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Monday, December 31, 2012

Nav Varsh ki Hardik Shubh Kamnaye


Sarvbhasha Sanskriti Samanvya Samiti ki aur se samast sathiyo ko 
Nav Varsh ki Hardik Shubh Kamnaye.

RAJANI KANT SHARMA RAJU
Rastriya Upadhyaksh ,SSSS

Sunday, December 30, 2012

जिंदगी के कदम कभी रुकते नहीं हैं

             अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति-
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तमाम हादसों और दुर्घटनाओं के बावजूद जिंदगी के कदम कभी रुकते नहीं हैं। हर बार एक नई ताक़त और एक नए जोश के साथ ज़िंदगी फिर आगे बढ़ती है। आनेवाला साल उम्मीदों की एक नई और सुनहरी सुबह बनकर आपकी उपलब्धियों के आंगन में उतरे...इन्हीं मंगल कामनाओं के साथ आइए करें हम-2013 का शुभकारी अभिनंदन...
-पंडित सुरेश नीरव

देश के बुद्धिजीवियों को संजीदगी से अब सोचना ही होगा

देश के बुद्धिजीवियों को संजीदगी से अब सोचना ही होगा
अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति दामिनी के चले जाने के समाचार से क्षुब्ध और क्रुद्ध दोनों है। हमें शर्मिंदगी है कि हम उस समाज में जी रहे हैं जहां नैतिक मूल्य तेजी से समाप्त हो रहे हैं। और उनके रिसाव को रोकने के लिए कोई सार्थक प्रयास किसी भी स्तर पर कहीं भी नहीं किये जा रहे हैं। पाठ्यक्रमों से नैतिक शिक्षा के अध्याय हटा दिए गए हैं। और संचार माध्यमों से अपराध लगातार परोसा जा रहा है। दामिनी के साथ हुए नृशंस कुकृत्य ने भले ही सन्नाटे को तोड़ा हो मगर बलात्कार की घटनाएं उस दिन के बाद से भी कहीं रुकी नहीं हैं। आंकड़े मुंह चिड़ा रहे हैं। केंडिल मार्च और बुद्धिजीवियों की अनुत्पादक बहस और सरकार के घड़ियाली आसूं महज लीपापोती है इससे ज्यादा कुछ नहीं। स्त्री घर के बाहर ही नहीं परिवारों में भी बलात्कार का शिकार हो रही है। क्या इसके लिए वो संस्कृति जिम्मेदार नहीं है जिसकी आउटसोर्सिंग युद्ध स्तर पर भारत में आजकल की जा रही है। क्या हमारे पाखंडपूर्ण आचरण इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। क्या अपर्याप्त कानून को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। इस चौतरफा पतन को क्या सिर्फ सरकार के भरोसे ही रोका जा सकता है। देश के बुद्धिजीवियों को इस गंभीर मुद्दे पर संजीदगी से अब सोचना ही होगा। इतिहास गवाह है कि हर गिरावट को कलम के बूते ही रोका गया है। हमारी जिम्मेदारी अब बहुत बढ़ गई है।

Tuesday, December 25, 2012

हैप्पी क्रिसमस

आज धरती पर करुणा के एक ऐसे मसीहा ने अवतार लिया सलीब पर टांग कर भी जिसकी करुणा को पराजित नहीं किया जा सका। शांति और भाईचारे के इस शाश्वत प्रतीक को आइए हम दिल से याद करें...

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जयंती पर-

वो सिर से पांव तक हृदय-ही-हृदय थे...

