी निष्ठा से बरकरार रखा है। क्योंकि यह हमारी गौरवशाली परंपरा है। हमारी राजनैतिक व्यवस्था भी हमेशा परंपरावादी ही रही है। और इस व्यवस्था की आलोचना करना भी हमारी सनातन परंपरा रही है,जो कल भी थी,आज भी है और भगवान ने चाहा तो कल भी जारी रहेगी।  एक उत्कृष्ट देश के निकृष्ट नेतृत्व से संचालित होने की परंपरा हमारी शाश्वत-सनातन परंपरा है। तब भी राजधानी को चौपट नगरी और राजा को चौपट राजा कहा जाता था, आज भी जनता सम्मान से राजधानी और सत्ताप्रमुख को इतिहास के इसी सम्माजनक अलंकरण से संबोधित करती है। यह हमारी परंपरा भी है। टका सेर भाजी,टकासेर खाजा की समाजवादी अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय की परंपरा तब भी थी और आज भी है। राजा की धारावाहिक मूर्खताओं को हंसते हुए झेलने की परंपरा तब भी थी और आज भी है। हर प्राणी में ईश्वर का वास है,यह मानते हुए गये-गुजरे समय में भी आदमी और पशुओं में सदभाव की परंपरा के तहत गधों को पंजीरी खिलाई जाती थी। आज भी गधों का यह पुश्तैनी अधिकार पूरी निष्ठा के साथ आरक्षित है। रूपसियां तब भी मेकपधर्मी थीं,आज भी हैं। तब भी बूढ़े विश्वामित्र की तपस्या मेनका भंग कर देती थी आज भी राजभवनवाले तिवारीजी की राजनैतिक तपस्या तेजस्वी-ओजस्वी मेनका या मोनिका ही भंग करती है। स्त्री के सतप्रयासों द्वारा बूढ़ों का पथभ्रष्ट होना हमारी स्वर्णिम परंपरा है। हमारी परंपराएं शाश्वतहैं,सनातन हैं। अजर हैं,अमर हैं। ये कभी नष्ट नहीं होतीं। अब देखिए कि पति अपने को चाहे कितना भी बुद्धिजीवी माने पत्नी की निगाह में वह हमेशा से ही एक भौंदू प्राणी रहा है। कालिदास,तुलसीदास से लेकर देवदास तक- हाय पति तेरी एक ही कहानी। मैं भी अपने को एक बुद्दिजीवी मानता हूं और सौभाग्य से पत्नी की नज़र में अपुन भी कालिदास और तुलसीदास की टक्कर के ही बुद्धिजीवी हैं। आप भी यकीनन इन्हीं के टक्कर के होंगे। हर पति होता ही है। ये बात दीगर है कि पत्नी की झिड़कियां खाकर आजन्म हंसते रहने को अभिषप्त,मायावी तंत्र से त्रस्त बेचारे पतियों को इसका आत्मबोध जीवनपर्यंत हो ही नहीं पाता है। भौंदू के साथ-साथ पति को पत्नियों द्वारा परमेश्वर मानने की परंपरा बहुत प्राचीन है। यह है समन्वय की दृष्टि। पत्नियों की दृष्टि में दोनों ही बराबर हैं। कोई ऊंच-नीच नहीं। मगर अपमान की कीचड़ में बिलबिलाते हुए पतियों को, पत्नियों के इस धारावाहिक परोपकार का पता ही नहीं चलता है कि वे किस तरह चुपके-चुपके ज़िंदगी के न जाने कितने एपीसोडो में परमेश्वर की तरह पूजे जा रहे हैं। सदियों-सदियों के लाखों-लाखों करवाचौथ इस बात के सबूत है कि पति परमेश्वर के रूप में पत्नियों द्वारा पूजे जाते चले आ रहे हैं। आदमी पुजता  रहे और उसे पता तक न चले, हमारी यही परंपरा है। जो इत्तफाक से पूरी दुनिया में और कहीं नहीं है। एनआरआई प्रजातियों के कारण पतिपरमेश्वर के पूजने की छुटपुट वारदातों के समाचार विदेशों से भी आए दिन अब हमें मिलने लगे हैं। स्टेंडर्ड भारतीय पतियों को प्रकृति से यह अधिकार प्राप्त है कि वे कठोर निवेदन के साथ पत्नियों का मधुर-मधुर विरोध करते हुए आजन्म उन्हें अपनी अर्धांगिनी कहें,भले ही वह सौभाग्यवती आकार में पति से दोगुनी ही क्यों न हो। भारी पत्नी-भारी भाग्य। यूं भी पत्नी तो हमेशा ही सौभाग्यवती ही होती है। और पति का भाग्य हमेशा भगवान भरोसे होता है। इस पराधीनता को जीना ही पति नामक निरीह प्राणी की नियति है। सिद्धांततः कहने को भले ही भाग्य को भगवान भरोसे कहा जाता है,मगर जमीनी हकीकत यह है कि पति का भाग्य हमेशा पत्नी के पल्लू की गांठ में बंधा होता है। पति परमेश्वर। यानी बीवी के पल्लू में भगवान...। भगवान भी अपनी दिव्य लीला में मनुष्य-जैसा ही आचरण करते हैं। पत्नी का आदेश न मानने की जुर्रत भगवान में भी नहीं होती। एक बार जंगल में सीताजी ने पति राम को आदेश दिया कि मेरे लिए स्वर्ण मृग मारकर लाओ। एक औसत भारतीय पति  की तरह बिना चूं-चपड़ किए बेचारे हिरण मारने चल दिए। जाते कैसे नहीं। डैडी दशरथ भी तो अपनी धर्म वाइफ का हर आदेश मानते थे, परिणामस्वरूप वनवास का दिलचस्प एपीसोड प्रकाश में आया। फिर चिंरजीव रामजी कैसे सौभाग्यवती सीता की आज्ञा के उल्लंघन का जघन्य पाप कर सकते थे। मान मारकर ही सही घरवाली के कहने पर चल दिए बेचारे हिरण मारने। ऐसे ही एक बार सिनेमावाले सलमानखान को भी अपनी बाहरवाली के कहने पर काला हिरण मारना पड़ा था। पर्दे पर बार-बार शर्ट उतारकर दिखाने से कोई बहादुर थोड़े ही हो जाता है। अपनी फिएंसी की बात नहीं मानता तो वह सरेआम सलमान के कपड़े उतार देती। गए वो भी बेचारे हिऱण मारने। राम हिरणात्मक-क्रीड़ा करके वापस लौटे तो इसी बीच सीताहरण की वारदात हो गई। उधर सलमान जब काला हिरण मारकर वापस लौटा तो हिरणवध के बाद सरकार ने उसका शीलहरण कर उसे सरकारी अशोकवाटिका में डाल दिया। कुल मिलाकर बड़े-बड़े लफड़े का कारण प्राचीन काल में भी हिरण था और अर्वाचीन काल में भी हिरण ही रहा। हिरण हमारी परंपरा है। जो इस परंपरा को तोड़ता है उसका अपने आप नशा हिरण हो जाता है। पत्नी या प्रेमिका का आदेशपालन हमारी सेकुलर परंपरा है। परंपरा भी और सेकुलर भी। इसे कहते हैं सोने पे सोहागा। नई पीढी के मद्देनजर यहां यह बताना आवश्यक रूप से जरूरी है कि श्रीराम हिंदू समुदाय से थे और सलमान मुसलमान समुदाय के हैं। और ऐसी मान्ता है कि दोनों हिरण  (सलमानवाला भी और रामवाला भी) धर्मनिरपेक्ष थे। इतिहास गवाह है कि हिंदुस्तानी प्रेमिकाएं और पत्नियां भी हिरण की तरह पैदाइशी सेकुलर होती हैं.। सेकुलर बांकी हिरणियां। यही हमारी परंपरा है। अकबर की जोधाबाई, फिरोजखान की इंदिराजी और राजीव की सोनियाजी से लेकर शाहरुख खान की गौरीजी तक। इन सबके बहुमूल्य सहयोग से हमारी गौरवशाली परंपरा पूरे गौरव के साथ आज भी बरकरार है। गौरवशाली परंपरा को बरकरार रखना भी क्या कम गौरव की बात है। हम कित्ते भी फटेहाल क्यों न हों,हर हाल में गौरवशाली रहना, हमारी परंपरा है। कल सुबह-सुबह एक गौरवशाली भिखारी ने मेरे दरवाजे की घंटी बजा दी। हमने दरवाजा खोला। भिखारी के मुंह से लेटेस्ट डिजायन की दुआओं का ऐसा धुंआ निकल रहा था कि मेरा मुंह और आंखें अपने आप बंद हो गईं। और चेहरा खेचरी मुद्रा में आ गया। भिखारी को लगा कि मेरी आंखे श्रृद्धा के कारण बंद हो गई हैं। इस गलतफहमी से उसे मुझे आशीर्वाद देने की हिम्मत पड़ गई। कहते हैं न कि सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी। इससे पहले कि मैं अपनी आंखें खोल पाता उसने दुआओं के डंडे से मेरी ऐसी ताबड़-तोड़ धुनाई कर दी कि मैं अपनी खूनखच्चरमयी भावनाओं और विवश विनम्रताओं के साथ,उसके चरणों में मूर्छित होकर आपाद मस्तक गिर पड़ा। उस भिखारी ने लंकेश रावण की ठसक और शोले के गब्बर की धमक के धमाके से सजा-संवरा भीषण अट्टहास किया और फिर अपने पैरों से मेरे अर्ध-पार्थिव शरीर के मलबे को हटाते हुए गरजा- हे आर्यपुत्र..साधु-संतों का सम्मान हमारी परंपरा है। और बेटा तू तो विकट संस्कारी है। तू मेरे पैरों में इतनी निष्टा से कदमलुंठित हुआ कि धोखे से भी यदि निष्टा की मात्रा थोड़ी और बढ़ जाती तो हमें अपने पैरों से तुझे उठवाने के लिए क्रेन मंगवानी पड़ती। बड़ा,हैवी समर्पण है,तेरा। उसके चेहरे पर शाइनिंग इंडिया के पोस्टर की तरह एक अर्थहीन चमक थी। वह बोला- अब तू जल्दी से हैवीवेट दक्षिणा निकाल। बच्चा 500रुपए से कम दश्रिणा हम लेते नहीं हैं। हमने कहा- आप भिखारी हैं,अधिकारी नहीं। इसलिए गिड़गिड़ाइए..हमें मत हड़काइए।. मुझे मालुम नहीं था कि साधु-संतों के सम्मान करने की एक बचकानी हरकत का इतना घातक परिणाम निकलेगा। चलो गलती करना आदमी की फितरत होती है मगर जो गलती को सुधार ले वही विद्वान होता है। दुर्घटनावश अब मैं भी विद्वान हो गया हूं। और विद्वानों की सनातन परंपरा सिर्फ लेना होती है। और हमने विनम्रतापूर्वक आपके आशीर्वाद ले लिए हैं। इसलिए अब आप अपने आगे के एसाइनमेंट के लिए तुरंत सिधार जाएं। मेरा भेजा नहीं खाएं। मेरा आपसे यही कर्कश निवेदन है।
  भिखारी फूट-फूटकर हंसा और बोला- अरे नास्तिक जो मंदिर में जाकर भगवान के आगे घंटे नहीं बजाता है,ईश्वर उसकी घंटी जरूर बजाता है। भगवान तेरी घंटी जल्दी बचाए...अलखनिरंजन। दक्षिणा न मिलने पर वह मुझे कोसता हुआ तत्काल आगे गुजर गया। मैं सोच रहा हूं कि दक्षिणा न मिलने पर दुआ देनेवाले मुंह में बददुआओं का कैसैट कौन रख जाता है।  यह तकनीकि परिवर्तन क्या फौरी प्रतिक्रिया है या ये भी हमारी परंपरा है। तभी आत्मा का साइलेंसर मुखर होता है- यकीनन ये परंपरा ही होगी। तकनीकि तो कल की पैदाइश है। और परंपरा शाश्वत है,सनातन है। नूतन है पुरातन है। भीख मांगना भी हमारी राष्ट्रीय परंपरा है। वह भिखारी भीख मांगकर राष्ट्र की  परंपरा की ही सेवा कर रहा था। इसलिए उसे बदतमीजी करने का पूरा हक है। यही हमारी परंपरा है। और शरीफ नागरिक तो देशभक्तों की कैसी भी बातों का मरणोपरांत भी बुरा नहीं मानते। यह भी हमारी परंपरा है। परंपरा की इस गौरवशाली परंपरा को मेरे पारंपरिक प्रणाम..
आई-204,गोविंदपुरम,गाजियाबाद
मो.9810243966



