
यह मंच आपका है आप ही इसकी गरिमा को बनाएंगे। किसी भी विवाद के जिम्मेदार भी आप होंगे, हम नहीं। बहरहाल विवाद की नौबत आने ही न दैं। अपने विचारों को ईमानदारी से आप अपने अपनों तक पहुंचाए और मस्त हो जाएं हमारी यही मंगल कामनाएं...
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Monday, January 31, 2011
आस

धनुर्वाण या वेणु लो श्याम रूप के संग
मुझ पर चढने से रहा राम दूसरा रंग
गीत कविता कुछ भी लिख लूं,मन तो बिस्मिल चर्चा मे ही रमता है।तो आज से बिस्मिल चरित की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करने का शुभारंभ करता हूं
पित्र भूमि<
वह वीर प्रसविनी धरती है,कण कण मे शौर्य समाया है
चंबल के खडे उठानों ने , वीरों को सदा लुभाया है
विद्रोह वहां के कण कण मे , अन्याय नही वे सहते हैं
लडते हैं अत्याचारो से , खुद को वे बागी कहते हैं
ग्वालियर राज्य की वह धरती अन्याय नही सह पाती है
अपने बीहडों- कछारों मे, बेटों को सहज छिपाती है
है इसी भूमि पर तंवरघार, जो बिस्मिल की है,पित्रभूमि
मिट्टी का कण कण पावन है,ये दिव्य भूमि ये पुण्यभूमि
इसके निवासियों के किस्से अलबेले हैं ,मस्ताने हैं
द्रढनिश्चय के ,निश्छल मन के , जग मे मशहुर फसानें हैं।
है सत्ता की परवाह नही, शासन का रौब न सहते हैं
ये हैं मनमौजी लोग सदा , अपनी ही रौ मे बहते है
निज गाथा मे बिस्मिल जी ने किस्से बतलाये हैं अनेक
इनकी मस्ती बतलाने को ,कहता हूं मैं भी आज एक
तंवरघार के लोगों ने सोचा-----कुछ अद्भुत किया जाय
एकरस जीवन को किसी तरह,फिर से मधुरस किया जाय
बन गयी योजना तुरत फुरत ,थे ऊंट उठाये राजा के
थी खुली चुनौती सत्ता को ,सब होश उडाए राजा के
राजा ने आदेश दिया------- तोपों से गांव उडा दीजै,
शासन का दर्प बचाने को जो भी हो उचित सभी कीजै
शासन ने आंख दिखायी तो, बीहड मे सारे चले गये
भयभीत नहीं हैं रंच मात्र कहकर वे प्यारे चले गये
दरबार लगा फिर राजा का , निर्णय पर पुनः विचार हुआ
तंवरघार के वीरों के, साहस का जय जयकार हुआ
ऊंट उठाये किस कारण? आखिर हमको बतलाओ तो?
क्यों चौर्यकर्म को विवश हुए?इसका कुछ पता लगाओ तो?
बीहड मे दूत गये भेजे, वीरों ने कारण बतलाया
राजा ने माफ किया ऊनको ,विश्वास प्रजा का फिर पाया
उत्तर था--चोर न डाकू हम ,बस जीवन का रस लेते हैं
शासन- सत्ता इतराती है, तो खुली चुनौती देते हैं
ऐसी विद्रोही धरती पर नारायण लाल का जन्म हुआ
भाभी के दुर्व्यवहारों से जब भावुक हिय उनका भग्न हुआ
पत्नी- पुत्रों के साथ -साथ, तज निकले अपनी मात्रभुमि
संयुक्त प्रांत शाहजहांपुर, बन गयी थी उनकी कर्मभूमि
(बिस्मिल चरित से)
ग्वालियर राज्य के एक अन्य सपूत पं० सुरेश नीरव को समर्पित

दर्पण – यथार्थ का
मेरी आँखों के सामने था दर्पण
गुमान कर रही थी मैं अपने रूप पर
अपने मृगनयनी होने पर
अपने कुसुम कपोलों पर
कमल की अधखुली पंखुरी जैसे होठों पर
सूर्य की तरह दीप्त्तिमान अपने उजले गोरे रंग पर
और कलाईयो के सुंदर होने पर भी हुआ मुझे गुमान !