0 पंडित सुरेश नीरव
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की चर्चा करते ही अक्सर लोगों के दिमाग में एक धर्मनिष्ठ,सनातनी,परंपरावादी हिंदू की छवि उभर आती है। मगर मालवीयजी के बारे में जिन्होंने गहराई से पड़ताल करने की कोशिश की है उन्हें मालवीयजी एक धर्मनिरपेक्ष,मानवतावादी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती,हरिजनों के उद्धारक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखवेवाले एक ऐसे सेतु पुरुष लगे हैं जो आंदोलनकारियों और क्रांतिकारियों दोनों के ही बीच एक प्रतिष्ठा-पुरुष हैं और स्वाधीनता आंदोलन के ऐसे विराट सिंधु भी जहां राजनीति की नर्म और गर्म दोनों धाराएं समाहित हो जाती हैं। वे जब 15 वर्ष की उम्र में मिर्जापुर करी विद्वान सभा में बोलते हैं तो उनके धाराप्रवाह प्रवचन से संपूर्ण विद्वतजन हतप्रभ हो जाते हैं। और प्रसिद्ध विद्वान पंडित नंदा राय अपनी नुदुषी कन्या कुंदन देवी की उनसे सहर्ष शादी कर देते हैं। और जब यही मालवीयजी गोलमेज कांफ्रेंस मेंलंदन की संसद में अंग्रेजी में जलियांवालाबाग की विभीषिका का चित्रण करते हैं तो महिलाएं मूर्छित हो जाती हैं और पुरुष सांसदों की आंखें भी भर आती हैं। लोहगों को आश्चर्य होता है कि एक परंपरावादी भारतीय,जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है वह इतनी निर्बाथ और प्रभावी प्रस्तुति अंग्रेजी में कैसे कर पाया। लंदन के अखबार उस अलौकिक व्यक्तित्व की प्रशंसा से भर जाते हैं। और वह भी तब जबकि एक गुलाम देश का भारतीय,अंग्रेज सरकार के खिलाफ,उसके ही घर में आकर बोला हो। स्कॉटलैंड का वह अधिकारी जिस पर मालवीयजी की सुरक्षा का जिम्मा था-डॉक्टर एस.के.दत्त से बरबस ही कह उठता है-mahatma Gandhi is of course a saint and seer but there is something of the lord in the eyes of pt.malviya.( महात्मा गांधी महात्मा हैं ही। वह एक संत और अवतारी पुरुष हैं मगर मालवीयजी के नेत्रों में तो स्वयं ईश्वर-जैसी कोई चीज़ है। मालवीयजी की उपमा डिजरायली और ग्लेडस्टन-जैसे प्रखर वक्ताओं से की जाए और मालवीयजी का भाषण सुनकर गृहमंत्री सर विसेंट स्मिथ की पत्नी बरबर ही यह कह उठे कि मालवीयजी के बाद मेरे पति क्या बोल पाएंगे तो यह चमत्कार था मालवीयजी के व्यक्तित्व में। कहा जाता है कि मालवीयजी के पिता पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी अपने दिवंगत पिता प्रेमधर मालवीय के क्षाद्ध-तर्पण के लिए बोधि गया गए तको पुजारी ने कहा- पूर्प की ओर मुख करके सूर्य से कोई भी वरदान मांग लो,अवश्य पूरा होगा। तो उस समय पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी ने एक असाधारण पुत्र की कामना की। जिसका यश भी सूर्य के समान हो। उनकी प्रार्थना ईश्वर ने स्वीकार कर ली। 25 दिसंबर 1861(पौष कृष्णाष्टमी,मार्गशीर्ष माह) इलाहाबाद में मूना देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी ने इस नन्हे पुत्र का नाम बड़े प्यार से मदन मोहन रखा। जब बालक मदन मोदन पांच वर्ष के हुए तो इनके पिता संस्कृत के प्रख्यात विद्वान पंडित हरदेव की पाठशाला लेकर गए। प्रारंभिक परीक्षा के तौर पर पंडित हरदेव ने मदनमोहन को एक श्लोक पढ़ने को कहा। मदनमोहन ने उस श्लोक को इतने प्रभावी ढंग से पढ़ा कि हरदेवजी ने गदगद गोते हुए इनके पिताजी से कहा कि यह बालक असाधारण विद्वान निकलेगा। और यशस्वी भी होगा। बाद में हरदेवजी ने बालक मदनमोहन को लघु कौमुदी तथा भगवत गीता का अध्यापन किया और कुछ समय बाद फिर घोषणा की कि मदनमोहन का अनुशासन और प्रखर मेधा को देखकर मैं कह सकता हूं कि बालक अब उच्च-से-उच्च शित्रा प्राप्त करने में समर्थ हो गया है। इसबीच मदन मोहन के कुछ मित्र अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने जाने लगे तो इन्होंने भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने की इच्छा व्यक्त कीछ पिता की आर्थिक स्थित जब इस इच्छा के आगे प्रतिरोध बनने लगी तो माता मूनादेवी ने अपने गहने बेचकर अपने पुत्र की इछ्छा पूरी कर दी। यहां गोर्डन साहब-जैसे सख्त और अनुशासनप्रिय अध्यापक से इनका पाला पड़ा। जो ज़रा-सी देर हो जाने पर कठोर दंड देने के लिए मशहूर थे। मदन मोहन रात का खाना सुबह खाकर स्कूल पहुंचते। शाम को अपने सहपाठी के घर जाकर होमवर्क करते और फिर रात में घर पहुंचते और फिर सुबह स्कूल के लिए निकल पड़ते। बहरहाल गोर्डनसाहब को शिकायत का मौका उन्होंने कभी नहीं दिया। 1881 में मदन मोहनजी नेइंटर की परीक्षा पास की और आगे की पढ़आी के लिए म्योर सेंट्रलकॉलेज में भर्ती हो गए। 1884 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी।ए. की दिग्री हांसिल की। आगे की पढ़आी के लिए अभी सोच ही रहे थे कि आऱ्थक स्थिति फिर आड़े आ गई। एम.ए. करने के बजाय 40 रुपये महीने की सहशिक्षक की नौकरी कर उन्होंने अपने लड़खड़ते परिवार को सहारा दे दिया। इसबीच कलकत्ता में कृग्रेस का दूसरा अधिवेशन हुआ। यहां मालवीयजी ने जो भाषण दिया षउसे एक ऐतिहासिक भाषम माना गया। और यहीं से शुरू हुई मालवीयजी महाराज की राजनैतिक यात्रा। इसी मंच से जब कालाकांकर के राजा रामपालसिंह ने 26 वर्षीय मालवीयजी का भाषशण सुना तो इतने प्रभावित हुए कि तुरंत उन्हें हिंदुस्तान अखबार का संपादक भार सौंप दिया। मालवीयजी ने अपनी कुशल लेखनी से बहुत जल्द ही इस अखबार को राष्ट्रीय चेतना का प्रमुख पत्र बना दिया। सर्वत्र इनके संपादकीय कौशल की प्रशंसा होने लगी।
राष्ट्रीय चेतना का प्रतिबिंबःअभ्युदय-
हिंदुस्तान के बाद मालवीयजी ने राष्ट्रीय चेतना का समाचार साप्ताहिक अभ्युदय निकाला। यह वह दौर था जब स्वदेशप्रेम के लिए गणेशशंकर विध्यार्थी का प्रताप और मालवीयजी का अभ्युदय देशभक्ति की रामायण और गीता का दर्जा हासिल कर चुके थे। अभ्युदय में तीखे और चोखे-चुटीले व्यंग्यों से अंग्रेज सरकार पर प्रहार किए जाते और किसानो,मजदूरों और हरिजनों की बात पूरे दमखम से कही जाती। सम 1923 से1929 तक तो अभ्युदय स्वतंत्रता की रणभेरी बना रहा। भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद पर विशेषांक निकालकर इस पत्र ने पत्रकारिता के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। बाद में मालवीयजी ने इलाहाबाद के लीडर,इंडीयन यूनियन को भी अपना सरंत्रण प्रदान किया। तथा आगे चलकर सनातनधर्म पत्रिका का भी प्रकाशन शुरू कर दिया। इस तरह मालवीयजी ने विचार और अखबार दोनों के माध्यम से देश की संवेदना को वाणी दी। और अंग्रेजी हुकूमत से जंग जारी रखी।
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*शब्दिका -
लोकतन्त्र
*मुखर है ----
*सत्ता की
*ओखली में ,
*जनता का सर है --
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*प्रकाश प्रलय
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Monday, December 24, 2012

हिंदी की दुर्दशा

रेल्वे बुक स्टाल और हिंदी की दुर्दशा
अभी हाल में पुरानी दिल्ली रेल्वे जंक्शन के बुक स्टॉल पर हिंदी पत्रिकाओं और पुस्तकों की तलाश में एक सामान्य पाठक की तरह भटकता हुआ मैं भी पहुंचा। और मैंने कमलेश्वर,धर्मवीर भारती,अमृतलाल नागर,हरिशंकर परसाई,शरद जोशी,राजेन्द्र यादव, गोपाल चतुर्वेदी-जैसे प्रतिष्ठित हिंदी लेखकों की पुस्तक के बारे में पड़ताल की तो जवाब नकारात्मक मिला। फिर मैंने जब कादम्बिनी, ज्ञानोदय, हंस-जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में पूछा तो एक भी पत्रिका इस स्टॉल पर नहीं मिली। जब कि दोयम दर्जे की तमाम पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें वहां इफरात में उपलब्ध थीं। क्या हिंदी के पाठकों को इतने हेय दृष्टि से देखा जाता है कि उनकी पसंद और ना पसंद का इनके लिए कोई मतलब ही नहीं होता। जब दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण स्टेशन के स्टॉल की हालत ये है तो बाकीस्टेशनों  का अंदाजा अपने आप लगाया जा सकता है। क्या रेल्वे प्रशासन ने इन बुक स्टॉलों की गुणवत्ता के लिए कभी कोई आचरण संहिता बनाई है।या फिर ठेका ठूट जाने के बाद वह इस दायित्व से अपने को मुक्त समझने लगते हैं। क्या इन स्टॉलों पर अच्छी पुस्तकों की उपलब्धताके लिए रेल्वे प्रशासन अपना नैतिक फर्ज समझते हुए समय रहते कोई ठोस कदम उठाएगा या फिर इसके लिए साहित्यप्रेमियों को भी लामबंद होना पड़ेगा। माननीय रेलमंत्रीजी,रेल्वे की हिंदी समिति इस देश की राष्ट्रभाषा और राजभाषाके प्रति अपने सामाजिक सरोकारों को समझते हुए कोई सुखद रचनात्मक कदम उठाए हमारी यही गुजारिश है।

Sunday, December 23, 2012

डॉक्टर श्याम निर्मम नहीं रहे


डॉक्टर श्याम निर्मम नहीं रहे
अभी-अभी मेरे मित्र दिनेश वत्स ने समाचार दिया है कि कवि-गीतकार डॉक्टर श्याम मिर्मम नहीं रहे। वह कई दिनों से बीमार चल रहे थे। और मैक्स हॉस्पिटल में उनका इलाज चल रहा था। (साहिबाबाद)गाजियाबाद में रह रहे श्याम निर्मम पालिका समाचार के संपादक रहे थे और आजकल अनुभव प्रकाशन चला रहे थे। अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति की ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि..