Wednesday, November 24, 2010

पंच की महिमा ही ऐसी है


आदरणीय नीरवजी,
पूरा लेख एक तेजाब में भीगा आलेख है। पंचायतराज पर आपने बढ़िया निशाने साधे हैं। परंपरा और आधुनिकता दोनों को आपने अच्छे ढंग सेसमेटा है। बधाई...
पंचायतीराज
के मार्ग से ही देश आगे बढ़ेगा। हमारी तो संस्कृति के बिल्कुल माफिक बैठती है, यह व्यवस्था।
जिस भी चीज़ को हाई क्वालिटी का करना हो,उसके के साथ पंच जोड़ देने से चमत्कार हो जाता है। अफसोस है कि हमारे हजारों-लाखों कथाकार जो अपने को समझदार समझते हैं, वो इत्ती-सी बात भी नहीं समझ पाए। केवल विष्णु शर्मा नाम के एक कथाकार ही समझ पाए। उन्होंने अपनी कथाओं के पहले पंचतंत्र जोड़ दिया। वे अमर हो गए। है कोई जो उन्हें टक्कर दे दे। पंचा लपेटे कथा के अखाड़े में वे आजतक सबको ललकार रहे हैं। विष्णु शर्मा-जैसा अमृत्व पाने की लालसा में सैंकड़ों कथाकार पंचत्त्व में विलीन हो गए। और अमरत्व तो क्या बेचारों का पंचनामा तक नहीं लिखा गया। क्योंकि वे ना तो कहीं के पंच थे,और ना ही उनके पास था-नामा। पंच जो नामा कमाता है,या जो नामा पंच को दिया जाता है,आजकल उसे ही पंचनामा कहा जाता है। अब जिनको कभी पंच होने का मौका ही नहीं मिला,. उनकी क्या राय। चाहे मुगल सराय हो या लाढ़ो सराय। और यू भी एश्वर्या राय अभिषेक के पास है। तो फिर काहे की राय। पंचायतीराज में वैसे भी निजी राय की कोई अहमियत नहीं होती। जो पंचों की राय सो हमारी राय। आज की राजनीति का पंचांग यही कहता है। और-तो-और आज जिस डायलाग में पंच होता है,सिर्फ वही याद किया जाता है। आज जिन लेखकों ने इन पंचायती कारनामों का महत्व समझ लिया है,उन्होंने निजी लेखन बंद करके पंचायती लेखन शुरू कर दिया है। इससे सबसे बड़ा फायदा तो उन्हें यह होता है कि रचना के सृजन के ही साथ, या उससे पहले ही पांच प्रबल प्रशंसक पैदा जाते हैं। लेखक रचना की सृष्टि करता है। इसलिए वह ब्रह्मा का ही रूप होता है। और ब्रह्मा भी सृष्टि करता है। उसने तो सृष्टि की ही सृष्टि कर डाली थी। पंच का महत्व उन्हें भी मालुम था इसीलिए वे भी पंचमुखी हो गए। पांच की यही तो प्रतिष्ठा है। ना पांच से ज्यादा ना पांच से कम। रावण ने लालच में दस मुंह हथियालिए। इसलिए राक्षस कहलाया। मट्टी पलीद हो गई। पांच मुंह ही रखता तो पंचमुखी गणेश,और पंचमुखी हनुमान न सही तो कम-से-कम पंचमुखी रुद्राक्ष की हैसियत तो कमा ही लेता। द्रौपदी अपरिग्रही थी। उसने सौ कौरवों की जगह पांच पांडवों में ही संतोष, कर लिया। इसलिए पांचाली के रूप में प्रतिष्ठित हो गईं। पांच पांडवों के सिर पर उसका जादू चलता था। शायद दुनिया की पहली सरपंच थी द्रौपदी। हो सकता हैं और भी हों मगर उनका कोई रिकार्ड नहीं मिलता। इतीहास उन्हीं का होता है जिनका रिकार्ड होता है या जो रिकार्ड तोड़ते हैं। सारा इतिहास पंचों से भरा पड़ा है। पंच की महिमा ही ऐसी है। इतिहास में दुर्घटनावश कई राजा भी हुए मगर उन्होंने पंच का महत्व इतना समझा की अपने को पांचाल नरेश ही कहाते रहे। सोचो तो राजा होकर भी पंच क्यों रहे। अरे,बड़े-बड़े राजा पंच के आगे पानी भरते हैं। द्रौपदी का दुशासन,दुर्योधन क्या बिगाड़ पाए। राजा होकर चीरहरण-जैसी मामूली वारदात तक नहीं कर पाए।
हीरालाल पांडे का ताजमहल को लेकर अच्छा लेख है। जानकारी काफी रोचक हैं। बधाई...
डाक्टरप्रेमलता नीलम

पंचायत की सनातन परंपरा


हास्य-व्यंग्य-
पंचायत की सनातन परंपरा
पंडित सुरेश नीरव
हम प्रगतिशील देश हैं। प्रगति हमारी परंपरा है। इसलिए अन्य क्षेत्रों में प्रगति हो यह तो ठीक है, मगर इसके साथ-साथ परंपराओं की भी प्रगति हो, इसका सरकार विशेष ध्यान रखती है। सरकार किसी मुद्दे पर ध्यान दे अपने-आप में यही विशेष होता है मगर सरकार विशेष ध्यान दे  फिर तो यह सुपर विशेष मामला हो जाता है। प्रगति और परंपरा में संतुलित विकास हो, इसलिए सरकार देश को कंप्यूटर और पंयायती राज दोनों की मदद से आगे बढ़ाएगी। सारा-का-सारा पंचायती राज कंप्यूटर में होगा और खुद कंप्यूटर पंचायत के दफ्तर में। जैसे पानी से भरा मटका तालाब में। मटके के बाहर भी जल और भीतर भी जल। कंप्यूटर के बाहर भी पंचायतीराज और कंप्यूटर के भीतर भी पंचायती राज। ये कबीरी कंप्यूटर है। देश में पंचायतीराज लाने के सारे सरकारी बंदोबस्त हो चुके हैं। सरकार जरूरी अस्त्र-शस्त्रों से पूरी तरह लैस है।वैसे भी संसद और विधानसभा खेलते-खेलते सरकार और जनता को बोरियत-सी हो गई है। कुछ चेंज तो चाहिए ही। इसलिए अब हम सी मिलकर पंचायत- पंचायत खेलेंगे। और फिर हमारी तो संस्कृति ही पंचायत करने की रही है। हमारे तो रोम-रोम में पंचायत बसती है। कुछ अज्ञानी पंचायत को गांव से जोड़कर देखते हैं। यह पंचायत का सरासर अपमान है। पंचायत तो आप शहरों की पाश कालोनी से लेकर खेतों और चौपालों तक सब जगह देख सकते हैं। जहां पांच नर या नारी मिले पंचायत शुरू। औपचारिक पंचायत में तो एक ही सरपंच होता है, मगर इस पंचायत में हर सदस्य सरपंच की हैसियत रखता है। कोई किसी से कम नहीं। सब बराबर। खालिस समाजवादी व्यवस्था। जहां चाही,जब चाही पंचायत बैठा दी। और जब चाही उठा दी। पंचायत भी इस उट्ठक-बैठक में कभी उज्र नहीं करती। बड़ी पोर्टेबल होती है,यह पंचायत। और बड़ी फुर्तीली भी। इधर समस्या आई और उधर फैसला। कभी-कभी तो मुद्दे को आने में देर हो जाती है,फैसला पहले ही हो जाता है। मुद्दा ही समस्या है। और इसके साथ समस्या यही है कि ये समस्या कभी  टाइम पर नहीं आती। जब चाहो तो नहीं आएगी। और जब उसका मूड होगा तो सीना तानकर बिन बुलाए आ जाएगी।  बड़ी स्वेच्छाचारी हो गई हैं-समस्याएं।बिल्कुल आजकल की नदियों की तरह।  जो कभी भी दो गांव के बीच आकर पसर जाएगी। आदमी न इधर जा सके और न उधर का आदमी इधर आ सके। जब चाहा उफन गई। आ गई बाढ़। जिस नदी की बदौलत खेत पनपते हैं, उसी नदी की बदौलत हर साल न जाने कितने खेत खेत रहते हैं। इस नदी की मनमानी से। और मज़ा देखिए कि पच्चीस-तीस साल में जैसे-तैसे हमारी सरकार नदी पर पुल बनाती है,पुल बनाते ही नदी रास्ता बदल देती है। या सूखकर लापता हो जाती है। एक होड़-सी लग गई है,नदियों और सरकार के बीच। इधर सरकार ने पुल बनाया उधर फटाक से नदी सूखी। खूब प्रगति हो रही है। धड़ाधड़ पुल बन रहे हैं,फटाफट नदियां सूख रही हैं। देशवासी परेशान हैं सोचकर कि चलो पानी का तो कुछ नहीं बाजार से खरीद लेंगे,मगर नदियां यूं ही सूखती रहीं तो हम शहरभर का कचरा और कारखानों की गंदगी कहां डालेंगे. पवित्र नदियां सूख जाएंगी तो देवी-देवताओं का विसर्जन कहां करेंगे। हमारे बिहारी भाई छठ कहां मनाएंगे। नदियां बिल्कुल समस्याओं की तरह स्वेच्छाचारी हो गई हैं। शायद पंचायती राज से स्थिति कुछ नियंत्रण में आए। सरकार यही मानती है कि पंचायतीराज के सामने समस्याएं ऐसे ही थऱथऱाएंगी-जैसे ओझा–तांत्रिक के आगे कोई चुड़ैल। वैसे हमारे देश में पंचायतें पहले भी थीं मगर ऐसी समस्याएं कभी नहीं आई। कुछ लोगों का तो यहां तक मानना है कि पंचायतें पहले से थीं देश बाद में बना। पंचायतों ने अपने यूज के लिए ही देश का आविष्कार किया। देश बना,जातियां बनीं और फिर समस्याएं बनीं। सारा देश ही पंचायत की गोद में पल-पोसकर बड़ा हुआ है। हर जाति की अलग पंचायत। अलग हुक्का। इन पंचायतों का जलबो-जलाल देखकर ही सरकार के भी मुंह में सारे देश की नदियों का पानी आ गया। मन ललचा गया पंचायतीराज लाने को। कैसा मनोहारी दृश्य होता है इन निजी पंचायतों का। पेड़ की घनी छांव के नीचे चबूतरे पर पंच परमेश्वर बैठे हैं। घनी-घनी मूंछे,हाथ में डंडा। साक्षात भगवान का रूप। सदभाव से हुक्के पर दम लगाते हुए। प्रेमपूर्वक हुक्का बगलवाले को पास कर रहे हैं। चबूतरे के सामने नर-नारीवृंद बैठे हैं। दो युवा शरीर पेड़ की शाखों से गर्दन में रस्सी बांधकर लटका दिए गए हैं। वे कबूतर की तरह पंख फड़फड़ा रहे हैं। सभी नर-नारी एक अभूतपूर्व जातीय गौरव से भरे प्रेमी युगल की मौत का लाइव टेलीकास्ट देख रहे हैं। सारे माहौल में सर्वसम्मति का दिव्य आलोक फैला हुआ है। वे सभी इस दृश्य को इतने मनोयोग से देख रहे हैं,इतने मनोयोग से तो वे एकता कपूर के सीरियलों को भी नहीं देखते। नाटक और जिंदगी में कुछ तो फर्क रहेगा ही। इन सीरियलों में तो पात्र मर-मर के जिंदा हो जाते हैं। कोई सच्ची-मुच्ची में थोड़े ही मरते हैं। आज तो सच्ची-मुच्ची में मर रहे हैं। पूरी पंचायत के सामने।
  अलग-अलग जातियों के होंगे,ये प्रेमी.एक सूंघा पत्रकार प्रश्न उछालता है। जी,नहीं.. एक ही गोत्र के हैं। दूसरा पत्रकार जवाब देकर उसके प्रश्न के गुब्बारे की हवा निकाल देता है। आनर किलिंग का मामला है। पंचायत का फैसला मानकर दोनों स्वेच्छा से प्राण त्याग रहे हैं। सच हमारे संस्कारों में पंचायत की जड़े बहुत गहरी हैं। ये है व्यव्स्था। मरनेवाले का भी सम्मान और मौत की सजा सुनानेवाले का भी सम्मान। यही सदभाव देश को आगे ले जा सकता है। इसे कहते हैं न्याय। सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। प्राथमिकता भी यही रहती है कि सांप मरे पर लाठी ना टूटे। क्योंकि लाठी अपनी होती है। सांप थोड़े ही अपना होता है। और एक लाठी से कितने सांप मारे जा सकते हैं,ये ना लाठी को मालुम होता है और ना लाठीवाले को।, असीम संभावनाओं का सनातन खजाना होती है- एक लाठी। लाठी टूटी तो सारी संभावनाएं खल्लास। इस लाठी का महत्व जानकर ही तो इत्ते ऊंचे ओहदे पर बैठे हैं,ये लोग। बड़े जानकार लोग हैं। साक्षात परमेश्वर की फोटोस्टेटकापी। एक हाथ में हुक्का, दूजे में लाठी। लहीम-शहीम कद-काठी। हुक्के और पानी का साथ,न्याय का हाथ। जिसका हुक्का-पानी बंद हुआ उसकी प्यास तो कोई पेप्सी भी नहीं बुझा सकती।  पानी खुद प्यासा रहता है इस हुक्के के पानी के लिए। कितनी सतर्क और स्वच्छ व्यवस्था है। चट क्राइम,पट न्याय। वरना तीरीख पर तारीख..फैसले का कोई पता नहीं। ठीक है कि देश में संसद और विधान सभाएं हैं,मगर पंचायत दा ज्वाब नहीं। तभी तो सरकार ने सारे देश में पंचायतीराज लागू कर डालने की ठान ली है। पंचायत करना स्त्रियों का प्रकृति प्रदत्त अधिकार है। सरकार ने इस बात को भलीभांति समझ लिया है।  इसलिए इस व्यव्स्था में स्त्रियों को ईमानदारी से प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है। इसी का सुफल है कि अम्माजी और सीया-जैसी कई महिला सरपंच यथार्थ में ही नहीं सीरियलों के माध्यम से भी प्रकाश में आ रही हैं। यह काम सरकार ने इतनी सफाई से किया है कि सफाई और सफाईकर्मी दोनों का ही सोल्लास सफाया हो गया है। इसे ही कहते हैं सामाजिक न्याय। पंचायतीराज के मार्ग से ही देश आगे बढ़ेगा। हमारी तो संस्कृति के बिल्कुल माफिक बैठती है, यह व्यवस्था।  जिस भी चीज़ को हाई क्वालिटी का करना हो,उसके के साथ पंच जोड़ देने से चमत्कार हो जाता है। अफसोस है कि हमारे हजारों-लाखों कथाकार जो अपने को समझदार समझते हैं, वो इत्ती-सी बात भी नहीं समझ पाए। केवल विष्णु शर्मा नाम के एक कथाकार ही समझ पाए। उन्होंने अपनी कथाओं के पहले पंचतंत्र जोड़ दिया। वे अमर हो गए। है कोई जो उन्हें टक्कर दे दे। पंचा लपेटे कथा के अखाड़े में वे आजतक सबको ललकार रहे हैं। विष्णु शर्मा-जैसा अमृत्व पाने की लालसा में सैंकड़ों कथाकार पंचत्त्व में विलीन हो गए। और अमरत्व तो क्या बेचारों का पंचनामा तक नहीं लिखा गया। क्योंकि वे ना तो कहीं के पंच थे,और ना ही उनके पास था-नामा। पंच जो नामा कमाता है,या जो नामा पंच को दिया जाता है,आजकल उसे ही पंचनामा कहा जाता है। अब जिनको कभी पंच होने का मौका ही नहीं मिला,. उनकी क्या राय। चाहे मुगल सराय हो या लाढ़ो सराय। और यू भी एश्वर्या राय अभिषेक के पास है। तो फिर काहे की राय। पंचायतीराज में वैसे भी निजी राय की कोई अहमियत नहीं होती। जो पंचों की राय सो हमारी राय। आज की राजनीति का पंचांग यही कहता है। और-तो-और आज जिस डायलाग में पंच होता है,सिर्फ वही याद किया जाता है। आज जिन लेखकों ने इन पंचायती कारनामों का महत्व समझ लिया है,उन्होंने निजी लेखन बंद करके पंचायती लेखन शुरू कर दिया है। इससे सबसे बड़ा फायदा तो उन्हें यह होता है कि रचना के सृजन के ही साथ, या उससे पहले ही पांच प्रबल प्रशंसक पैदा जाते हैं। लेखक रचना की सृष्टि करता है। इसलिए वह ब्रह्मा का ही रूप होता है। और ब्रह्मा भी सृष्टि करता है। उसने तो सृष्टि की ही सृष्टि कर डाली थी। पंच का महत्व  उन्हें भी मालुम था इसीलिए वे भी पंचमुखी हो गए। पांच की यही तो प्रतिष्ठा है। ना पांच से ज्यादा ना पांच से कम। रावण ने लालच में दस मुंह हथियालिए। इसलिए राक्षस कहलाया। मट्टी पलीद हो गई। पांच मुंह ही रखता तो पंचमुखी गणेश,और पंचमुखी हनुमान न सही तो कम-से-कम पंचमुखी रुद्राक्ष की हैसियत तो कमा ही लेता। द्रौपदी अपरिग्रही थी। उसने सौ कौरवों की जगह पांच पांडवों में ही संतोष, कर लिया। इसलिए पांचाली के रूप में प्रतिष्ठित हो गईं। पांच पांडवों के सिर पर उसका जादू चलता था। शायद दुनिया की पहली सरपंच थी द्रौपदी। हो सकता हैं और भी हों मगर उनका कोई रिकार्ड नहीं मिलता। इतीहास उन्हीं का होता है जिनका रिकार्ड होता है या जो रिकार्ड तोड़ते हैं। सारा इतिहास पंचों से भरा पड़ा है। पंच की महिमा ही ऐसी है। इतिहास में दुर्घटनावश कई राजा भी हुए मगर उन्होंने पंच का महत्व इतना समझा की अपने को पांचाल नरेश ही कहाते रहे। सोचो तो राजा होकर भी पंच क्यों रहे। अरे,बड़े-बड़े राजा पंच के आगे पानी भरते हैं। द्रौपदी का दुशासन,दुर्योधन क्या बिगाड़ पाए। राजा होकर चीरहरण-जैसी मामूली वारदात तक नहीं कर पाए। महाभारत हो गया सो अलग। तमाम द्रौपदियों का चीरहरण आज रोज़ होता है, पर महाभारत नहीं होता। क्योंकि ना तो वह पंच-सरपंच होती हैं और ना ही महाभारत कोई पान की दुकान के सामने होनेवाला पंगा। जो रोज़ हो जाए। आखिर महाभारत की भी तो कोई इज्जत है। ये पंचों का संघर्ष था। आम आदमियों का नहीं। हमारे यहां जो पंच नहीं वह पंक्चर ट्ूब से ज्यादा कुछ नहीं।