इसी गुमान में
एक हल्की सी मुस्कराहट खेल जाती थी मेरे चेहरे पर
जो कभी लाज की लाली मुझमें भर देती थी
तो कभी मेरी आँखों में चमक
मैं खोई रही हसीन विचारों में
और पढ़ने लगी अखबारों में
इन खबरों को:-
“ मंत्रियो के घोटालों की
कश्मीर के उग्रवादियों की
पाकिस्तान और चीन की चालो की
बढती महंगाई और घटते स्तर की
बसों की टक्कर और दुर्घटनाओं की
चोरी, डकैती, मारामारी की
बलात्कारों और दहेज के कारण जलाई जाने वाली
बहुओं की बढती संख्या की
फैशन शो में बढ़ती अशलीलता की “
इन खबरों को पढ़ कर
उतरने लगा मेरे सौंदर्य का नशा !
दुःख हुआ मुझे
अपने मृगनायेनो पर
कुसुम कपोलों पर
कमल की अधखुली पंखुरी जैसे होंठो पर
गोरे रंग और कलाईयो की सुंदरता पर
दुःख हुआ मुझे
कि ये नयन पढ़ते हैं रोज इन्हीं खबरों को
मगर रोक नहीं पाते इन्हें अपनी आँखों के सामने होते हुए
ये होंठ सिल जाते हैं जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने को
और बुराई को चुपचाप गले के नीचे उतार जाने को
दुःख हुआ मुझे
गोरी चमड़ी का
क्योंकि इस गोरी चमड़ी के भीतर
छुपी हैं काली आत्माएं
जो गंगा की पवित्रता को
विष में परिवर्तित करने को रहती हैं आतुर
और ये हाथ नहीं कर पाते कुछ
अन्याय और अत्याचार के सम्मुख
दुःख हुआ मुझे
और लाज से लाल हुए मेरे गालों पर
छा गया पीलापन
आँखों में आंसु
होंठो में फड़फड़ाहट
और
दिल में हाथों के कटे होने का एहसास
गुमान से भरा मेरा चेहरा
हो गया आभाहीन और निस्तेज
मेरी आँखों के आगे
फिर था दर्पण
यथार्थ का दर्पण
जो दिखा रहा था झलक समाज की
उस समाज की
जिसकी मैं थी एक इकाई
और उसे देखकर
हुआ मुझे कुरूपता का एहसास !!
मंजु ऋषि

मन का मन से नमन
अभिनव कला परिषद, भोपाल’ द्वारा ‘अभिनव शब्द शिल्पी’ सम्मान प्राप्त करने के लिए डॉ मधु चतुर्वेदी जी को मेरी हार्दिक बधाई
भगवान सिंह हंस जी को ढेरों शुभ कामनाएँ
आदरणीय श्री जगदीश परमारजी और पंडित सुरेश नीरवजी को बधाई और मेरा ह्रदय से नमन
अभिषेक मानव जी, भगवान सिंह हंस जी और डॉ मधु चतुर्वेदी जी को मेरा हौसला बढ़ाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
प्रशांत योगी जी की गैर-हाजिरी दर्ज की जाती है
जय लोग मंगल परिवार के सभी सदस्यों को मेरा स्नेह
मंजु ऋषि
Sunday, January 30, 2011
लोकतंत्र में राम

पंचायत चुनावों की घोषणा हुई. दशरथ परिवार अपनी प्रतिष्ठा को लेकर ख़ासा चौकन्ना था. समूचे अयोध्या में राजनीति का पानी उफान पर था. नगरवासी चुनाव की तारीख करीब आने की प्रतीक्षा में अपना धैर्य खो रहे थे. राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न जिस तरफ भी अपनी होंडा सिटी दौड़ाते, लोग उत्तेजक नारे लगाते और अपने समर्थन का इजहार करते. लोग जानते थे कि चुनाव के समय में 15 दिन का समय बड़े ऐशो आराम से बीतने वाला है. पिछले चुनाव की तरह सब कुछ होगा –मुर्गा, दारु, नाच.