Saturday, December 22, 2012

मक्खी हमारे दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है


हास्य-व्यंग्य-
 प्रभु मोहे मन की मक्खी मिले
-पंडित सुरेश नीरव
हमें गर्व है कि हम उस मक्खी-प्रधान देश के वासी हैं जिसे कि मक्खियों के मामले में दुनिया में एक विकसित सुपरपावर देश का दर्जा हासिल है। मक्खी हमारे दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मक्खी के बिना हमारी ज़िंदगी वैसी ही बेमतलब है जैसे गोरेपन की क्रीम के बिना रेशमी त्वचा। ये मक्खियां ही तो हैं जो हमारी ज़िंदगी को सनसनाती ताजगी से भरपूर बनाती हैं। मक्खियां हमारे रोबदार व्यक्तित्व का श्रृंगार हैं। हजार शेर मारने के बाद भी किसी को वह सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती है जो सदियों से एक तीसमारखां को हमारे देश में फटाक से मिल जाती है। इसीलिए हर महत्वाकांक्षी हिंदुस्तानी की यही इकलौती अंतिम इच्छा रहती है कि जीते-जी उसे भी एक अदद तीसमारखां का सर्वोच्च खिताब हासिल हो जाए। बड़ी उग्र साधना और तपस्या के बाद ही चंद खुशनसीबों को हमारे देश में यह खिताब हासिल हो पाता है। क्योंकि किसी भी सरकारी-गैर सरकारी संस्था द्वारा इस का चुनाव नहीं किया जाता है। और न ही इसके जुगाड़ के लिए कहीं कोई प्रायोजित सर्वे ही किये जाते हैं। इसे हासिल करने के लिए भैरंट सर्वसम्मति और अटूट लोक-मान्यता के साथ ही मक्खियों के बिना शर्त बलिदानी सहयोग की सख्त ज़रूरत होती है। सिर्फ यही देश का एक मात्र ऐसा अलंकरण है,जो निर्विवाद है और जिसे मिल गया उसने कभी इसे लौटाया नहीं। तीस मक्खियों का नृशंस वध करने की जिसमें दुर्दांत कुव्वत होती है सिर्फ वही वीर मक्खी-मर्दक इस खिताब को हासिल कर पाता है। कहते हैं स्वर्ग में मक्खियां नहीं होती हैं।यह देवताओं का मक्खीमोह ही है जो बार-बार उन्हें भारत में जन्म लेने के लिए ललचाता है। उन देशों में क्या अवतार लेना जहां मक्खी डायनासोर की तरह प्रलुप्त प्रजाति में दर्ज हो चुकी हो। और बेचारे देवता फालतू समय में मक्खी मारने को भी तरस जाएँ। यह तो सरासर नाइंसाफी होगी कि चार-चार हाथ और मारने को एक अदद मक्खी नसीब नहीं। हमारी सरकार भी इसलिए मच्छर मारने के लिए भले ही कितने मलेरिया डिपार्टमेंट खोल ले मगर मजाल है कि कभी मक्खी का बालबांका करने की उसने जुर्रत की हो। बिना राजनैतिक भेदभाव के हमारे देश की नगरपालिकाएं तो पूरी निष्ठा के साथ मक्खियों के पालन-पोषण के पुण्यकार्य में ही लगी रहती हैं। उनकी यह अखंड मान्यता है कि स्वस्थ्य पर्यावरण के लिए मक्खी उतनी ही जरूरी है जितनी कि मंत्री के लिए लालबत्ती की कार। पॉश कॉलोनियों और झुग्गी-बस्तियों से लेकर हलवाई की दुकानों तक सफाई दस्तों द्वारा औचक निरीक्षण किये जाते हैं यह देखने के लिए कि देश की इस अमूल्य राष्ट्र-धरोहर के साथ कहीं कोई क्रूर छेड़-छाड़ तो नहीं की जा रही। बिना नहाए-धोए महीनों साधना में रत ऋषि-मुनियों के मक्खी-मंडित दिव्य शरीरों को देखने स्वर्ग की अप्सराएं उनके आश्रमों में पर्यटन के लिए खूब आया-जाया करती थीं। और दाढ़ी-मूंछों पर लगे मक्खियों के छत्तों को देखकर खुशी से ऐसा भरतनाट्यम करने लगतीं कि तप के ताप में तपीं मक्खियां इस कदर घबड़ा जातीं कि ऋषि-मुनियों की तपस्या तक भंग हो जाती। कहते हैं कि जहां गुङ होगा वहां मक्खियां आएंगी ही। गर्दिश में भले ही गुङ का गोबर हो जाए मगर मक्खियां अपना घर छोङकर कभी नहीं जाती। लानत है उन पर जो चंद सिक्कों के लालच में  अपना देश छोङकर चले जाते हैं। इन्हें तो दूध में पङी मक्खी की तरह निकाल ही फेंकना चाहिए। अपुन तो कई साल भरपेट परेशान रहे,लोगों के ताने भी सहे मगर अपनी नाक पर कभी मक्खी नहीं बैठने दी। ये बात दीगर है कि सर्दियों के दिनों में नाक के निचले पठार में प्रवासी साइबेरियन पक्षियों की तरह जरूर कुछ पर्यटक मक्खियां पिकनिक मनाने चली आती हैं। इस मनोरम दृश्य को देखकर मन कह उठता है-मक्खी है जहां..कामयाबी है वहां। कामयाबी की बात चली तो पाताल लोक में अहिरावण के हाइसिक्योरिटी महल में खुद बजरंगबली मक्खी के रूप में ही घुसने में कामयाब हो पाए थे। और चार्ली चैपलिन को सारी शोहरत और कामयाबी उसकी मक्खी मूंछ की बदौलत ही मिली थी। आजकल अपनी कड़क ख्वाइश है कि अपुन की जिंदगी में भी कोई मोटे बैंक-बैलेंसवाली मक्खी आ जाए तो बात बन जाए। इसलिए मैं हरेक मक्खी को ऐसी हसरतभरी निगाहों से निहारता हूं जैसे वर्डबैंक को पाकिस्तान। निहारूं भी क्यों नहीं एक अदद मक्खी ही तो है जो बिन फेरे हम तेरे की तर्ज पर जन्म से मृत्यु तक भिनभिनाती-गुनगुनाती हर पल हर क्षण दिल्ली पुलिस की तरह अपनी सेवा में मुस्तैद रहती है।

लोकार्पण पंडित सुरेश नीरव और कविवर राजकुमार सचान होरी ने किया


ट्रू मीडिया के 
विशेषांक का लोकार्पण
राजधानी से निकलनेवाली मासिक पत्रिका ट्रू मीडिया ने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय पर केन्द्रित विशेषांक निकाला है। इसका लोकार्पण पंडित सुरेश नीरव और कविवर राजकुमार सचान होरी ने किया। इसके संपादक हैं-श्री ओमप्रकाश प्रजापति। साथ में हैं कवि विष्णुदत्त शर्मा।