  पंच शब्द का बड़ा महत्व है। ये दुर्लभ चीज़ को भी सुलभ बना देता है। अमृत किसको मिला है। मगर पंच शब्द जुड़ते ही यह पंचामृत बन जाता है। सर्वत्र सुलभ। बिल्कुल पंचरंगा आचार की तरह। या फिर मीन,मत्स्य, मदिरा,मुद्रा और मैथुन-जैसे पंचमकारों की तरह। पंच तो शब्द ही पारसमणि है। जिसे छू दे,वही सोना। अगर नाग के साथ जुड़ गया तो हो गई नागपंचमी। अगर कहीं केंचुओं की पंचमी होती तो वह भी नागों के फन मरोड़ देते। सामाजिक न्याय के समर्थकों को केंचुआ पंचमी मनाने का आंदोलन जरूर चलाना चाहिए। कबतक ये केंचुए पिछड़े ही रहेंगे।  और देखिए कमाल ये पंच शब्द जुड़कर खूबसूरती भी पैदा कर देता है। ये जिस शहर के साथ जुड़ गया वही शहर खूबसूरत हो गया,चाहे पंचकूला हो,पंचगनी हो या पंचमढ़ी। इस तरह बेडाउट हम कह सकते हैं कि पंच और पंचायत हमारी संस्कृति के नियरेस्ट एंड डियरेस्ट प्राण हैं।  और हमारी नज़र में वे भी सम्मानित हैं जो पंचायतीधर्मशाला में पैदा होते हैं, पंचायती भंडारों के बूते पर पलते-बढ़ते हैं और किसी पंचायती पाखानें में पंचक के शुभमहूर्त में पंचत्त्वों को छोड़कर स्वर्गारोहण कर जाते हैं। पंचत्त्व छुआछूत नहीं मानते। उनके लिए क्या मदिरालय और क्या शौचालय। पंचतत्वों का पंचायतग्रस्त क्षेत्र है ये सकल संसार। पंचतत्व स्थान निरपेक्ष होते हैं। और सुखद संयोग यह कि वे घर्मनिरपेक्ष भी होते हैं, बिल्कुल हमारी सरकार की तरह। और सरकार भी तो एक तरह की पंचायत ही है। बस थोड़े सा मेकअप अलग है।
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Sunday, November 21, 2010

दुश्मनी के साहित्य में उत्तरआधुनिकतावाद

हास्य-व्यंग्य-

दोस्त है तो दुश्मन की जरूरत क्या है

पंडित सुरेश नीरव
कल सुबह-सुबह विद्रोहीजी आ धमके। बहुत गुस्से में थे। वह किसी व्यक्ति विशेष से गुस्सा नहीं थे। पूरे देश से वे गुस्सा थे। इतना अखिल भारतीय गुस्सा देखना तो दूर मैंने कभी सुना तक नहीं था। ये तो गनीमत है कि मेरे शाक-एब्जोर्बर्स इतने हाईक्वालिटी के हैं कि मैं उनके इस हाईवोल्टेज गुस्से के झटकों को भी झेल गया। कोई और होता तो विद्रोहीजी उसे ठोंक-पीटकर ही दम लेते। चूंकि उनका गुस्सा पूरे देश से था और मैं इस महान देश का मूल निवासी हूं, इसलिए देश की गुस्सा को देशवासियों पर उतारने का उनका जन्म सिद्ध संवैधानिक अधिकार है। उनके हाथ में एक निर्दोष अखबार था,उसे सामने रखी टेबल पर, नृशंसतापूर्वक पछीटते हुए,नथुने फुलाकर एक करारे डायलाग का झन्नाटेदार प्रहार उन्होंने मुझ पर किया और बोले- भाईसाहब,जब तक इस देश से भाई- भतीजावाद खत्म नहीं होगा,इस देश का कुछ नहीं हो सकता। यहां योग्यता से ज्यादा रिश्तों को तरजीह दी जाती है। ऐसा दुनिया के किसी देश में नहीं होता। मैंने कहा- रिश्ते बनाने की कला भारतीय डीएनए की खासियत है। रिश्तों के रुजर्वेशन फार्म तो उसकी सांसों से लिपटे ही रहते हैं। हर भारतीय काल-समय और परिवेश के मुताबिक सबसे पहले रिश्ता बनाता है। अब देखिए ना आपने भी तो सबसे पहले मुझे भाईसाहब के रिश्ते में बुक किया फिर बात आगे बढ़ाई। ये तो आपकी विनम्रता है कि जो आपने मुझे सिर्फ भाईसाहब ही बनाया,ज्यादा उत्साही लोग तो मौका पड़ने पर गधे से भी बाप का रिश्ता बना लेते हैं। है किसी और देश के नागरिक में है इतनी कुव्वत जो गधे को अपना बाप बना सके। गधे से फादर का रिश्ता हरेक माई का लाल थोड़े ही बना सकता है। यह हुनर सिर्फ इंडियन के ही पास है। क्योंकि बहुमूल्य ग्रंथों में लिखा है कि रिश्तम किम दरिद्रम अर्थात रिश्ते बनाने में में काहे की दरिद्रता। रिश्तेबनाऊ क्षमता में हमीं संसार की सुपर पावर हैं। अरे गधे से रिश्तेदारी बनाने का नसीब कितनों को नसीब होता है। यह सिफत तो सिर्फ हमारे इंडिया को ही नसीब है। रिश्तों की इतनी उर्वरा शस्यश्यामला भूमि सिर्फ अपनी भारत माता के ही पास है। देश हमारी मां है। नदियां हमारी मां हैं। भाषा हमारी मां है, गौ भी हमारी माता है। मां कसम एक अदद आदमी की इत्ती सारी माताएं सारी दुनिया में इंपासिबल. मगर इंडिया में पासिबल। कई देश तो इसी कारण हमारे दुश्मन हैं। अब देखिए ना देता है रब सड़ते हैं सब। दिलजले सोचते हैं कि भारत को रिश्ते बनाने में महारत हासिल है तो चलो दोस्ती का नहीं तो कम-से-कम उससे दुश्मनी का ही रिश्ता बना लिया जाए। सम थिंग इज़ बैटर देन नथिंग। वैसे दुश्मनी करने के लिए भी रिश्ता बहुत जरूरी होता है। क्योंकि रिश्ता अगर हो तो दुश्मनी आसान हो जाती है। और दुश्मनी करने में मज़ा भी आता है। जितना गहरा रिश्ता उतनी गहरी दुश्मनी। वे खुशनसीब होते हैं,जिन्हें ये जरूरी रिश्ता पैदाइशी मिल जाता है। इससे एक फायदा तो यह होता है कि रिश्ते बनाने के अनुत्पादक श्रम से वह आदमी बच जाता है। और फिर वो पूरे मन से शत्रुता की साधना को सिद्ध करने में लग जाता है। हमारे कृष्णजी कितने लकी थे। पैदा होते ही दुश्मनी की जमीन खानदानी जायदाद की तरह मिल गई। पैदा हुए भी तो दुश्मन की जमीन पर। और सबसे बढ़िया बात ये कि दुश्मनी हुई भी तो अपने खासम खास मामाजी से। इसे कहते हैं सोने पे सोहागा। दुश्मनी और रिश्तेदारी दोनों प्रगाढ़। ऐसा सौभाग्य मिले तो तो कोई भी भगवान हो जाता है वरना दुश्मन की कृपा से भगवान को प्यारा हो जाता है। दोनों हाथों में लड्डू होते हैं,उसके। सारा खेल रिश्तों का ही है। इसलिए समाज सुधारक दीवारों पर लिख देते हैं-रिश्ते-ही-रिश्ते। दीवारों पर रिश्ते,रिश्तों में दीवारें यही तो हमारी विशेषता है। बस एक बार मिल तो लें। ये सारे रिश्ते दुश्मनी करने के रहस्यवादी आमंत्रण हैं। आओ मिल-जुलकर दुश्मनी की भूमिका रचें। रिश्तों की जमीन पर। जमीन की बात चली है तो जमीन भी काफी उपयोगी और लाभदायक चीज होती है,दुश्मनी करने के लिए। कोई आपकी जमीन दबा ले तो पांव तले आपकी जमीन खिसक जाएगी। जमीन भले ही खिसक जाए मगर दुश्मनी नहीं खिसकती। हजारों लोग हर साल जमीन के लिए जूझते हुए शहीद हो जाते हैं। क्योंकि धरती से भी हमारा एक रिश्ता होता है. हम इसे अपनी मां कहते हैं। तो ये तय हुआ कि दुश्मनी के पाठ्यक्रम में सगे-संबधी खास और कंपलसरी सबजेक्ट होते है। घरती,गाय, भैंस, और कुत्ते ऐच्छिक विषय होते हैं। अगर मेन फेकल्टी में प्रवेश मिलनें में कायाबी न मिले तो कतई निराश न हों। ऐच्छिक विषयों में भी आप अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं। जैसे जो आईएएस या आईपीएस नहीं हो पाते वे पीसीएस होकर भी खेल खेल जाते हैं। दुश्मनी प्रतिभा को और तराश देती है। कई लोग कुत्ते के लिए इतनी निष्ठा से दुश्मनी निभा लेते हैं जितनी कि तमाम लोग अपने मम्मी-डैडी के लिए भी नहीं निभाते। ये सब अभ्यास की बाते हैं। इसलिए जरूरी है कि काम पूरी मेहनत से किया जाए। ईश्वर भी उसी की मदद करता है, जो स्वयं कोशिश करता है। एक बात और कि अगर आप प्रयोगवादी हैं तो दुश्मनी में भी आप अपने परंपरावादी या प्रगतिशील होने की मिसाल पेश कर सकते हैं। हमारे एक प्रगतिशील मित्र ने-मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा-जैसा अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उछालते हुए,पूरे पराक्रम से लबलबायमान होकर सामनेवाले की कपाल क्रिया कर दी। ये है परंपरा के विरूद्ध, एक प्रगतिशील दृष्टि। यहां व्यक्ति की कपाल क्रिया पहली हुई और,वो मरा बाद में। जबकि औसत लोगों पहले मरते हैं और उनकी कपालक्रिया बाद में उनके रिश्तेदारों के सौजन्य से होती है। खास लड़का हो तो बात ही क्या है। ऐसे पिता भाग्यशाली होते हैं जिनकी कपाल क्रिया करने के लिए किसी गैर को मेहनत नहीं करनी पड़ती। ऐसा करने से पिता को मोक्ष और पुत्र को हार्दिक संतोष मिलता है। लेकिन हमें ये सड़ी-गली परंपराएं ऐसे ही तोड़नी होंगी,जैसे कि हमारे तरक्कीपसंद भाई ने तोड़ीं। तभी दुश्मनी के साहित्य में उत्तरआधुनिकतावाद पनप सकता है। आखिर कब तक हम लकीर के फकीर बने रहेंगे। वक्त बदल रहा है। अब हमें लकीर और फकीर दोंनो को ही मिटाना होगा।
   समझे विद्रोहीजी। खाली भुनभुनाने से कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं होगा। वैसे देश में परिवर्तन होगा जरूर क्योंकि लोग भले ही मर रहे हों मगर उनकी संवेदनाएं फिर भी नहीं मर रही हैं। लोग पूरी भावुकता के साथ अपने-अपने रिश्तेदारों से जान हथेली पर लेकर जूझ रहे हैं। चैरिटी बिगिंस फ्राम होम। हमें परिवर्तन की बयार घर से ही लानी होगी। दुश्मनी की चैरिटी घर से शुरू कर के। पांडवों ने भी दुश्मनी का उत्सव अपने भाईयों के साथ मिलकर ही तो सेलीब्रेट किया था। महाराणा प्रताप और भगवान गौतम बुद्ध का भी दुश्मनी का सांस्कृतिक कार्यक्रम अपने खास और निजी भाइयों के बीच ही पला-पुसा। जितना गहरा रिश्ता,उतनी बड़ी दुश्मनी। भाइयों की कृपा से दोनों महान बन गए.। जब भाइयों ने भाइयों को महान बनाने के लिए पूरी मेहनत से दुश्मनी की तो ममताभरी मां कैसे पीछे रह जातीं। मां का दर्जा तो भाइयों से भी बड़ा होता है। कैकई-जैसी करुणामयी माता ने अपने प्यारे श्रीराम को वनवास का फरमान जारी करके राम को महान बनाने का प्रोजेक्ट अपने हाथ में लिया था। और पुत्र से स्वेच्छा से दुश्मनी करके दुश्मनी के इतिहास में मां को गौरवशाली स्थान दिलाकर खुद महान हो गईं। सोचिए तो अगर राम वनवास नहीं जाते तो क्या वो भगवान बन पाते। एक दुश्मनी ने मां-बेटे दोंनों को महान बना दिया। वन-गमन की दुश्मनी की आग और मां के वातसल्य के घी में तपकर ही श्रीराम कुंदन की तरह निखरे। मां-बेटे के इन भावुक रिश्तों के साइड इफेक्ट स्वाइन फ्ल्यू की तरह लंका तक जा पहुंचे और वहां भी इस दिव्य प्रेऱणा से रावण और विभीषण ने भी दुश्मनी-दुश्मनी के रिश्ते का खेल खेलना शुरू कर दिया। तो जनाब रिश्ते और दुश्मनी सिर्फ लोकल स्तर पर ही रंग नहीं जमाते हैं बल्कि इंटरनेशनल लेबल पर भी प्रभाव दिखाते हैं। खूब बजेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो। दुश्मनी में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका का सम्मान करते हुए लोग अब अपने दुश्मनों को ही भाई कहने लगे हैं-दाउद भाई, हिंदी-चीनी भाई-भाई और हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई से लेकर दाउद भाई तक सभी इसी गौरवमयी परंपरा को निभा रहे हैं। जो भाई तक से दुश्मनी नहीं निभा पाए ,वे बाहर वालों से क्या खाकर दुश्मनी निभाते। रखे रह गए अपने घर में ही। कुछ लोग इन विषम स्थितियों में भी निराश नहीं होते। वे रास्ता निकाल लेते हैं। चलो, भाई नहीं सही। बीवी से ही झगड़ा करें। तलाकबाजी शुरू कर देते हैं। आखिर पत्नी का रिश्ता भी तो खास होता है। दुश्मनी की जा सकती है। वहीं जुट जाते हैं,बेचारे। जिनकी बीवी इस झगड़े में सहयोग नहीं करती तो ऐसे दबंग लोग अकबर बनकर अपने बेटे को ही शाहजादा सलीम समझकर, उससे पंगा लेने लगते हैं। रिश्ते रहते हैं तो लड़ाई में भी मूल्य बने रहते हैं। कौरव-पांडव दिल खोलकर लड़ते थे। मगर शाम को शिविर में चक्कर लगाकर भाइयों के घाव पर मरहम भी लगा आते थे। दुश्मनी और प्रेम का ऐसा टू-इन-वन प्रोग्राम भाइयों में ही संभव होता है। लड़ रहे हैं तो क्या रिश्ते भूल जाएंगे। और रिश्ते नहीं होंगे तो दुश्मनी कैसे निभाएंगे। रिश्ते बहुत जरूरी हैं,दुश्मनी के लिए। वैसे हम भारतीय किसी अजनबी से भी लड़ते हैं तो उससे भी मां-बहन से घनिष्ठ रिश्ते बनाने का वीररसी मुद्रा में प्रस्ताव पेश करते हैं,जिसे लोकभाषा में लोग गाली कहते हैं। ये गाली दो अजनबियों के बीच दुश्मनी के सेतु का काम करती हैं। इन गालियों के हाई-वे पर दुश्मनी की गड़्डी फौरन दौड़ने लगती है। जरा सोचिए तो कि अगर गालियां नहीं होती तो कितने सारे लोग दुश्मनी का आनंद लेने से वंचित रह जाते। दुश्मनी का रिश्ता कैसे बनाते और कैसे निभाते। गालियों के अनकहे रिश्तों में ही दुश्मनी के प्राण बसते हैं। कितने प्राण इन अमूल्य गालियों के लिए न जाने कहां-कहां तरसते हैं। मैं भी एक दुश्मन ढूंढ़ रहा हूं जो दोस्तों से भी प्यारा हो। क्योंकि एक अच्छा दोस्त मिल जाए तो सेंकड़ों दुश्मनों की जरूरत अपने आप खत्म हो जाती है। ठीक कह रहा हूं ना दोस्त। मेरा प्रवचन सुनकर विद्रोहीजी ऐसे गायब हो गए जैसे मल्लिका शेरावत के शरीर से कपड़े।