उधर आधी दुनिया कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी को ललचाई नज़रों से देखने में अत्यंत व्यस्त थी. चूँकि पिछले चुनाव में एक एक सोने की अंगूठी, साड़ी और चांदी की पायल सबको भेंट स्वरुप प्राप्त हुई थी. तीनों रानियाँ अपनी अपनी तरफ से आधी दुनिया को आश्वासन दान देने में मशगूल थीं. सभी बच्चे, बूढ़े और जवान यह तय कर रहे थे कि चुनाव में वोट के बदले प्राप्त होने वाली राशि का किस तरह सदुपयोग करेंगे.
यह सब चल ही रहा था कि महान कूटनीतिज्ञ मंथरा तीर्थ कर वापस लौट आयी थी. उन्होंने कैकेयी को अपने खोमचे में लिया और कहा – तू पागल है ? हर बार कौशल्या का ये अपराधी लड़का — ‘राम’ – नगर प्रमुख बन जाता है. आखिरकार अब तो लोकतंत्र है. सबको मौका मिलना चाहिए. हमारे भरत में क्या कमी है ? राम पी.एच.डी. है तो भरत भी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से एम.बी.बी.एस. है. कैकेयी की बांछे खिल गईं. उन्होनें तुरंत दशरथ से संपर्क कर अपनी बात बताई. दशरथ को दिल का दौरा पड़ने लगा. वह रानी की मूर्खता समझ गए थे. उन्होंने कैकेयी को समझाने की नाकाम कोशिश भी की. उन्होंने कैकेयी से कहा कि सदैव ज्येष्ठ पुत्र ही समाज का मुखिया होता है क्योंकि समाज सदैव ज्येष्ठ पुत्र को ही मुखिया मानता है. सशक्त कैकेयी ने आधुनिक नारी का मतलब समझाते हुए कहा कि महाराज अब दुनिया बदल गयी है, अब ऐसा नहीं होता है. जो पैसा खर्च करता है वही चुनाव जीत जाता है. इतने दिनों से चुनाव होते देख रही हूँ. आप जिसको चाहें राज्यकोष का धन खर्च कर, नगर प्रमुख बना सकते हैं. आज राम, रावण, भरत, और कालनेमी के चरित्र की बात नहीं होती. महाराज आज हर आदमी अपने वोट के बदले कुछ धन प्राप्त करना चाहता है.
दशरथ महल से बाहर निकल गए और अपने भाग्य को कोसने लगे. उधर सीताराम धोबी दूसरे मोर्चे पर डटा हुआ था. लोग उसकी भी जयकार कर रहे थे क्योंकि उसका बड़ा भाई आई.ए.एस. था और सीताराम धोबी ठेकापट्टी में अपना करियर बनाना चाहता था. चुनाव कांटे का था. वह सरेआम राम विरोधी था. कहता था — कैसा आदर्श ? कहाँ का आदर्श ? और कब आदर्श का पालन किया राम ने ? इनसे ज्यादा आदर्शवादी तो मैं रावण को मानता हूँ. लक्ष्मण को शक्ति-बाण लगने पर उसकी लंका से ही वैद्य सुषेन आए. रावण ने विजय और धर्म में धर्म को चुना. उसकी सत्ता में जितना अधर्म था उतना ही आज भी है. रावण की बहन का तो नाक कान काट लिया गया. क्या यह आधुनिक भारत में आधी दुनिया के साथ बदतमीजी नहीं है ? राम मनुष्य होते तो छुपकर बाली की हत्या नहीं करते, आमने-सामने युद्ध करते. ये कौन सा आदर्श है – ”जेहिं विधि होय नाथ हित मोरा” ! वह यह भी कहता कि सीता ने ही कौन सा इतना बड़ा आदर्श निभा दिया कि उसे सती बोला जा रहा है ! लक्ष्मण के रेखा खींचने के बाद भी वह भाग गयीं रावण के साथ, क्योंकि उसे जंगल नहीं रावण का राज महल चाहिए था. सुख चाहिए था, जंगल में सुख कहाँ था ! यह सब सुनकर राम को दुःख तो बहुत होता था परन्तु सीताराम धोबी की हत्या का मतलब वह बखूबी समझते थे. इसलिए वो गुपचुप तरीके से उसकी सुरक्षा भी करते थे. क्योंकि दुनिया जानती थी कि सीताराम धोबी राम विरोधी है और वह अपने कामरेड मित्रों की वजह से और भी ज्यादा मुखर हो गया है. उसका यह भी कहना था कि वह सामान्य सीट पर भी चुनाव लड़ेगा और यदि सीट पिछड़ी होती है तब भी लड़ेगा.