Friday, December 21, 2012

जब दिल ही टूट गया

अरविंद पथिकजी,
आप कवि हैं। आपको एक अभिनेता और कवि में फर्क मालुम होना ही चाहिए। जिंदगी भर किसी लेखक के लिखे संवादों पर लिपमूवमेंट करनेवाले अभिनेता-अभिनेत्रियों से बौद्धिक बात की अपेक्षा करना ही फिजूल होता है। और इनके लिए किसी भी तरह च्रर्चा में बने रहना इनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद। जो खुद पैसों के लिए कुछ भी और किसी हद तक जाने को तैयार रहते हों ऐसे बिके हुए जमीर के लोग हर घटना को एक सनसनी से ज्यादा कुछ नहीं समझते। इनके लिए काहे का यूपी और काहे का महाराष्ट्र।आप खामखा इनकी बातों को सीरियसली ले रहे हैं। वैसे दिल्ली में आजकल जो आए दिन हो रहा है उस पर थू..थू..के अलावा और कोई क्या करे। दिल्ली यानी भारत का दिल। जब दिल ही टूट गया अब जी कर क्या करेंगे..
-सुरेश नीरव

Thursday, December 20, 2012

दो-तीन दिन के शोर शराबे के बाद फिर वही पुराना ढर्रा.

बलात्कार को लेकर कल मैंने जो पोस्ट लिखी उस पर कई मित्रों के लिचार आए। सोचा कि सिलसिलेवार उनके जवाब में दे दूं। पेश है वही कोशिश..
धन्यवाद राहुल उपाध्यायजी,कवि रामकेश यादवजी,श्री हीरालालपांडेयजी, धीरज चौहानजी,अभिषेक चौहानजी और पीयूष चतुर्वेदीजी। सबसे पहले तो आप सभी का आभार कि आपने समाज की एक घृणित समस्या पर गंभीरता से विचार करने का मन बनाया और विस्तार से अपनी बात कही भी। अधिकांश लोगों ने फेसबुक पर हर समस्या के समाधान का ठेका पसंद है के टोटके के भरोसे ही छोड़ दिया है। वे कुछ टिटरू-टूं लिख देते हैं तो फिर रिक्वेस्ट भेजते हैं कि मेरी पोस्ट को प्लीज लाइक कर दीजिए, कुछ टिप्पणी कर दीजिए.. और फिर खामोश हो जाते हैं। कुछ खाली अपनी फोटो ही डालते रहते हैं। ऐसे आत्ममुग्ध फेसबुकियों की तरह ही आज का समाज भी है। जो हर बात में अपना फायदा देखते हैं। और कुछ नहीं तो चलो इसके बूते आत्मप्रचार ही हो जाए। उनके लिए हर हादसा एक इंटरव्यू देने का बहाना है इससे ज्यादा कुछ नहीं। तमाम समाजसेवी संस्थाएं हादसा होते ही मीडिया से संपर्क करती हैं कि हमारा इंटरव्यू हो जाए इस मुद्दे पर। समस्या मगर वहीं खड़ी-की खड़ी रह जाती है। पीयूष चतुर्वेदी ने जो कहा है उससे में सहमत हूं। मां-बाप पहली पाठशाला होते हैं। जब वहीं से उन्हें नैतिक शिक्षा नहीं मिलती तो फिर ऐसे अपराधी ही समाज को मिलते हैं। जरूरत है आज समाज में नैतिक शिक्षा की जिसे चिरकुट नेताओं ने पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया है। क्योंकि मेरी कमीज़ से उसकी कमीज़ ज्यादा सफेद क्यूंवाला मामला है। भ्रष्ट नेताओं और हरामखोर अफसरों की फसल भी उसी परिवार से आती है जहां से अन्य अपराधियों की आती है। राहुल की चिंताभी बाजिब है कि दो-तीन दिन के शोर शराबे के बाद फिर वही पुराना ढर्रा..हमें कुछ सॉलिड सोचना और करना होगा वरना नाम बदल जाएंगे और अपराध यूं ही होते रहेंगे।

Wednesday, December 19, 2012

बलात्कार का अभिषाप

बलात्कार की घटना को सनसनी बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कि समाज के उस सामूहिक -मन का भी गहन अध्ययन  किया जाए जो अपराध के क्षणों में संगठित होकर अपराधकर्म में सहकारिता दिखाता है। पांच-छह लोगों के बीच कभी कोई एक भी आवाज़ इस कुकृत्य के विरोध में क्यों नहीं खड़ी होती। क्या वे बलात्कारी बलात्कार को अपराध नहीं मानते,अपराध की सजा का क्या उन्हें भय नहीं होता। क्या समाज द्वारा ऐसे लोगों ने कभी कोई सामाजिक-बहिष्कार कभी झेला है। जब तक इन मुद्दों पर गंभीरता से चिंतन-मंथन नहीं होगा इस अभिषाप से मुक्ति मिलना कठिन ही नहीं असंभव-भी जान पड़ती है।

सरफ़रोशी की तमन्ना

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन
सरफ़रोशी की तमन्ना
आज बलिदान दिवस है देश के उन दो जांबाज नौजवानों का जिन्होंने देश की आजादी की जंग में अपना जीवन बलिदान कर दिया।  पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खान। एक पंडित तो दूसरा पठान। दोनों की राह मगर एक। मजहब की कोई दीवार नहीं। दोनों भारत माता के दो सपूत । दोनों की सरफरोश तमन्ना बस एक..देश की आजादी। फांसी के फंदे पर झूलते हुए दोनों की एक ही दहाड़- हम ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहते हैं। जब तक देश आजाद नहीं हो जाता हम बार-बार जन्म लेंगे और फांसी के फंदे पर झूलते रहेंगे। आज इन बलिदानियों के रास्ते पर चलना तो बहुत दूर लोगों को इनकी शहादत के दिन इन्हें याद करना भी गवारा नहीं। जो कौमें अपने शहीदों का सम्मान नहीं करती वह ज्यादा दिन आजाद भी नहीं रह पाती हैं। हम हिंदुस्तान की तरफ से पूरे सम्मान के साथ इन दोनों अमर शहीदों को इंकलबी सलाम करते हैं।
-पंडित सुरेश नीरव
(अध्यक्षः पंडित रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन)

Tuesday, December 18, 2012

मालवीय जयंती काव्यसमारोह

मालवीय जयंती पर 23 दिसंबर को सुबह 10.30 बजे सोनिया विहार के सरस्वती फार्म में (जो कि राधास्वामी आश्रम के बगल में स्थित है,नानकसर गुरुद्वारे से पुस्ता नं-6 पर) अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति की दिल्ली शाखा काव्य समारोह आयोजित कर रही है। आपकी उपस्थिति सादर प्रार्थित है। किसी भी जानकारी के लिए संपर्क करें-चौधरी त्रिलोक सिंह गुर्जर-मोबाइलः8506005661