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Tuesday, November 9, 2010

साठ साल पहले हुई वारदात की फाइल


आदरणीय नीरवजी आपका व्यंग्य आलेख पढ़ा. झगड़े के लिए किस तरह एजेंडे की जरूरत पड़ती है,ये आपने बड़े रोचक ढंग से समझाया है। अब जो कोई भी झगड़ा करने के लिए घर से निकलेगा वो पहले झगड़े के एजेंडे का होमवर्क करके ही निकलेगा। एक छोटी-सी घटना को आप किस तरह बुनते हैं,यह कलाकारी ही आपकी विशेषता है। जो आपको भीड़ से अलग करती है,बधाई..इस संवाद के तो कहने ही क्या हैं-

मैं और मेंरी का दूध एक नितांत व्यक्तिगत,अंतरंग प्रक्रिया भला झगड़े का कारण कैसे बन सकती है, यह सोच-सोचकर मैं गहरे सोच में पड़ गया। आखिर ये हैं कौन दाल-भात में मूसलचंद। हमारी पर्सनल लाइफ में टांग अड़ानेवाले। मगर उनकी रावणी मुद्रा देखकर मुझे अपने पर ही शक होने लगा। मैं एक अनकहे अपराधबोध से भरने लगा। मैं सोचने लगा कि कहीं बचपन में मैंने अपनी मां के धोखे में इन भाईसाहब की मां का दूध तो नहीं पी लिया था जो आज ये साठ साल पहले हुई दूध की डकैती का हिसाब-किताब करने चले आए हैं। मुझो सोच में डूबा देखकर वे किटकिटायमान मुद्रा में बोले,सोच क्या रहा है। मैंने कहा कि- मैं सोच रहा हूं कि दूधवाला अभी तक क्यों नहीं आया। आ जाता तो चाय के प्याले पर बैठकर,खूब चिंतन करते हुए हम आपके यक्ष-प्रश्न का उत्तर तलाशते। क्योंकि आप भी तो साठ साल पहले की हुई वारदात की अचानक फाइल खोलकर मेरे बयान मांगने चले आए हैं। इतनी फुर्ती से बयान हेना मेरे वश की बात नहीं है। ऐसे संगीन मामलों में फटाक से बयान तो पेशेवर गवाह ही दे सकते हैं। सच्चे आदमी को तो काफी सोच-विचारकर ही बोलना पड़ता है।
आपको एक अच्छे व्यंग्य हेतु बधाई...
डाक्टर प्रेम लता नीलम
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केंचुआ कोबरा बनने आया