सेवार्थियों का सम्मान से बढ़ता है मनोबल : अग्रवाल

हम तेजी से प्रगति की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन अपनी जरूरतों के साथ-साथ समाज में सक्रिय योगदान देने वाले लोगों को जब सम्मानित किया जाता है तो उनका मनोबल बढ़ता है और अन्य लोग भी अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित होते हैं। यह बात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद जय प्रकाश अग्रवाल ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् (आइसीसीआर) स्थित आजाद भवन में कही। मौका था सामाजिक एवं साहित्यिक संस्था उद््भव द्वारा आयोजित सांस्कृतिक सम्मान का।
कार्यक्रम में उद्भव शिखर सम्मान से आइआरएस संगीता गुप्ता, साहित्यकार बीएल गौड़, कानपुर के ज्योतिषाचार्य रत्नाकर शुक्ल, महाराष्ट्र के समाजसेवी संभाजी एन. गित्ते, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्रशेखर आश्री के अलावा उद्भव विशिष्ट सम्मान से शिक्षा अधिकारी एम.एल.अम्भोरे, देहरादून से आए साहित्यकार रूपनारायण सोनकर, शिक्षाविद् वासुदेव पंत को सम्मानित किया गया। उद्भव मानव सेवा सम्मान से समाज सेवी प्रवीण धींगरा, रामबिलास अग्रवाल, अनिल वर्मा, साहित्यकार डा. लालित्य ललित, शिक्षाविद् स्वाति पूर्णानंद को सम्मानित किया गया। मंच का संचालन उद्भव के महासचिव और साहित्यकार डा. विवेक गौतम ने किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में सलाहकार हिंदी आइसीसीआर अजय गुप्ता, कवितायन के अध्यक्ष वी. शेखर, शिक्षाविद् अशोक कुमार पांडेय, भारत भूषण गुप्ता, वरिष्ठ साहित्यकार डा. अरुण प्रकाश ढौंडियाल मौजूद थे। इनके अलावा शिक्षाविद सीपीएस वर्मा, समाजसेवी एस.एल.चौरसिया, हरिराम द्विवेदी, दिनेश उप्रेती और रामचंद्र बडोनी का विशेष योगदान रहा।

पंडित सुरेश नीरव सामाजिक सरोकारों से लैस एक जागृत कवि

बी.एल. गौड़
हिंदी साहित्य में समय-समय पर अनेक शब्द साधक हुए हैं,जिन्होंने अपनी-अपनी प्रतिभा के अनुसार साहित्य को संपन्न और गरिमा-मंडित किया है।
साहित्य में मैंने एक दौर  ऐसा भी देखा है जब कभी वाचिक परंपरा और लेखन विधा दोनों में कवि समानरूप से स्वीकार्य होते थे। धीरे-धीरे मुद्रित
शब्द और मंच के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। क्योंकि मंच के व्यावसायिक आकर्षण ने एक ऐसी जमात को मंच पर लाकर खड़ा कर दिया जो फूहड़पन और
लतीफेबाजी के बल पर जनता के बीच मज़मेबाजी करने लगी। और इनके लिए तालियां कविताओं के  नापने का पैमाना बन गया। दूसरी तरफ पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के जरिए ऐसी कविताएं लिखी जाने लगीं जो नीरसता की हद तक गूढ़ होने लगीं। नतीज़ा यह हुआ कि संभ्रांत और कविता के सुधि अनुरागियों के
लिए ऐसी कविताएं बोझिल व्यायाम साबित होने लगीं।  कविता के इस दो तरफा नुकसान के दौर में फिर भी कुछ काव्य हस्ताक्षर ऐसे निकले जिन्होंने कविता की वाचिक और अकादमिक परंपरा के बीच सेतु का कार्य किया। अपसंस्कृति के कुहासे में निकले ऐसे ही एक समझदार संस्कृति के चेहरे का नाम है-पंडित सुरेश नीरव। मैंने जब-जब उन्हें सुना यह देखकर मैं चकित,विस्मित और मुदित हुआ कि किस तरह कविता की वैचारिक शुचिता और श्रुति-माधुर्य को नीरवजी ने हासिल किया है। कैसे इनका व्यक्तित्व अपनी अग्रज पीढ़ी और अनुज पीढ़ी दोनों को मोहित-सम्मोहित कर लेता है। ओशो रजनीश,मुज़फ्फ़र रज्मी,आचार्य
निशांत केतु-जैसे वरिष्ठ शब्द साधकों और बशीर बद्र, क़ाज़ी तनवीर-जैसे शायरों सहित लगभग तीन सौ से अधिक पुस्तकों की भूमिका लिखने का हुनर इस बात की ताकी़द करता है कि रचना-जगत में पंडित नीरव को वाकई गंभीरता से लिया जाता है। मैं स्वयं नीरवजी से उम्र में वरिष्ठ हूं और यह दावा तो नहीं कर सकता कि कि मैंने हिंदी-उर्दू के सभी श्रेष्ठ रचनाकारों को सुना है मग़र विनम्रतापूर्वक यह जरूर कह सकता हूं कि अपनी उम्र के लंबे सफ़र में काफी नामचीन और प्रतिष्ठित कवियों-शायरों को सुनने का मुझे सौभाग्य मिला है। फिर भी पंडित नीरव को सुनने में मुझे हमेशा एक अलग तरह की सारस्वत आनंद की अनुभूति हुई है। शब्दों की उत्पत्ति और भारतीय दर्शन की वैदिक गंध और विज्ञान के शब्दों का अभिनव संयोजन वो जिस तरह करते
हैं,उनका यह सृजन-लाघव उन्हें अन्य रचनाकारों की क़तार से अलग खड़ा कर देता है। मशहूर शायर बशीर बद्र ने इनके लिए एक जगह ठीक ही लिखा है कि- पंडित नीरव ने विज्ञान के ऐसे तमाम शब्दों को ग़ज़लों में ढाल दिया है कि लगता ही नहीं कि ये कभी बाहरी लफ्ज़ रहे होंगे। ऐसे वैज्ञानिक और दार्शनिक चेतना से लैस कवि को जब–जब मैंने सुना मेरी इच्छा हुई कि मैं इनके बारे में कभी कुछ कहूं,कभी कुछ लिखूं।

 पिछले दिनों साहित्य अकादेमी ने दिल्ली में पंडित सुरेश नीरव का एकल काव्य-पाठ आयोजित किया था। मैं भी वहां ससम्मान आमंत्रित था। मैंने नीरवजी को पद्य में सुना। फिर प्रश्नोत्तरकाल में रचनाकारों के उन के दिये उत्तरों को सुना। उन्होंने जो उत्तर दिए उसे सुनने के बाद मुझसे रहा नहीं गया। मैंने अपने वक्तव्य में सार्वजनिकरूप से कहा कि- मैंने अपने जीवन में अनेक कवियों को सुना है मग़र मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि पंडित नीरव-जैसे विद्वान को मैंने आज तक नहीं सुना। मेरे इस कथन की ताक़ीद करते हुए हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विमलेश कांति ने कहा- अक्सर कवि विद्वान नहीं होते और विद्वान कवि नहीं होते मग़र सुरेश नीरव में ये मणि-कंचन संयोग विद्यमान है। तब मुझे लगा कि जैसा मैं सोचता हूं वैसा में अकेला नहीं सोचता हूं। और इस तरह यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि वे आज के दौर के एक ज़रूरी कवि हैं जिनमें समाज को कविता के जरिए एक संदेश देने की ललक है। और सामर्थ्य भी। वे यशस्वी हों..मेरी अनेक मंगल कामनाएं।

Monday, December 17, 2012

अदम गौंडवीं साहब की पहली पुण्य तिथि

आज अदम गौंडवीं साहब की पहली पुण्य तिथि है।
मुझे उनके साथ कई कविसम्मेलनों में
कविता पढ़ने का सौभाग्य मिला था।
उनकी कविताएं साधनहीनों का हथियार थीं।
देश के उन तमाम निसहायों की ओर से
उनका मधुर स्मरण।

मालवीय जयंती काव्य समारोह


सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति
पंडित मदन मोहन मालवीय जयंती 
काव्य समारोह
सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति की दिल्ली इकाई आगामी 23 दिसंबर को पंडित मदन मोहन मालवीय की 150वीं जन्म-जयंती पर सोनिया विहार(पुश्तानंबर-4) के सरस्वती फार्म में प्रातः 10.30 बजे काव्य समारोह आयोजित कर रही है। साहित्यानुरागी सादर आमंत्रित हैं। संयोजक हैं-श्री त्रिलोक सिंह गुर्जर। मोबाइलः08506005661

Sunday, December 16, 2012

"अंतर्द्वंद्व" का विमोचन

 लोकार्पण गोष्ठी-
कविता तो देवों कि वाणी होती है 
-पंडित सुरेश नीरव
दिनांक 16 दिसंबर को सुबह 11 बजे से देहरादून स्थित "अज़ीम जी फाउन्डेशन" के सभाकक्ष में श्री राकेश जुगरान कि पुस्तक "अंतर्द्वंद्व" का विमोचन हुआ. कार्यक्रम की अध्यक्षता "अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति" के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित सुरेश नीरव ने की. कार्यक्रम में एक वैचारिक गोष्ठी का भी आयोजन किया गया था जिसमें जीवन में कविता के मायने पर विमर्श हुआ. राहुल उपाध्याय की कविता "माँ" को बहुत सराहा गया तथा सभी माननीय अतिथियों का सम्मान प्राप्त हुआ. विमर्श को अंतिम रूप दिया पं. सुरेश नीरव जी के वक्तव्य ने जिसमें उन्होंने कहा कि कविता के मायने पूछना पुष्प से सुगंध के मायने, सूर्य से धुप के मायने और जीवन से साँसों के मायने पूछने जैसा है. इन सभी कि केवल अनुभूति की जा सकती है और इनको आत्मसात किया जा सकता है. कविता तो देवों कि वाणी होती है जो मनुष्य को साधन बना कर समाज तक आती है. उसी साधन का कवि के रूप में सम्मान होता है.

Saturday, December 15, 2012

*शब्दिका,,,
*------------
*बद-दुआओं ने
*ऐसा
*असर किया --
*उम्र दूनी      
*यहाँ पर जिया ---
-------------------
*प्रकाश प्रलय
--------------------

Friday, December 14, 2012

राकेश जुगरान के काव्य संग्रह अंतर्द्वद्व का लोकार्पण


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अंतर्द्वद्व काव्य संग्रह का लोकार्पण
देहरादून- अजीम फाउंडेशन के तत्वावधान में प्रतिष्ठित कवि राकेश जुगरान के काव्य संग्रह अंतर्द्वद्व  का लोकार्पण 16 नवंबर को प्रातः ग्यारह बजे किया जाएगा। लोकार्पण विख्यात हिंदी कवि एवं पत्रकार पंडित सुरेश नीरव करेंगे,जिन्होंने कि इस संग्रह की भूमिका भी लिखी है। कार्यक्रम के द्वितीय चरण में कविगोष्ठी का भी आयोजन किया गया है जिसमें दिल्ली के कवि राहुल उपाध्याय को भी खासतौर पर आमंत्रित किया गया है। अन्य कवियों में श्रीनगर से सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति की उत्तराखंड इकाई के संयोजक कवि नीरज नैथानी,प्रदीप जैन समेत अनेक स्थानीय कवि रचनापाठ करेंगे।
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Wednesday, December 12, 2012

*शब्दिका,
----------
*दर्द को,
*मैंने
*अपना लिया --
*तब जला,
*प्यार का
*एक दिया -----
--------------------
*प्रकाश प्रलय
---------------------
*शब्दिका --
-------------
*बढ़ी
*धड्कन ,
*खतरे में
*हार्ट,---
*वालमार्ट*
-------------
*प्रकाश प्रलय
----------------******---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