हास्य-व्यंग्य-
झगड़े का एजेंड़ा
पंडित सुरेश नीरव
कल सबह-सबह दरवाजे पर घंटी बजी। मुझे झुंझलाहट हुई कि इतनी सुबह-सुबह कौन मेरे घर सिधार गया। सोचा शायद दूधवाला हो। मैं दूध का बर्तन लिए लपककर दरवाजा खोलता हूं। मगर दिन का भ्रूणावस्था में ही सत्यानाश करनेवाले सज्जन पारंपरिक शैली के दूधवाले नहीं थे।. वैसे थे वे भी दूधवाले ही। वे मुझे दूध देने नहीं,बल्कि छठी का दूध याद दिलेनेवाले दुर्दांत किस्म के दूधिए थे। वैसे मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि व्यवहार में हमारे और उनके बीच कभी किसी स्तर पर किसी भी प्रकार के, और किसी भी प्रकार से, दूध नामक पदार्थ का कभी कहीं कोई आदान-प्रदान नहीं हुआ। भले ही तब जब कि हम दूध पीते बच्चे ही क्यों न रहे हों। मगर उन्होंने आते ही एक नितांत पारिवारिक ललकार से मझे संबोधित किया कि- अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो उतर नीचे।  मैं सोच में पड़ गया कि मां का दूध पीने की नितांत मासूम और वात्सल्य प्रक्रिया झगड़े का कारण कैसे बन सकती है। यू भी शरीफ परिवारों में सामाजिकतौर पर मां के ही दूध पीने का रिवाज है। इनके परिवार की मुझे कोई जानकारी नहीं। फिर ये मुझे क्यों ललकार रहे हैं इसलिए कि मैंने मां का दूध क्यों पिया या फिर इसलिए कि मैंने मां का दूध बचपन में क्यों नहीं पिया। और नहीं पिया तो क्यों नहीं पिया। अब मैं  और मेंरी का दूध एक नितांत व्यक्तिगत,अंतरंग प्रक्रिया भला झगड़े का कारण कैसे बन सकती है, यह सोच-सोचकर मैं गहरे सोच में पड़ गया। आखिर ये हैं कौन दाल-भात में मूसलचंद। हमारी पर्सनल लाइफ में टांग अड़ानेवाले। मगर उनकी रावणी मुद्रा देखकर मुझे अपने पर ही शक होने लगा। मैं एक अनकहे अपराधबोध से भरने लगा। मैं सोचने लगा कि कहीं बचपन में मैंने अपनी मां के धोखे में इन भाईसाहब की मां का दूध तो नहीं पी लिया था जो आज ये साठ साल पहले हुई दूध की डकैती का हिसाब-किताब करने चले आए हैं। मुझो सोच में डूबा देखकर वे किटकिटायमान मुद्रा में बोले,सोच क्या रहा है। मैंने कहा कि- मैं सोच रहा हूं कि दूधवाला अभी तक क्यों नहीं आया। आ जाता तो चाय के प्याले पर बैठकर,खूब चिंतन करते हुए हम आपके यक्ष-प्रश्न का उत्तर तलाशते। क्योंकि आप भी तो साठ साल पहले की हुई वारदात की अचानक फाइल खोलकर मेरे बयान मांगने चले आए हैं। इतनी फुर्ती से बयान हेना मेरे वश की बात नहीं है। ऐसे संगीन मामलों में फटाक से बयान तो पेशेवर गवाह ही दे सकते हैं। सच्चे आदमी को तो काफी सोच-विचारकर ही बोलना पड़ता है। वैसे दूधवाला आ जाता तो अच्छा था। मैंने झगड़े की फाइल को ठंडे बस्ते में डालते हुए कहा। वह बोला, मैं आपको ललकार रहा हूं और आप चाय की रट लगाए हुए हैं। मैंने कह.यही तो हमारी परंपरा है। हम बड़ी-से-बड़ी समस्या बातचीत से ही सुलझाने में यकीन रखते हैं। चाहे वो कश्मीर समस्या हो या नक्सलवाद की समस्या। हम सभी को बातचीत का आमंत्रण देते हैं। झगड़ा करनेवाले से बातचीत करने का हमारा पुराना रिकार्ड है। हम शांतिप्रिय देश हैं। शांतिप्रय लोग हैं। जो झगड़ा करते हैं मूलतः तो वे भी शातिप्रिय ही होते हैं। वे तो झगड़ा करके सामनेवाले के संयम और विवेक की छमाही परीक्षा लेते है,कोई सच्ची-मुच्ची में थोड़े ही झगड़ते हैं। झगड़ा करनेवाले से बातचीत के लिए हमारे पास हमेशा टाइम रहता है। बस बातचीत को वह तैयार भर हो जाए। बिना झगड़ा किए कोई हमसे बातचीत करने की धृष्टता करता है तो हमारे सुरक्षा अधिकारी उससे झगड़ कर के बंगले से बाहर फेंक देते हैं। अगर वो दोबारा झगड़ा करने आता है तो इस बार हमारे अधिकारी उसे भीतर जाने देते हैं। यहां अब इसे हमारा पीए अपमानित करता है। उसका फिर पीए से झगड़ा होता है। अगर वो पीए को भी झगड़े में रगड़ देता है तो पीए हमसे आकर कहता है कि कि जेनुइन पार्टी है। इससे आपको जरूर मिलना चाहिए। पीए की रिकमंडेशन पर हम बड़ी गर्जोशी से उसे अंदर बुलाते हैं,उसे चाय भी पिलाते हैं और उसकी समस्या क्या है यह जानने का भरपेट प्रयास करते हैं। अभी एक सज्जन रोज़ आकर मेरे गार्ड और पीए से झगड़ा कर रहे थे। जब सारे चक्रव्यूह पार करके उन्हें मुझसे मिलने का मौका मिला। हमने उनकी समस्या जाननी चाही तो वह बोला- मेरी तो कोई समस्या ही नहीं है। मैं तो खुद अपने इलाके की समस्या हूं.,भैयाजी। आप चाहो तो खुद पता कर लो। मैं तो आपका प्रशंसक हूं और आपके लिए पांच किलो घी लेकर आया हूं। शहर का होता तो मक्खन लेकर आता। गांववाले मक्खन नहीं लगाते। लीजिए, मेरी तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिए। वैसे कोई समस्या खत्म करनी हो तो हमें याद कीजिएगा। अपनी घनी मूंछों में वह मुस्कराया। यदि कोई समस्या खड़ी करनी हो तो भी बंदे की सेवाएं लेना मत भूलिएगा। हमारी हुनरमंदी देखिएगा।.लगता था कि वो अपने झगड़े के खानदानी कारोबार के जनसंपर्क पर निकले थे। शायद किसी झगड़ा संस्थान के सीईओ जरूर रहे होंगे। कुछ ऐसी ही ठसक और खनक थी उनकी आवाज़ में। बड़े सदभाव के वातावरण में वे विदा हुए।
अब आप समझ गए होंगे कि मैं आपको चाय पिलाने को क्यों इतना आतुर हूं। आप भी शरीफ आदमी हैं। क्योंकि हर झगड़ा करनेवाला हमारी नज़र में शरीफ होता है। और प्रभु कृपा से आपकी तो सूरत भी मियां नवाज शरीफ से काफी मिलती है। क्रोध की हवा से भरे गुब्बारे में मैंने चतुराई की कील चुभा दी थी। और अब क्रमशः उसे दयनीयता की हद तक पिचकता हुआ मैं देख रहा था। जैसे किसी खास प्रबल-प्रचंड प्रतिद्वदी की मुझे घोटाले की फाइल मिल गई हो। और वो साष्टांग दंडवत की मुद्रा में आ जाए। इतनी देर तक दरवाजे पर खड़े-खड़े उस दुर्दांत के पैर भारी होने लगे थे। वह लड़खड़ाकर गिरता,इससे पहले ही दूधवाला आ गया। मैंने कहा- भीतर आइए। सांस उखड़ते मरीज़ की धमनियों में मेरी बातचीत का ग्ल्यूकोज दौड़धूप करने लगा था। उसकी सूरत ऐसी हो गई थी जैसे कोई आतंकवादी सरेंडर के लिए रिरिया रहा हो। वह स्वेच्छा से कमरें में सोफा अरेस्ट हो चुका था। मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं। प्रश्न के लाईडिटेक्टर के आगे खड़ा करते हुए मैंने पूछा। वो लड़खड़ाया,बोला- मैं आपसे झगड़ा मोल लेना चाहता हूं। चाय का प्याला उसे थमाते हुए मैंने चाबुक फटकारा- झगड़ा खरीदोगे। अमेरिका हो क्या।. या बिन लादेन। या फिर दाउद हो। इससे नीचे के टिटपुंजिए लोग झगड़ा खरीदते नहीं हैं ,खुद ही झगड़े में खर्च हो जाते हैं। और झगड़ा भी उन्हें खाली पान मसाले के पाउच की तरह मसलकर,कूड़ेदान में फेंक देता है. बाय द वे झगड़ा मोल लेने का आपका बजट क्या है। वो बोला, आप माफिया हैं क्या। मैंने कहा अभी तो तुम पूछ रहे थे कि मां का दूध पिया। और अब कह रहे हो माफिया। चलो,छोड़ो,बताओ तुम्हारे झगड़े का एजेंडा क्या है। वह बोला झगड़े का भी कोई एजेंडा होता है। हमने कहा- झगड़ा शुरू होता ही एजेंडे से है। सोशलिस्टपार्टी,-प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी, जनतापार्टी-भारतीयजनता पार्टी, लोकदल-राष्ट्रीयलोकदल, कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस, द्रुमुक-अन्नाद्रुमुक ये सब एजेंडे के झगड़े की ही फसल हैं। वरना किसने किसकी भैंस खोली है। अब तुम आ गए झगड़ा करने। न तुम्हारे पास झगड़े का कोई बजट है,न झगड़े का कोई एजेंडा। अरे बिना बर्फ के हिमालय मुझे यूं ही स्केटिंग को ललकार रहा है। अरे बिना टायर की काऱ। अरे बिना फन के सांप,मत फुफकार। पहले झगड़े का व्याकरण सीख। बिना झगड़े के पाठ्यक्रम को पास किए बिना तू तो क्या अर्जुन भी कौरवों से झगड़ा मोल नहीं ले पाया था। कृष्णजी की ट्यूशन की कृष्णजी ने झगड़ालौजी की पूरी गीता
 अर्जुन को समझाई तब कहीं जाकर वह कांपते हाथों से धनुष उठाने को तैयार हुआ। कृष्णजी अर्जुन की ट्यूशन में विजी थे तो उधऱ मौका देखकर  भीष्मपितामह ने पहले ही परशुराम की कोचिंग इंस्टीट्यूट से झगड़ौलोजी में महारत हासिल कर ली थी।  अब ये बताओ कि कौन है तेरा कृष्ण.। कौन है तेरा परशुराम। किससे ली है तुमने झगड़े की कोचिंग। उसने फटे-जूते-सा मुंह खोला- सर परशुराम तो क्या कांसीराम की भी ट्यूशन नहीं ले सका हूं, मैं तो। मैंने कहा-  फिर रहने दो,झगड़ा तुम्हारे बस की बात नहीं है। और मुझे तो लगता है तुम्हारे खानदान में कभी किसी ने ढंग से किसी से झगड़ा नहीं किया होगा। और तुम चले हो झगड़ा करने। वो भी बिना एजेंडे के। बिना एजेंडे के तो तुम चींटी भी नहीं मार सकते।  अरे अब तो चींटी भी पहले एजेंडा तय कर लेती है झगड़े का,तभी सर्वसम्मति से उसके पर निकलते हैं। अब तुम्हारे पर कैसे निकलेंगे। और जब पर निकलेंगे ही नहीं तो वो कतरे कैसे जाएंगे। बिना एजेंडे का झगड़ा तो स्वातःसुखाय झगड़ा भी नहीं होता। हां स्वांतःदुखाय जरूर हो सकता है। ऐसा करो यदि तुम्हारा अपना कोई एजेंडा नहीं है तो किसी और के झगड़े में शामिल हो जाओ,मैंने राय दी। भाड़े के टट्टू बन जाओ। मेरा मतलब है आदमी नहीं तो तालिबान ही हो जाओ। साड़ी और दाढ़ी के लिए झगड़ जाओ। बिना एजेंडे का  झगड़ा तो बिना सूंड का हाथी है। ऐजेंडा हो तो हाथी क्या एक हथिनी ही कई सूरमाओं को साइकिल सहित कुचल देती है। समझे बिना लैंस के चश्में। बिना हाथ के पंजे। बिना दांत के शेर। बिना कांटे की घड़ी,बिना पानी के फब्बारे,बिना हवा के गुब्बारे और बिना बैल के हल,चल बाहर निकल...। बड़ा आया मुझसे झगड़ा करने। मैं उसे तोड़ रहाथा,निचोड़ रहा था। .मैं गुर्राया-  आज तक मैंने एजेंडाविहीन किसी झगड़ालू को चाय नहीं पिलाई। मैंने क्या मेरी सरकार ने भी नहीं पिलाई। मुझे तो लगता है कि तू भारतीय ही नहीं है। वरना इस मुद्देप्रधान देश में तुझे झगड़े का एक टिटरूटूं मुद्दा तक नहीं मिला। अरे भाषा.धर्म, क्षेत्रियता, आरक्षण, मंडल-कमंडल,सैंकड़ों मुद्दे अनाथ भटक रहे हैं देश में कि कोई उन्हें गोद ले ले। और एक तू है..। अरे तुझसे तो गली के कुत्ते बेहतर हैं जो और कुछ नहीं तो कुतिया को ही मुद्दा बनाकर मोहल्ले में घल्लू घारा मचा देते हैं। बिना एजेंडे के- तूने मां का दूध पिया तो बाहर निकल- टाइप के संवादों से बेटे अब झगड़ा नहीं होता, लोगो को हंसी जरूर आती है। मैं तुझसे इस लिए ये नहीं पूछ रहा कि तूने मां का दूध पिया है या नहीं अगर पिया है तो उस दूध को मत लजा और मेरी सलाह है कि जाकर पहले मदर डेरी का दूध पी। बाद में किसी से झगड़े की सोचना। तुझे झगड़े का एजेंडा हम सप्लाई करेंगे। मेरा एजेंडा मानेगा तो ठीक, नहीं मानेगा तो झगड़ा अपने आप शुरू हो जाएगा। चल अब निकल पतली गली से...केंचुआ..कोबरा बनने चला था..मैंने उसे भरपूर ललकारा मगर वो तो चिप निकले हुए मोबाइल की तरह निर्जीव हो चुका था।
आई-204,गोविंदपुरम,गाज़ियाबाद-201001
मो.9810243966