Tuesday, December 11, 2012

समाज कल्याण पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित ये आलेख-


 समाज कल्याण पत्रिका के ताजा अंक में प्रकाशित ये आलेख-
(संदर्भः10 दिसंबर मानव-अधिकार दिवस)
मानवाधिकार की अवधारणा और भारतीय संस्कृति
0 सुरेश नीरव
प्रकृति ने सभी मनुष्यों को एक समान बनाया है। और उसे उसकी बुनियादी आवश्यकताएं उपलब्ध कराने का भी जिम्मा भी स्वयं प्रकृति ने लिया है। लेकिन जाति,धर्म,भाषा और आर्थिक विषमताओं ने आदमी के बीच ऊंच-नीच का भेदभाव पैदा कर दिया। गरीब आदमी अपने आकाओं का गुलाम बना दिया गया। और असहाय आदमी पशुओं की तरह खरीदा-बेचा जाने लगा। गरीब का अमीर लोगों द्वारा अमानवीय उत्पीड़न किया जाने लगा। औपनिवेशिक व्यवस्था में मानव संसाधन राज्य के धनोपार्जन के लिए महज़ कच्चा माल बना दिया गया। जहाजों में भर-भरकर गिरमिटिया मजदूरों को उनके अपने देश से बाहर जबरन ले जाया जाने लगा। तमाम निःसहायों को हिटलर के गैस चैंबरों में ठूंसकर जिंदा दफ्न कर दिया गया। इतिहास गवाह है कि जापान के हिरोशिमा और नागासाकि को परमाणुबम की भेंट चढ़ाकर सत्ता ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। राजनैतिकमहत्वाकांक्षाओं ने न जाने कितने देशों को युद्ध की आग में झोंक दिया।
दो-दो विश्वयुद्ध झेल चुका आहत मानव समाज युद्ध की विभीषिकाओं और युद्धबंदियों पर हुए अत्याचारों और निरीह जनता के कत्लेआम से खुद-ब-खुद सिहर उठा। कई देश संपन्न हो गए और कई देश की आम जनता एक  अदद रोटी के लिए भी मोहताज हो गई। कुपोषण और प्राकृतिक आपदाओं ने उन्हें पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को विवश कर दिया। तब दुनिया के लगभग सभी देशों की सरकारों ने गंभीरता से सोचा कि आखिर हम कब तक इंसान को पशुओं की तरह जीवन जीते हुए देख सकते हैं। कोई एक न्यूनतम सीमा तो तय करनी होगी मनुष्य के मौलिक अधिकारों की। इस सोच ने दुनिया के सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ केमंच पर एक साथ ला दिया। तय हुआ कि किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी,बराबरी और सम्मान का जो बुनियादी अधिकार है वही मानवाधिकार है। और इस तरह 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की समान्य सभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते;  जो मानव की नैसर्गिक
गरिमा हैं। और इसी के साथ ही स्त्री-पुरुष के अधिकार भी समान हैं। लिंग,नस्ल,धर्म या रंग के आधार पर भेदभाव मनुष्यता के साथ एक क्रूर अपराध है। अगर हम अपने अतीत को खंगालें तो हमारी संस्कृति की बुनियाद ही मानव अधिकारों की सुसंस्कृत अवधारणा पर ही टिकी हुई है। वसुधैव कुटुंबकं। सारा संसार हमारा परिवार है। और जिओ और जीने दो यही हमारी संस्कृति का मूल मंत्र हैं। हमारे यहां अतिथि को भगवान एवं गरीब को भी दरिद्र नारायण कहकर सम्मानित भाव से देखने की परंपरा रही है। और-तो-और युद्ध के दौरान भी मानव अधिकारों का अतिक्रमण इस देश में कभी नहीं किया जाता था। महाभारत में सूरज ढलने के बाद युद्ध नहीं होता था और शाम को बिना इस भेदभाव के कि कौन मित्र-पक्ष का सैनिक है और कौन शत्रु पक्ष का सैनिक है,युद्ध शिविर में जाकर घायलों का उपचार किया जाता था। बच्चों,बूढ़ों और स्त्रियों को युद्ध के समय भी पूरी सुरक्षा दी जाती थी। लेकिन विदेशी हमलों के झंझावातों ने मानव अधिकार की इस गौरवशाली परंपरा को हमारे देश में भी नष्ट कर दिया। पृथ्वीराज चौहान द्वारा सात-सात बार पराजित मोहम्मद गोरी को क्षमादान देने की मिसाल हमारे ही इतिहास में मिलती है। मानव अधिकारों के सम्मान का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। सम्राट अशोक ने भी मानव अधिकारों के मूल्यों को रेखांकित करते हुए अनेक आदेश निकाले थे। ये आदेशपत्र मानव अधिकार के कालजयी दस्तावेज कहे जा सकते हैं। इतना ही नहीं हमारे धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में भी  ऐसी अनेक अवधारणाएं हैजिन्हें मानवाधिकार के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। मुहम्मद(saw) साहब द्वारा निर्मित मदीना का संविधान(meesak-e-madeena) भी मानव अधिकार की नायाब धरोहर है। लेकिन विचार और व्यवहार में हमेशा अंतर रहा है। मानव अधिकारों के दार्शनिक पक्ष को समय-समय पर मनुष्य ने ही क्षत-विक्षत किया है। हमारे देश में भी परंपरा के नाम पर स्त्री को पति के साथ सती कर देने और धर्म के नाम पर नरबलि देने की क्रूर प्रथा रही है। विधवाओं के साथ समाज पशुओं की तरह व्यवहार करता था। आज भी गांवों में विधवाओं की कमोवेश वही स्थिति है। बृंदावन के विधवाश्रम इस बात के गवाह हैं। कन्या भ्रूण
हत्या, दहेज उत्पीड़न और सामंती मानसिकता के तहत ऑनरकिलिंग के अभिषाप से
हमारा समाज आज भी मुक्त नहीं हो सका है। दलितों और वंचितों के साथ आज भी
ेद-भावभरी मानसिकता और उत्पीड़न की घटनाएं आए-दिन देखने-सुनने को मिल जाती हैं। धर्म के नाम पर जारी आतंकवाद ने भी मानवअधिकारों में सेंध लगाकर हमें नए सिरे से सोचने को विवश कर दिया है। मानवअधिकारों का हनन हमारे पड़ोसी देशों में तांडव कर रहा है। मलाला का ताज़ा उदाहरण हमारे सामने है। स्त्रियों को आज भी शिक्षा ग्रहण करने के मौलिक अधिकार से वंचित करने के फतवे जारी किये जा रहे हैं। ईशनिंदा के नाम पर तमाम बेगुनाहों को मार दिया जा रहा है। नस्ली हिंसा की चपेट से यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया भी मुक्त नहीं। ऐसे में मानव अधिकारों की सटीक व्याख्या और उनका कार्यान्वयन एक समकीलीन वैश्विक जरूरत बन गई है। और दुनिया के सारे देश एकजुट होकर मानवअधिकारों के कार्यान्वयन के लिए लामबंद होने लगे हैं। मानव अधिकारों की मौजूदा अवधारणा का आदि-दस्तावेज़ जर्मनी के किसान विद्रोह (सन्-1525) के दौरान स्वाबियन संघ के समक्ष उठाई गई किसानों की मांगों को माना जा सकता है जो कि द ट्वेल्व आर्टिकल्स ऑफ़ द ब्लैक फॉरेस्ट के नाम से पेश की गई। इस बीच विश्व-पटल पर दो और महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं- पहली  सन्- 1776 में संयुक्त राज्य में और 1789 में फ्रांस में हुई क्रांतियां। जिसका नतीजी हुआ संयुक्त राज्य की स्वतंत्रता की तथा फ्रांस में मानव तथा नागरिकों के अधिकारों की वैधानिक घोषणा। इन दोनों क्रांतियों ने दुनियाभर के सत्ता केन्द्रों को आदमी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसके बुनियादी अधिकार दिलाने के लिए एक सशक्त कानून बनाने के लिए प्रेरित किया। और यहीं से शुरू हुई मानवाधिकारों की सार्थकता का सूत्रपात। आज तमाम प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी और गैर सरकारी मानवाधिकार संगठन सारी दुनिया में सक्रिय हैं जो इंसान को उसके बुनियादी हक दिलाने को प्रतिबद्ध हैं। इंसान की जिंदगी
में, आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक समरसता और सम्मान जीवकोपार्जन का जो अधिकार है,मुख्यतः यही मानवाधिकार है। हमारे देश का संविधान भारत के हर नागरिक को यह अधिकार मुहैया कराता है, साथ ही मानवाधिकार के हनन को संज्ञेय अपराध भी मानता है। भारत सरकार ने देश के प्रत्येक नागरिक को मानवाधिकारों के प्रति जाग्रत करने के लिए विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में, इसके प्रचार, प्रदर्शन, पठन और व्याख्या के समुचित प्रबंध भी किए हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभी हाल में ही सूचना के अधिकार को सरकार ने मानवाधिकारों में शामिल करके देश के प्रत्येक नागरिक की रचनात्मक भागीदारी में और इजाफा कर दिया है। आतंकवाद की घिनौनी
साजिशों के बावजूद भारत में मानवाधिकारों की जो स्थिति है वह दुनिया के तमाम देशों के मुकाबले बेहद संतोषजनक और प्रेरणाप्रद है। ह्यूमन राइट्सवॉच तथा एमनेस्टी इंटरनेशनल-जैसी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं ने भी इस संदर्भ में भारत की प्रशंसा ही की है। और पड़ोसी देश के बुद्दिजीवी और मीडिया मानवाधिकार के मामले में समय-समय पर भारत का ही उदाहरण अपने देश में देते हैं।

आज दैनिक हिंदुस्तान के नश्तर स्तंभ में प्रकाशित लेख

हास्य-व्यंग्य-
  चरण कमल के आचरण
  0 सुरेश नीरव
पांव छूना हमारी संस्कृति के प्राण हैं। और पांव छूना और छुलवाना हमारी प्राचीन सनातन-शाश्वत सांस्कृतिक गतिविधि है। पद,प्रमोशन, पुरस्कार,प्रतिष्ठा नाना प्रकार की उपलब्धियां हमें पांव छूने से ही प्राप्त होती हैं। सैंकड़ों टाटा और बाय-बाय पर एक अदद पांव छूना हज़ार गुना भारी पड़ता है। आज के जीवन-संग्राम में जो चरण स्पर्श के हथियार से लैस नहीं है उसके पांव क्या उखड़ेंगे जो कभी जम ही नहीं पाते। इसीलिए अपनी चादर से ज्यादा पांव फैलानेवाले  हमेशा पैर पटकते ही रह जाते हैं। कामयाबी के इतिहास में वही बड़ा है जो अपने पैरों पर खड़ा है। और अपने पांव पर खड़े होने की ताकत भी वही पाता है जो खुशी-खुशी अपने आका की लातें खाता है। ऐसे दुर्दांत चरणसिंह-कदमसिंह ही तो डिनर में सौभाग्य से मुर्गे की लातें (चिकन लेग्स) खाते हैं। हमारा स्वर्णिम इतिहास ऐसे अनेक चरणहिलाऊ चंडुओं से अटा पड़ा है। जो आपके पांव बड़े हंसीन हैं,इन्हें जमीन पर मत उतारिए यह पर्ची उसके पास लिखकर,सिर पर पांव रखकर फटाक से रफू चक्कर हो जाते हैं। कुछ खुरापाती मानसिकतावाले आशिक तो अपनी मुहब्बत की निजी सरकार पर–मेरा दिल खो गया है आज कहीं, आपके पैरों के नीचे तो नहीं का सार्वजनिक आरोप मढ़कर खुद अपने मुंह मियां लोकपाल हो जाते हैं। और इसी सार्वजनिक-घोटाली हहाकार से घबड़ाकर सरकार के भी जमीन पर पांव पड़ना बंद हो जाते हैं। कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते मगर अक्ल बहुत तेज होती है। कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं मगर आँखों पर पट्टी बंधी रहती है। इसी गड़बड़ का फायदा उठाकर झूठ कानून की गोद में बैठकर हाईकमान-जैसी हरकतें करने लगता है। अपुन के साथ तो दिक्कत ये है कि अपुन जब भी पांव आगे बढ़ाते हैं तभी लोग लपक कर टांग अड़ाते हैं। शर्मीले लोग खड़े-खड़े अपनी टांगे भींचते हैं। बहादुर लोग टांग खींचते हैं। कुछ चापलूसी के जल से चरण-कमल सींचते हैं। भले ही पांव हाथी पांव ही क्यों न हो। सत्ता के चरण हमेशा कमल होते हैं। नेता के आचरण कितने भी गड़बड़ क्यों न हों उसके चरण कभी कटहल नहीं होते। भारत का हर नेता अपने हाथ मजबूत करने की जनता से फरियाद करता है। अपने समर्थन में कभी टांग नहीं हमेशा हाथ ही उठवाता है। पांव तो उसके इनर्जी का पावर हाउस होते हैं। इसीलिए तो चरणसिंह,कदमसिंह,कालीचरण,रामचरण आपको गली-गली में मिल जाएंगे मगर हाथ मलते रह जाइए आपको हाथ सिंह कभी कहीं नहीं मिलेगा। पांव छूने का महत्व दो पांव वाले ही जानते हैं इसीलिए तो ये चार पांववाले चौपायों पर भारी पड़ते हैं। चरणवंदना, पांवपखारना, पांयलागूं, पालागन, कदमबोसी, पैरीपेना और खंबागढ़ी इसी चरण-छू क्रिया के सर्वनाम हैं। और इस मनुष्य की सारी कामयाबी का इतिहास पांव बढ़ाने,अड़ाने और पांव उठाने का ही सनातन व्यसन है जो उसके डीएनए में काफी गहराई तक अपने पांव जमा चुका है। भगवान करे आप भी जल्दी से किसी चरण-छू सिंडीकेट के सदस्य बन जाएं। आप सरकार की तरह अपने कदम बढ़ाएं। विरोधी न कभी आपकी टांग खींचें न आपके मामले में टांग अड़ाएं।

Monday, December 10, 2012

सतीश आनंद की ग़ज़ल


विगत बारह वर्षों से नियमित लेखन। देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन। आकाशवाणी जबलपुर से अनेक बार कविताएं प्रसारित। अखिल भारतीय मंचों से समय-समय पर कविता पाठ।साप्ताहिक कटनी-कल्याण का दस वर्षों तक संपादन एवं प्रकाशन। इसके अलावा अनेक स्थानीय पत्रिकाओं का संपादन। तथा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय सहयोग। सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के सदस्य बनने पर सतीश आनंदजी का हार्दिक स्वागत।
संपर्कः आनंद केमिस्ट, कटनी-483501(मध्य प्रदेश)
मोबाइलः09827522607,09074359159
ग़ज़ल-
रूदाद है आनंद की उन्वान है ग़ज़ल
धड़कन है मेरे दिल की मेरी जान है ग़ज़ल
आशिक है ज़माना ग़ज़ल के हुस्न का मगर
गंगो-जमन तहज़ीब पे कुर्बान है ग़ज़ल
मोहन के मन को मोह लिया जिसने दोस्तो
राधा की वही मोहिनी मुस्कान है ग़ज़ल
जिसके सुरों की बंदिशों में वक़्त बँध गया
आनंद  उसी बांसुरी की तान है ग़ज़ल
-सतीश आनंद
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ख़ुशबू के वास्ते कोई चंदन न काटिए

श्री चेतन आनंद के मुक्तक को मैं देववागरी में रूपांतरित करके लिखने की धृष्टता कर रहा हूं। वैसे आजकल बड़े आदमी लोग रोमन लिपि में ही हिंदी लिखते हैं। सोनियाजी से लेकर कैटरीना कैफ और चेतनआनंदजी तक। 
khushbu ke vaste koi chandan na katiye,
chehro ke vaste koi darpan na katiye,
ye zindagi akhbaar ke jaisi hai dosto,
isme se aap pyar ki katran na katiye.
chetan anand
ख़ुशबू के वास्ते कोई चंदन न काटिए
चेहरों के वास्ते कोई दर्पण न काटिए
ये ज़िंदगी अख़बार के जैसी ही दोस्तो
इसमें से आप प्यार की कतरन न काटिए।
-चेतन आनंद
 

ग़ज़लें ये कहती हैं मैं उनका व्यापार करूँ.

अशोक रावत की ग़ज़लें

आख़िर मौसम की मनमानी क्यों स्वीकार करूँ.
क्यों मैं फूलों से नफ़रत काँटों से प्यार करूँ.
क्या जैसी दुनिया है वैसा ही हो जाऊँ मैं,
और इन आँधी तूफ़ानों की जै-जैकार करूँ.

काग़ज़ की नावों को लेकर माँझी बैठे हैं,

इनके बूते मैं दरिया को कैसे पार करूँ.

इस मुद्दे पर मैं अपनी ग़ज़लों के साथ नहीं,

ग़ज़लें ये कहती हैं मैं उनका व्यापार करूँ.

मेरे अधिकारों को लेकर सब के सब चुप हैं,

अपनों से ही झगड़ा आखिर कितनी बार करूँ.

अपने हाथों के पत्त्थर तो मैंने फ़ेंक दिये,

लोगों को चुप रहने पर कैसे तैयार करूँ.

गाँधी के हत्यारे भी हैं गाँधी टोपी में,

इनके प्रस्तावों को मैं कैसे स्वीकर करूँ।
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