Monday, November 8, 2010

मास्टर कालोनी


हास्य-व्यंग्य-
मोहल्ला मास्टरों का..
पंडित सुरेश नीरव
मेरी जिंदगी में आजकल परिस्थितियां कुछ इस तरह असहयोग कर रही हैं गोया वे परिस्थितियां न होकर विरोधी पार्टियां हों। सबने मिलकर मेरा बैंड बजा रखा है।  फिलवक्त मैं हाईक्वालिटी की परेशानियों से घिरा हुआ हूं। चूंकि मास्टर हूं इसलिए इस बात की तो मुझे तसल्ली है कि भले ही चैन से जी न पाऊं मगर मरूंगा पूरी शान से। क्योंकि औपचारिकतावश ही सही मेरे छात्र मेरे सम्मान में दो मिनट का मौन रखकर,मेरी शोकसभा को जरूर शानदार और यादगार बना देंगे। इस  शानदार शोकसभा के  सपनों के सहारे ही आजकल जिंदगी काट रहा हूं। छठे वेतन आयोग में अध्यापकों के वेतनमान बढ़ाए जाने की मेरी मास्टरी उपलब्धि को मेरे सगे-संबंधी ऐसे अचरज से देख रहे हैं जैसे किसी ने उनको किसी किन्नर के यहां पुत्र जन्म की खबर सुना दी हो। हां,कुछ अल्पमती मित्रों ने जरूर इस खबर को सीरियसली दिल पर ले लिया है और जैसे नेताजी सुभाषचंद्र बोस के दिल्ली चलो ऐलान का सम्मान करते हुए देशभर में बिखरे देशप्रेमी दिल्ली पहुंच गए थे, कुछ-कुछ उसी डिजायन के उत्साह से भरे मेरे रिश्तेदारों के जत्थे भी सपरिवार,इस खुशी में शरीक होने,मेरे घर चलते-ही-चले आ रहे हैं। इत्तफाक से मेरा घर दिल्ली की पूंछ यानी कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत आनेवाले भूखंड जिसे कि आम भाषा में ग़ज़ियाबाद कहते हैं के दक्षिणी अक्षांश पर समुद्रतल से एक संतोषजनक ऊंचाई पर स्थित है जोकि दो तरफ से सीबर की खुली जलधाराओं और तीसरी तरफ लैंडफिलिंग के मनोहारी दृश्यों से लैस एक अति गंधवान कर्कट पर्वत से घिरा हुआ है।  जहां पक्षीविहार से  निष्कासित गिद्ध,चील और कौओं के प्रतिनिधिमंडल बंग्लादेशी शरणार्थियों की भांति मुक्तभाव से निवास करते हैं। इन पवित्र परिंदों के समाज में हमारी कालोनी को वैसे ही वीआईपी एरिया माना जाता है कि जैसे दिल्लीवासियों के लिए चाणक्यपुरी। मुझे यह सोचकर बड़ी राहत मिलती है कि आदमियों में न सही गिद्ध और कौओं के वीआईपी एरिया में रहने का तो मुझे सौभाग्य मिला। यहां मौसम की गुल्लक से उछलकर कभी चवन्नीभर खुशबू भी यदि टपक पड़ती है तो ऐसा आभास होता है जैसे मुद्दत से सूखे पड़े सरकारी नल की टोंटी में से पानी की दुर्बल धार निकल पड़ी हो। वैसे भी यहां नल में पानी आने की घटना को गणेशजी के दूध पीने के हैरतअंगेज कारनामे के समकक्ष ही माना जाता है।
हमारी कालोनी की सड़कें हड़प्पाकालीन शिल्प में रची गईं हैं। जो चलने से ज्यादा बच्चों के खेलने और बूढ़ों के धूप सेंकने के लिए पार्क की तरह ज्यादा इस्तेमाल की जाती हैं। इधर दिल्ली में पशुमेला प्रदर्शनी का चलन और प्रचलन दोनों खत्म–से हो गये हैं क्योंकि उसकी जगह दिल्ली में राजनैतिक पार्टियों के आए दिन होनेवाले धरने-प्रदर्शन के सर्कस ने ले ली है जिसको जनता ज्यादा पसंद करने लगी है। लेकिन पशुमेले का लोकउत्सव जड़-मूल से ही लुप्त न हो जाए,इसलिए हमारी कालोनी के बाशिंदों ने सड़कों पर गाय,भैंस,बकरी और कुत्तों की बेरोक-टोक आवाजाही का अघोषित प्रावधान कर,,इस लोकउत्सव को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस सब के बावजूद हमारी कालोनी मैं अध्यापक ही ज्यादा क्यों रहते हैं,इस का कारण अभी तक किसी के समझ में नहीं आया,जो यहां रह रहे हैं खुद उनको भी नहीं। वैसे आवास-विकास परिषद ने तो इस बस्ती को जनता कालोनी का नाम दिया है। शायद अध्यापक अपने को ही जनता समझते हों। या फिर हो सकता है कि अध्यापकों का विकसित सौंदर्य-बोध उन्हें इस लैंडफिल हिलस्टेशन की ओर ज्यादा खींचता हो और वे यहां ऐसे ही खिंचे चले आते हों-जैसे चुंबक की तरफ लोहे का बुरादा खिंचा चला आता है। प्राधिकरणवालों को जब यह भनक लगी कि इस कालोनी में अध्यापक ज्यादा रहते हैं तो उन्होंने शिक्षकों के प्रति अपना अतिरिक्त सरकारी सम्मान जताते हुए यहां का लाइट कनेक्शन काटकर यहीं कि बिजली सप्लाई झुग्गी-झौंपड़ियों की तरफ मोड़ दी। अपने इस कृत्य को शास्त्रोचित बताते हुए वह दलील देते हैं कि उपनिषदों में लिखा है कि (उन्हें मालुम है कि आजकल ऐसी फालतू किताबें कोई नहीं पढ़ता,इसलिए कोई उनकी बात काट भी नहीं पाएगा) गुरू वह है,जो हमें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाए। तमसोमाज्योतिर्गमय...। अब जब अंधेरा ही नहीं रहेगा तो गुरु किसको,कहां ले जाएगा। अंधेरे के अभाव में तो उस बेचारे के सारे रचनात्मक कार्यक्रम ही रुक जाएंगे। और समाज में उनकी उपयोगिता खत्म हो जाएगी,सो अलग। अगर अंधेरे का अकाल हो जाएगा तो गुरु नस्ल के जीव तो समाज से ऐसे लुप्त हो जाएंगे जैसे कि आज के जंगलों से डायनासौर। प्रशासन ऐसा गुरुहन्ता काम करके पाप का भागीदार नहीं बनना चाहता है। क्योंकि इसमें ट्रिपल मर्डर का केस होता है। भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि एक अदद गुरु में ब्रह्मा,विष्णु और महेश नामक तीन-तीन देवता बसेरा करते हैं। एक गुरु का खात्मा यानी तीन देवताओं की छुट्टी। गुरुओं के सर्वांगीण और बहुमुखी विकास के मद्देनजर ही प्रशासन ने यहां से विद्युत व्यवस्था का समूल उन्मूलन कर एक मनोकूल रचनात्मक पर्यावरण हमारी कालोनी को मुहैया कराया है। वैसे भी गुरु वसिष्ठ से लेकर द्रोणाचार्य-जैसे धांसू आचार्य भी बिना बिजलीवाले आश्रमों में रहकर ही शिष्यों के जीवन से अंधकार ऐसे मिटा दिया करते थे जैसे आज का मलेरिया महकमा मच्छरों को मिटा देता है। अंधकार में ज्ञान का दीप जलाने का अपना एक अलग मज़ा है। और जिसे इस मजे का चस्का एक बार लग जाए तो फिर वह जिंदगीभर नहीं छूटता है। आज जब अध्यापकों के वेतन भरपेट बढ़ गए हैं तब उन्हें कम-से-कम अंधेरा भगाने के अभियान में तो लगाना ही पड़ेगा। वैसे प्रशासन को इस बात की भी भनक लग चुकी है कि कुछ अध्यापक अंधेरा हटाओ कार्यक्रम को उसी निष्ठा से कर रहे हैं-जैसे कि वे जन-गणना,राशनकार्ड और चुनाव पहचान पत्र या अन्य सरकारी कार्यक्रमों को करते आए हैं। कुछ अध्यापकों ने तो अंधेरा हटाओ अभियान में भी घोटाला शुरू कर दिया है। उन्होंने ट्यूशन पढ़ने आनेवाले छात्रों से घर से बैटरीचलित लालटेन लाने का फरमान जारी कर एक लज्जाजनक और जघन्य कृत्य करने का सिलसिला शुरू कर रखा है। अब देखिए न कि गुरु तो हमेशा शिष्य को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाता रहा है। हमारी यही परंपरा रही है लेकिन आज के कलियुगी मास्टर शिष्य से लालटेन मंगाकर खुद अंधेरे से उजाले में जाकर उल्टी गंगा बहा रहे हैं। क्या होगा इस देश का। क्या होगा समाज का।सरकार चिंतित है,इन घयनाओं से।
  इतनी बातें मैंने इसलिए आपके सामने रखी हैं ताकि आप हमारी कालोनी में अंधेरा देखकर कहीं गलती से इसे प्रशासन की अक्षमता न समझ बैठें। यह तो शासन द्वारा विशेषरूप से बनाई गई अध्यापक हितकारी व्यवस्था है,जो काफी चिंतन के बाद हमारी कालोनी को मुहैया कराई गई है। वैसे इस व्यवस्था से यहां रहनेवालों को एक फायदा यह जरूर हुआ है कि रेडियो और टीवी-जैसे समय काटनहार संयंत्रों का उपयोग, प्रशासन में ईमानदारी की तरह ही, हमारी कालोनी में छुटपुटरुप से ही कहीं-कहीं बचा रह गया है। मजबूरी में समय काटने के लिए छात्र-छात्राएं पढ़ने के अलावा और कोई मनोरंजन नहीं करते हैं। अंधेरे में पढ़ने से मनोरंजन तो होता ही है,थोड़ा बहुत ज्ञानरंजन भी हो जाता है। छात्र-छात्राएं इतना मन लगाकर पढ़ते हैं कि वे क्या पढ़ रहे हैं,इसका उन्हें खुद भी ध्यान नहीं रहता है। बेचारे पढ़ते-पढ़ते थक कर सो जाते हैं। सुबह यदि किताब सीने पर रखे, सोते हुए, रंगे हाथों, फेमिली के उन सदस्यों,जिन्हें इंडिया में आजकल मम्मी-डैडी के नाम से बुलाने का रिवाज़ है,ये नौनिहाल बरामद होते हैं और ये पुस्तक हाथ उनके हाथ लग जाती है तो वे जिज्ञासावश पन्ने पलटकर उसे पढ़ लेते हैं। फलस्वरूप बच्चों को डांट तो पड़ती है साथ ही तब ही बच्चों को इस बात का ज्ञान होता कि रात में वह जिस पुस्तक को इतने ध्यान से पढ़ रहे थे,वह विद्यालय के पाठ्यक्रम से बाहर की कोई चीज़ थी। वैसे भी ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तकों को पढ़ना कोई बच्चों का खेल नहीं है। ये वे पुस्तकें हैं जो पाठक के वयस्क होने की बाट जोहती रहती हैं,कि कब मेरा बांचू वयस्क हो और कब वो मुझे सीने से लगाकर,रातभर बांचे। पढ़ने की आदत होती भी कुछ ऐसी ही है। पढ़नेवाले के लिए किताब कुत्ते के मुंह में हड्डी है। हड्डी कैसी भी हो,कुत्ता उसे कहां छोड़ता है। पढ़ाकू भी किताब को पढ़-पढ़कर उसके चीथड़े उड़ा देता है। ऐसा पढ़ैया अपने व्यसन के कारण कोर्स की किताबें भी खूब पढ़ डालता है। हर ऐब का नतीजा तो भुगतना ही पड़ता है। हमारी कालोनी के छात्र-छात्राएं भी इसके अपवाद नहीं हैं। इसलिए यहां के अधिकांश छात्र-छाक्षाएं डिस्टिंक्शनयाफ्ता और मेरिटशुदा हुए बैठे हैं। सभी एक से बढ़कर एक हैं। अब्बल दर्जे के नंबरपाऊ। रिजल्ट बनाऊ। नतीजा यह है कि शहर में हमारी कालोनी शिक्षा के मामले में तक्षशिला और नालंदा की टू-इन-वन लोकल ब्रांच का दर्जा हासिल कर चुकी है। एक सर्वे कंपनी ने खुलासा किया है कि देशभर के नौजवानों की आजकल दो ही महत्वाकांक्षाएं रह गई हैं-पहली इस कालोनी के माल्टरों से ट्यूशन पढ़ना और दूसरी अमेरिका का वीजा प्राप्त करना। मेरी खोपड़ी चूंकि चिकन-खल्वाट है,इसलिए कालोनी का विश्व-समाज मुझे तक्षशिला-नालंदा के चाणक्य के हैप्पी संबोधन से पुकार कर मुझे खुशी का चुइंगम थमाता रहता है। जिसकी कि मैं भैंस की मुद्रा में चौबीस घंटे जुगाली करता रहता हूं। तब भी जब कि मैं ट्यूशन पढ़ा रहा होता हूं।
आजकल एक दर्जन छापामार महमानों ने मेरे घर के भूगोल पर वैसे ही कब्जा कर रखा है-जैसे कि तिब्बत पर चीन ने। मेरा घर धर्मशाला हो गया है। धर्मशाला....याद आया कि धर्मशाला में तो दलाईलामा भी रहते हैं। तो लीजिए मैं घर बैठे-बैठाए आजकल दलाईलामा और चाणक्य का टू-इन-वन हो गया हूं। दोनों ही महान हैं। और दोनों की हेयर स्टाइल भी मेरे जैसी ही है। इत्थफाक से मेरी भी उन-जैसी हीं है। सुना है लोग मेहमाननवाजी में गंजे हो जाते हैं। मैं तो पहले से ही गंजा हूं। मेहमानों को करने के लिए अब क्या रह गया। मेरा तो वो कुछ नहीं बिगाड़ सकते। क्योंकि बिगाड़ के उच्चतम बिंदु पर तो मैं पहले से ही टहल रहा हूं। अब तो जो भी बिगाड़ होगा वो मेहमानों का ही होगा। वैसे भी अध्यापकों के मोहल्ले में रहना कोई साधारण काम है। प्रभु की कृपा रही तो जल्दी ही  ये मेहमान अपने घर चल बसेंगे। मैं भी उनके घर सिधारने की प्रतीक्षा कर रहा हूं। क्योंकि गंदगी के इस होनोलुलू में रहना हम जांबाजों का ही हौसला है..हर किसी के बूते की बात नहीं।
आई-204,गोविंदपुरम,गाजियाबाद-201001
मो.9810243966

Saturday, November 6, 2010

लक्ष्मी उल्लुओं पर ही मेहरबान होती हैं


हास्य-व्यंग्य-
रिटायरमेंट से पहले रिटायरमेंट के बाद
पंडित सुरेश नीरव
 कल सड़क पर भदौरियाजी-जैसे कोई सज्जन दिखे। भदौरियाजी-जैसे इसलिए कह रहा हूं क्योंकि थे तो वह भदौरियाजी ही मगर अब उनकी चाल में वह अकड़ नहीं दिख रही थी। मुझे लगा शायद मैं ही गलत हूं। यह भदौरियाजीजी तो कतई नहीं हो सकते। फिर सोचा हो भी सकते हैं। हो सकते हैं...नहीं हो सकते हैं के विचारों का टूर्नामेंट फटाक से मेरे दिमाग के स्टेडियम में शुरू हो गया। और जैसे कामनवेल्थ गेम के समय हमारी दिल्ली खुदी थी  कुछ-कुछ उसी तर्ज पर मेरा दिमाग भी खुदने लगा। मैं अपने भीतर शुरू हुई खुदाई से हैरान हुआ जा रहा था कि अचानक किसी ने पीठ पर नमस्ते का छुरा घोंप दिया। कराहता हुआ मैं पीछे मुड़ा। नमस्ते घौंपनेवाले सज्जन बाकायदा भदौरियाजी ही निकले। बस..चेहरे से मूंछें गायब थीं। ऊपर का होठ ऐसा सूना और वीरान लग रहा था जैसे अतिक्रमण दस्ते द्वारा पटरी से दुकान के हटाए जाने के बाद फुटपाथ लगता है। खानदानी ठाकुर की अचानक मूंछे गायब होना किसी बड़े हादसे की खबर होती है। मन-ही-मन सोचा शायद भदौरियाजी के पिताजी चल बसे। घर में सब ठीक तो हैं,मैंने उत्साहपूर्वक प्रश्न किया। और मन में फंसी फांस को प्रश्न के पिन से निकालने की एक सतर्क कोशिश की।
-जी..हां, सब प्रभु की कृपा है। इतनी तसल्ली से दिए गए उनके उत्तर ने मुझे घोर निराशा के दलदल में डुबो दिया। सारे अरमानों पर पानी फिर गया। अगर जो मैं सोच रहा था,उसी नस्ल का जवाब मिलता तो लंबी बातचीत का सिलसिला शुरू होता। भावुकता दिखाने का पाखंड प्रदर्शन होता। आत्मा-परमात्मा की बातें होतीं। और लोगों को सुनाने के लिए एक रोचक खबर होती। वैसे भी किसी की भी मृत्यु का समाचार बड़ी राहत देता है। ऐसा लगता है जैसे कि बसस्टाप की लाइन में खड़े लोगों पर ब्ल्यू लाइन बस अचानक चढ़ जाए। बगलवाला आदमी बस का शिकार हो जाए और हम खुद बाल-बाल बच जाएं। उस हादसे के बाद सुकून का स्वाद वही जानता है,जिसने कभी हादसे का स्वाद चखा हो। ठीक वैसे ही-जैसे सामनेवाला नीबू चूसे ओर पानी देखनेवाले के मुंह में आए। मगर भदौरियाजी का उत्तर सुनकर तो अपना मुंह ही सूख गया। पूरी उम्मीद के सात फिर एक उछाला-ये अचानक आपकी मूंछों को क्या हुआ। ही.ही.ही.हो... इसीलिए ही आप पूछ रहे थे कि घर में सब राजी-खुशी तो हैं। भदौरियाजी ने खिसियानी हँसी हँसते हुए कहा-दरअसल में रिटायर हो गया हूं। अफसर था तो मूंछों का रोब-दाब था।अब किस पर हुक्म चलाना है। अब तो बीवी और बच्चे भी अपने पर ही हुक्म चलाएंगे। और यदि मूंछें हों तो हुक्म मानने में बड़ी बाधा आती है। इसलिए अपन ने तो मूंछे मुंड़ाकर हुक्म मानने की पूरी मानसिक तैयारी कर ली है। वैसे पिताजी अभी जीवित हैं। गांव में खेती कराते हैं। इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है,एक दिन उसे इस संसार से जाना ही पड़ता है।  वैसे ही जो भी नौकरी में आता है एक दिन रिटायर होता ही है। यह बात तो आपको मालुम होगी ही। तो जब रिटायर होना ही था तो फिर आपने मूंछे रखी क्यों थीं। आप भी क्या बात करते हैं,पंडितजी,अरे बुढ़ापे की सोचकर कोई सुहागरात थोड़े ही छोड़ देता है। उन्होंने जिंदगी का फलसफा हमें समझाया। और अपनी बात को मनवाने के लिए हमें उदाहरण दिया कि जैसे विधवा होते ही स्त्री अपने शरीर से श्रृंगार के सारे साधन हटा लेती है वैसे ही रिटायर होते ही आदमी को शरीर से रोबदार चीजों को हटा देना चाहिए।  मसलन मूंछे एंठना और अंग्रेजी बोलना। भदौरियाजी धारावाहिक शैली में कहे जा रहे थे-कि जैसे शहरों के चौराहों पर विज्ञापन लगे रहते हैं-शादी से पहले-शादी के बाद..वैसे ही समाजसेवी संस्थाओं को जनहित में पोस्टर लगाने चाहिए। कि रिटायरमेंट से पहले और रिटायरमेंट के बाद। मैंने कहा लेकिन रिटायरमेंट के तो अलग-अलग ढंग हैं और अलग-अलग रंग हैं। कोई रिटायरमेंट की उमर में पहुचकर रिटायर होता है तो कोई स्वेच्छा से  समय से पहले ही रिटायर हो जाता है और कुछ बहादुरों को जबरदस्ती रिटायर किया जाता है। और ये जबरदस्ती रिटायरमेंट सिर्फ कर्मचारियों का ही नहीं होता,खिलाड़ियों का भी होता है। अब चाहे खिलाड़ी खेल के मैदान में हो या राजनीति के। जनता और मीडिया भी रिटायरमेंट के लिए वातावरण तैयार करता है। खिलाड़ी आखिरी दम तक कहता है कि न मैं टायर हूं और न रिटायर हूं मगर गंगा किनारे भक्तजनों द्वारी हरि बोल...हरि बोल के शोर में डूबते लाचार की गुहार कौन सुनता है। उस बेचारे को जबरिया रिटायरमेंट देकर घर बैठा दिया जाता है। रूपकुंअर की तरह उसे बलात सता कर दिया जाता है। भक्तों और चमचों से सताया हुआ,निरीह रिटायर जीव फिर अंतर-आत्मा की आवाज का संगीत सुनता रहता है,अपने घर में बैठा हुआ। वैसे भी अंतरआत्मा का मौन रिटायरमेंट के बाद ही मुखर होता है। मैंने भदौरियाजी के सामने अपना गुप्त ज्ञान सार्वजनिक किया। दीर्घशंका से त्रस्त किसी मनुष्य को सुलभ शौचालय दिखने के बाद जैसी बायलोजिकल प्रसन्नता होती है,कुछ-कुछ उसी डिजायन की खुशी मैंने भदौरिटाजी के सूने चेहरे पर देखी। रिटायरमेंट के बाद आपने क्या सोचा, मैंने भदौरियाजी से एक हारे हुए यक्ष की तरह प्रश्न किया। भदौरियाजी बोले- रिटायरमेंट के बाद आदमी सिर्फ सोचता ही है,कर तो कुछ भी नहीं पाता। मैं भी बस सोच-सोचकर बस सोच ही रहा हूं। सोचता हूं कि तार्थयात्रा पर निकल जाऊं। मैंने कहा येशमशानी विचार आपको कैसे आया। वे बोले सोचता हूं कि जब कुछ और नहीं कर पा रहा तो भगवान को ही आब्लाइज कर दूं। सीनियर सिटीजन को ट्रेन में थर्टी परसेंट का कंसेशन भी मिलता है। लगे हाथों उसका भी आनंद लिया जाए और भगवान की कृपा और ममता दीदी की मेहरबानी हो गई तो मरणोपरांत लखपति भी हो सकता हूं। रेल यात्रियों को मरणोपरांत लखपति बनाने का जन-कल्याणकारी कार्यक्रम यूं भी ममता दीदी पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। हो सकता है कि अपना नंबर भी लग जाए। कैसा लगा आपको मेरा ये आइडिया। भदौरियाजी ने मुझे घूरते हुए पूछा।
मैंने कहा-सही सोच रहे हैं आप। जनरली लक्ष्मी उल्लुओं पर ही मेहरबान होती हैं। आप पर क्यों नहीं होंगी। उल्लुओं के प्रति लक्ष्मी की ममता जग जाहिर है। यह कहकर मैंने सावधानीपूर्वक अपने को समेटा। और मौकाए वारदात से फुर्ती से चल बसा।
आई-204,गोविंदपुरन,गाजियाबाद
मो.9810243966

Friday, November 5, 2010

अरे नासमिटो हमारे कारे-कारे नैना पर नजर गढ़ाते हो,


हास्य-व्यंग्य-
बिन ब्लैक मनी सब सून
पंडित सुरेश नीरव

राष्ट्रहित में गोपनीय धन को सार्वजनिक करने की हमारी सरकार की अपील का देशभक्ति की प्रेरणा से ओत-प्रोत वीरांगना फिल्म अभिनेत्रियों,बार-बालाओं और माडल्स पर गहरा प्रभाव पड़ा। और उन्होंने स्वेच्छा से अपनी गोपनीय संपदा  को सार्वजनिक करने का संकल्प ले लिया। फलस्वरूप मल्लिका शेरावत और राखी सामंत-जैसी विभूतियां प्रकाश में आईं। अंतर्ऱाष्ट्रीय अर्थशास्त्री अमर्त्य लेन के मुताबिक यदि भारत के कालेधन का जनहित कार्यों में निवेश कर दिया जाए तो हिंदुस्तान अमेरिका को पछाड़कर सुपर पावर बन सकता है। इन देशभक्त अभिनेत्रियों ने अपने ही बूते पर इंडिया को अमेरिका से आगे ले जाने का संकल्प ले लिया है। इनकी प्रचंड प्रेरणा से देश की और भी तमाम सोने के बदन और चांदी की नज़रवाली कंचन कामनियों ने उदारवादी अर्थतंत्र में उदारता से अपने गोपनीय धन को सार्वजनिक करने की ठान ली है। एक होड़-सी लगी है,अपनी गुल्लक में छिपी गोपनीय धन की सारी-की-सारी चिल्लर को देशहित में सार्वजनिक करने की। देशभक्ति का ऐसा ज्वार इंडिया के इतिहास में पहले और कभी नहीं देखा गया। ऐसे गोपनीय धन को उजागर करने का काल्पनिक आंदोलन हमारे पूर्वजों ने खजुराहों की पत्थर प्रतिमाओं में जरूर कभी तराशा था। हमारे पुरखों ने जो सपना देखा था,आज वो सपना साकार हो रहा है। योचता हूं कि पूर्वजों की छाती ये सब देखकर ठंडी होकर हिमांक बिंदु पर आ गई होगी। पत्थर की वे प्रतिमाएं, आज निकलकर देश के विकास की रेंप पर लहराने लगी हैं। देशप्रेम की ये भावना कोई बच्चों का खेल नहीं है,इसे समझाने के लिए ये बलिदानी कन्याएं खेल के मैदान में चीअरलीडर्स बनकर खिलाड़ियों को समझा रही हैं कि तुम देश के लिए खेलते हो,मगर पैसा बटोरकर तहखानों में छिपा लेते हो। अरे हम नारियों को तो देखो कैसे सीना खोलकर अपना सबकुछ देश पर लुटा रही हैं। 
हमारे आगे तुम लोग कालेधन के सट्टा बाजार के सिर्फ झींगुर हो। हम गोरियों के पास तो जो भी गोपनीय था, बड़े पारदर्शी ढंग से हमने सब-का-सब डिक्लेयर कर दिया है। तुम लोगों को क्या कहें-बुरी नज़रवाले तेरा मुंह काला। मगर जिनके चेहरे पहले से ही काले हैं वो क्या और कहां मुंह काला करेंगे। काजल की कोठरी में सबके मुंह काले हैं। किसी के चेहरे पर हवाले की कालिख है तो किसी के चेहरे पर घोटाले की कालिख है। हम स्त्रियां तो साक्षात लक्ष्मी हैं। इसलिए पैसे के चक्कर में कभी कोई मुन्नी बदनाम नहीं हुई है। अरे मुन्नी तो जब भी बदनाम होती है, अपनी मस्ती में बदनाम होती है। और होती नहीं है तुम लोगों द्वारा कर दी जाती है। मगर इस रुसवाई को भी मुन्नियां रोकर नहीं गाकर बताती है- अरे मुन्नी बदनाम हुई जालिम मैं तेरे लिए। कालेधनवाले अपना कालाधन तो देखते नहीं हैं, खूंसट हमारे कजरारे नैनों को देखकर फिकरे कसने लगते हैं- कजरारे-कजरारे.. तेरे कारे-कारे नैना।  अरे नासमिटो हमारे कारे-कारे नैना पर नजर गढ़ाते हो,अपने कालेकारनामों और कालेधन पर नजर नहीं जाती, तुम्हारी। अरे कभी सोचा है कि तेरा क्या होगा कालिया। हम गोरियों के कालू जादू का असर मालुम है,अच्छे खासे मर्द हमारे आगे बकरे बन जाते हैं। एक काली के चरणों में कितने बकरों की बलि चढ़ती है। इसका अंदाजा है तुम लोगों को। अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। क्योंकि आजतक किसी भी सरकार ने इसका रिकार्ड नहीं रखा है। सारी-की सारी बलियां आफ द रिकार्ड ही हैं। वैसे भी सरकार की नज़र में तो बलि प्रथा कब की बंद हो गई।
फिर काहे का रिकार्ड। सरकार बिलकुल सही है। सरकार हमेशा सही होती है। सरकार को गलत कहने का मतलब है स्त्री जाति का अपमान। क्योंकि मुहब्हत की रियासत की सरकार हम ही होते हैं। तुम लोगों को तो सरकार की नियत में भी दाल में कुछ काला नज़र आएगा।  उस सरकार की नियत में जो हर काम पारदर्शी ढंग से करती है। अपना कालेधन का खजाना तो बताते नहीं हो, उलटे काली जवान से हम लोगों को ही कोसते रहते हो। और अपने इस कालेधन  को महिमामंडित करने के लिए अपने नाम तक कालेखां और काले राम रख लेते हो। कालेखां और काले राम दोनों ब्लैक नाइट में बैठकर ब्लैक लेबिल के घूंट लगाते हैं। वाह कैसा सांप्रदायिक सदभाव है। मजहब की कोई दीवार इस काली बस्ती में नहीं होती है। कितना भाईचारा है यहां तुन्हारे कालेबाजार में। जहां दाउद भी भाई कहलाता है। जितने भी आज काले कारोबार से जुड़े हैं सब भाई कहलाने लगे हैं। जब सरकार भाईचारा बढ़ाने की बात करती है तो ये भाई अपने चारे को बढ़ाने की जुगाड़ में सारे देश को ही चारागाह बना डालते हैं। कभी जिन्हें अंग्रेज साहब काला आदमी कहकर हिकारत से बुलाते थे, आज वही काले बाबू बनकर इंग्लैंड ओर स्विटजरलैंड के काले बाजार में अपना सिक्का चला रहे हैं। अब तो विद्वानों ने भी तुम्हारी तारीफें करना शुरू कर दी हैं। उनका मानना है कि यदि देश में कालेधन की समानांतर अर्थव्यवस्था नहीं होती तो वैश्वीकरण के इस दौर में इंडिया कबका मैक्सिको बन गया होता या फिर सोवियत रूस की तरह टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया होता। सरकार आभारी है तुम कालेधन कुबेरों की।क्योंकि कालाधन नहीं होता तो देश बिखर जाता और जब देश बिखर जाता तो सरकार कहां से बची रह जाती।  ये देश और सरकार दोनों तुम्हारे ही बलबूते पर टिके हैं। फिल्मों में उकाला-उकाला..मेरा मुंह काला जो गीत लोकनर्तक गाते,दिखाए जाते हैं वो इसी कालेधन का पावन कीर्तन है। हमें सब मालुम है। अब अगर सरकार रिक्वेस्ट कर रही है तो तुम लोगों का भी तो ये नैतिक फर्ज बन जाता है कि कुछ चिल्लर दिखाकर उसे भी खुश कर दो। जैसे कि हम कर रहे हैं। सिगरेट के धुओं के बादलों के पीछे से काले चश्मों को धारण किए जो सज्जन पुरुष फिल्मों में दिखाए जाते हैं, वे तो रेडीमेड कपड़ों के शोरुम में सजे मिट्टी के पुतले हैं। कालेधन के असली कारखानें तो आप लोग ही हैं। जिनके पैसों से फिल्म इंडस्ट्री चलती है। एक आद्यात्मिक गूढ़ रहस्य बताएं- आप की और भगवान की दोनों की लीला एक जैसी है। सर्वशक्तिमान होकर भी पर्दे के पीछे रहते हैं, आप लोग। और आपका कालाधन भी कितना नटखट नटवरलाल है- कभी एअरपोर्ट पर आते-जाते किसी शरीफ मुसाफिर के ब्रीफकेस में प्रकट हो जाता है तो कभी हम-जैसी गरीब फिल्म अभिनेत्रियों के बाथरूम में निर्लिप्त भाव से चीरहरण का लाइव शो देखता हुआ बरामद होता है।  हमेशा उछल-कूद करता रहता है यह कालाधन। इधर पकड़ो तो उधर निकल जाता है। मूड कर आए तो फार्महाउस को छोड़कर झुग्गी झोंपड़ी में चला जाता है। जस्ट फार चेंज। कब तक काकटेल और रेव पार्टियों से बंधा रहे। पालेटिकल पार्टियों के दफ्तरों से लेकर घर्मशाला,गौशाला,पाठशाला और मधुशाला सभी इसकी लीलास्थली हैं। कृष्ण भी काले थे। यह धन भी काला है। दोनों के इर्द-गिर्द गोपिया रमण करती हैं। सब कालेधन का ही प्रताप है। खालिस ग्वाले के पास कंस को छोड़कर कन्याएं क्यों जातीं। सब समझते हैं। दूसरों के बारे में हल्की टिप्पणियां करना हमारे संस्कार नहीं हैं। कंस एक अदद पूतना नाम की गर्लफ्रेंड के मोह में ही फंसा रहा। समझ ही नहीं पाया कि एक राजा को छोड़कर छंटा हुआ स्त्रीधन एक ग्वाले के पास कैसे पहुंच रहा है। शायद उसके लिए कालेधन का अक्षर भैंस बराबर था। वैसे तो उसे तभी समझ लेना था जब उसकी जेल का पूरा तंत्र मैनेज कर कृष्ण जी की सकुशल स्मगलिंग कर दी गई थी। किसी भी युग में हो आप सिपाही को हरे-हरे नोट दिखाओं तो वह वारदात के समय आंख बंद कर लेता है। आज भी इस गैरवशाली परंपरा का प्रचलन जारी है। उस वक्त भी जेल के सिपाहियों को ऐन मौके पर प्रायोजित नींद आ गई थी। सब कृष्णजी की पार्टी की लीला थी। कंस मूर्ख था। समझ नहीं सका कि यह सब कैसे हो रहा है। अब अगर उस समय टीवी होता तो जरूर कंस को कृष्णजी की ये धमकी सुनने को मिल जाती कि-  छोटा बच्चा जान के हमसे मत टकराना रे..कुड़ुर-कुड़ुरकुम। किसी के पास कालाधन हो और वो मीडिया को मैनेज नहीं कर पाए ऐसा मुमकिन नहीं। जब आज दो कौड़ी के नेता और माफिया मीडिया को मैनेज कर लेते हैं तो क्या भगवान नहीं कर पाएंगे।  मीडिया आजतक वैसा ही है जैसे उनके समय में था। मीडिया मैनेज करके तो हमारे रजनीश जी भगवान हो गए थे फिर कृष्णजी तो सच्ची-मुच्ची के भगवान थे। आज भी मीडिया ने  भकितभाव से तमाम भगवान बना रखे हैं।  तब भगवान चक्रधारी थे अब चैनलधारी हैं। जरा सोचिए एक साधारण से ग्वाले को द्वारिका कोई लाटरी में नहीं मिली थी। कहां से बन गई। आप में है इतनी कुव्वत। गीता पढ़ के बना लो। खाली गीता के उपदेशों के बल पर तो  साबह उनकी भी नहीं बनती। इसका पाठ्यक्रम इतना सरल नहीं है कि हर कोई समझ सके। सुदामाजी को पूरा फ्लैट गिफ्ट में दे दिया। कितने धांसू बिल्डर रहे होंगे। गोपियों का ग्लैमर और समुद्र में तैरती द्वारिका।  सोचकर ही सुरसुरी हो जाती है। कितनी हैरतअंगेज है एक ग्वाले की रंगबाजी की कथा। मछेरे दाउद और हाजी कुली मस्तान के खूब समझ में आ गई। रघुकुल रीत सदा चलि आई...। ब्लैक मनी संग राखिए बिन ब्लैक मनी सब सून। सरकार ब्लैकमनी उजागर करने को इज्जतदार लोगों से कह रही है,आलू-प्याज खरीदनें में मंहगाई का रोना रोते हुए खर्च हो जानेवालो भुखमरों से नहीं। ये वो ब्लैकमनी है जिसके होने पर गांव की कल्लो ब्लैकब्यूटी,ब्लैकरोज़ और ब्लैक ट्रेज़र के खिताब से नवाजी जाती है। सब ब्लैकमनी की बलिहारी है। इसीसे शिब्बू सौरेन है,इससीसे जरदारी है। ये ब्लैकमनी है जो सरकार पर भारी है। ब्लैकमनी की ऋतु में न सावन सूखे होते हैं न भादों हरे होते हैं।  इस ऋतु के तो हर दिन हरे-भरे होते हैं। जिसके चेहरे पर कालेधन का डिठौना लग जाता है उसे कानून की नज़र नहीं लगती। ईमानदारी की अला-बला उससे दूर भागती है। कालेधन के आगे राजा भी भिखारी है। अगर ये पल्टी खा जाए तो आदमी एन.डी.तिवारी है। ये काले रंग और ढंग का ही जलवो-जलाल है कि हमारी काली माई ने गोरेपन की तमाम क्रीमों को नकार कर अपनी ब्लैक ब्यूटी ही मेंटेन की। यह काले रंग और कालेधन का ही कमाल है कि हमारी कालीमाई शिवजी की छाती पर चढ़कर तांडव की प्रेक्टिस करने की जांबाजी दिखा देती हैं। यह इनर्जी लेबल इन्हें ब्लैक ने ही दिया था। ब्लैक इज बेस्ट। यूं भी आज के दौर में हर अच्छी चीज़ ब्लैक में ही मिलती है।  जिसे सरकार नकली कह रही है आज वही मुद्रा असली है। असली नकली है। नकली असली है। क्योंकि वो ब्लैक है। इसलिए गर्व से कहो कि हम इंडियंस काले हैं..दिलवाले हैं और कालेधनवाले हैं। सरकार ने कहा है तो उसे कालाधन जरूर दिखाएंगे और साथ में इसीके बूते उसे आंखें भी दिखाएंगे। हे कालेधन के मयखाने की बार-बालाओ.. देशभक्ति की इस मुहिम में आप अकेली नहीं है, हम मेले में-अकेले में हर जगह, हर वक्त हर तरह से आपके साथ हैं। आखिर देश के लिए हमारा भी तो कोई फर्ज है।
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Tuesday, November 2, 2010

गिरिराजजी बड़े ही विचित्र नस्ल के जीव हैं।

हास्य-व्यंग्य-

डाबरमैन की अंतिम इच्छा
पंडित सुरेश नीरव


गिरिराजजी बड़े ही विचित्र नस्ल के जीव हैं। मैं जितना सम्मान गिरिराजजी का करता हूं तय मानिए उतना सम्मान उनके घरवाले भी नहीं करते। घरवाले तो वैसे भी किसी प्रतिभावान व्यक्ति का सम्मान नहीं करते। उनके लिए तो घर की मुर्गी दाल बराबर ही होती है। घरवालों ने तो तुलसीदासजी तक का सम्मान नहीं किया था। पांच साल के ही हुए थे कि घर से निकाल दिया। मगर हमारे गिरिराजजी बड़ी कड़ी जान हैं। उन्हें घर से निकालने के सारे टोटके जब फेल हो गए तो घरवाले खुद ही घर से बाहर निकलने की सोचने लगे। मगर खानदानी मकान छोड़कर बेचारे कहां जाते। इसलिए अंत में सर्वसम्मति से घरवालों ने यह फैसला किया कि जिस खाते में घर में कुत्ता पाला जाता है उसी खाते में गिरिराजजी को डाबरमैन समझकर पाल लिया जाए। यूं भी गिरिराजजी के होते हुए कुत्ता पालने की जरूरत ही कहां रह जाती है। वे कुत्ते का ही मानव संस्करण हैं। और अगर घरवाले कुत्ता पाल ही लेते तो उन्हें इसबात का हमेशा भय रहता कि कहीं कुत्ता गिरिराजजी से प्रभावित होकर अपनी जिंदगी ही बरबाद न कर ले। इसलिए काफी सोच-विचारकर कुत्तेवाले खाते में गिरिराजजी ही पल रहे हैं। और गिरिराजजी ने भी घरवालों को कभी कुत्ते की कमी कभी नहीं महसूस होने दी। समय पर खाना नहीं मिलने पर वे बाकायदा डाबरमैन हो जाते हैं। उसी तर्ज पर गुर्राते हैं। पेडीगिरी मिले या रबड़ी वे भौंकर अपना मीनू घरवालों को बता देते हैं। वे जितनी निष्ठा से कुत्ते का जीवन जी रहे हैं उतना तो कोई कुत्ता भी नहीं जी सकता है। इन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि आदमी जब चाहे कुत्ता हो सकता है मगर कुत्ते को आदमी होने की सुविधा प्राप्त नहीं है। गिरिराजजी के जिस्म में किसी ब्रांडेड कंपनी का कुत्ता साफ्टवेयर फिट है। कभी-कभी लगता है कि ब्रह्माजी का दफ्तर भी हमारे मृत्युलोक के जंबूद्वीपे-आर्यावर्ते-भरतखंडेवाले भारत के सरकारी दफ्तर की स्टाइल में ही काम करता है। जहां किसी बाबू ने दो पैग लगाने के बाद कुत्तेवाला साफ्टवेयर इनकी बाड़ी में डाल दिया है। जैसे ही कोई अजनबी गिरिराजजी के दरवाजे पर दस्तक देता है ये भीतर से ही भौंक देते है कि- देखना जरा कौन है और इतनी प्रबल मेहनत से थककर चूर हुए, फिर बेचारे अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। और ये बंद आँखें वे खाना खाते समय ही खोलते हैं। बाकी समय आँखें बंद ही रखते हैं। अब डाबरमैन कोई टीवी-फीबी तो देखता नहीं है कि आंखें खोले। वैसे आजकल टीवी का जो स्तर हो गया है तो उसे आदमी तो क्या अब कुत्ते भी देखना पसंद नहीं करते हैं। हां जब कभी टीवी पर डाग शो आता है तो गिरिराजजी जीभ बाहर निकालकर और पूंछ ऊंची करके उसे जरूर बड़े चाव से देखते हैं। एक-दो कमसिन डागिनियों को देखकर नशीली आवाज में गुर्राते भी हैं। और फिर सोने चले जाते हैं। कई बार घरवालों ने इनके लिए नौकरी ढूंढने का भी प्रयास किया मगर गिरिराजजी ठहरे मलूकदास के भैरंट चेले। जिनके जीवन का महावाक्य है कि अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम दास मलूका कह गए सबके दाता राम..। दार्शनिक गिरिराजजी के सामने जब भी कोई किसी नौकरी का ओछा प्रस्ताव लेकर गया गिरिराजजी ने उसे तत्काल झिड़क दिया। अधम चाकरी तो संसारी लोगों के काम हैं। गिरिराजजी जैसे वीतरागियों के लिए नहीं। काम,क्रोध और लोभ आदमी की वासनाएं हैं। कुत्तों की नहीं। आदमी कुत्ते को भी आदमी बनाना चाहता है। मगर गिरिराजजी का कुतत्व तो सत्ताइस कैरेट का है। बिल्कुल खरा। कहीं-कोई मिलावट नहीं। मिलावटी संस्कृति में जी रहे आदमी को गिरिराजजी का खरा कुतत्व देखकर हीनता का बोध होता है। मैं गिरिराजजी जैसे खरे कुत्तों के प्रति बड़ा श्रद्धाभाव रखता हूं। मेरे मन में उनके लिए बड़ी हाईक्वालिटी का सम्मान है। इनकी ठसक अगर किसी की कसक बन जाए तो इसमें इन बेचारे का क्या दोष। अब आपका दिया तो खा नहीं रहे हैं। और जब घरवालों को परेशानी नहीं है (अगर हो भी तो आपसे कहने नहीं आंएगे) तो फिर आपको क्यों मिर्ची लग रही है। ये तो भैया वही कहावत हो गई कि तेली का तेल जले और मशालची के अंग विशेष में दहन होने लगे। आदमी किसी दूसरे का सुख देखकर पता नहीं क्यों जलता है। ईर्ष्या आदमी का विकार है। कुत्तों का नहीं। इसीलिए कुत्ता सीधा स्वर्ग जाता है। कुत्तों के सहारे युधिष्ठिर को भी स्वर्ग में एंट्री मिल जाती है। कुत्ता तो जितने दिन जीता है वो इस संसार को भी स्वर्ग ही मानता है। इस हिसाब से हमारे गिरिराजजी बाकायदा स्वर्गवासी हैं। और डीलक्स ब्रांड स्वर्ग का भरपेट आनंद उठा रहे हैं। भले ही घरवालों को उन्होंने नर्कवासी बना दिया हो। गिरिराजजी को न नौकरी का झंझट है न मंहगाई का दर्द। ऐसे दोयम दर्जे के मुद्दों पर सोचने का काम उन्होंने घरवालों पर ही छोड़ दिया है। इनकी तो बस अब एक ही इकलौती महत्वाकांक्षा है कि भारत का नासा केन्द्र जब कभी मंगल ग्रह को कोई अंतरिक्षयान भेजे जिसमें कुत्ते को भेजा जाना हो तो भगवान इन्हें जरूर सिलेक्ट करवा दे। एक अच्छे कुत्ते की सारी पात्रता इनमें है। ऐसा मौका देश का और गिरिराजजी दोनों का नाम ऊंचा कर देगा। तब घरवालों को समझ में आएगा कि गिरिराजजी की क्या हैसियत है। मुझे पूरा यकीन है कि भगवान इनकी अंतिम इच्छा जरूर पूरी करेंगे। वैसी भी भगवान आजकल आदमी से ज्यादा कुत्तों पर ही मेहरबान है।

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