इधर माता कैकेयी की बात सुनकर किंकर्तव्य विमूढ़ हो गए राम. एक तरफ परिवार, दूसरी तरफ प्रतिष्ठा, तीसरी तरफ समाज और चौथी तरफ केंद्र व प्रदेश की सरकारें. राम को जब कोई मार्ग नहीं दिखा तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ से संपर्क किया. गुरुदेव वहाँ के विश्वविद्यालय के कुलपति थे. राम ने गुरुदेव के निजी सचिव को फोन लगाया. दूसरे दिन शाम का एप्वाईंटमेंट फिक्स हो गया. राम अपने ड्राईवर के साथ गुरुदेव के समक्ष प्रस्तुत हुए और पैर छूकर प्रणाम किया. गुरुदेव पहले से सारा माजरा समझ गए थे. दशरथ ने फोन करके उन्हें सब कुछ बता दिया था. राम भाव विहोर होकर गुरुदेव से अपनी अंतरात्मा की बात बताने लगे. गुरुदेव ने कहा — चिंतन करो राम ! चिंता मत करो. चिंता आयु घटाती है, जबकि चिंतन से बुद्धि बढती है. गुरु ने राम को समझाया कि वो इस बार के चुनाव परिणाम भी जानते हैं. इसलिए उपाय यही है कि राजपरिवार का कोई भी व्यक्ति चुनाव न लड़े. सो तुम अपने किसी विश्वासपात्र को चुनाव लड़ाओ राम !
गुरु को प्रणाम कर राम राज महल में लौट आये. सीता ने पूछा अब क्यों चिंतित हैं ! गुरुदेव ने कुछ उपाय नहीं बताया क्या ? राम ने तौलिए से पसीना पोछते हुए कहा कि बताया तो परन्तु उपाय सरल नहीं है सीते ! विश्वासपात्र हो और आदमी हो ऐसा तो कभी संभव न था न ही आज है. यदि विश्वासपात्र मनुष्य होते तो लंका पर चढाई करते वक्त मुझे बंदरों और भालुओं की मदद क्यों लेनी पड़ती ! आज भी मेरे पास सिर्फ हनुमान ही हैं जो मेरे विश्वासपात्र हैं. सीता ने कहा, तो फिर क्यों न हनुमान को ही प्रत्याशी बनाकर लड़ा दिया जाय चुनाव ! राम को सीता की बात जाँच गयी, लेकिन उन्हें संदेह था कि पता नहीं महल के अन्य लोग हनुमान का समर्थन करेंगे या नहीं. प्रातः दस बजे इसी मसले पर बैठक बुलाई गयी. हनुमान का जिक्र आते ही लोगों के चेहरे गुस्से से तमतमा गए. उधर हनुमान का नाम आने से वानर समाज में ख़ासा आक्रोश था. वानर सुग्रीव को टिकट देने की मांग करने लगे. लक्ष्मण ने राम को समझाया — अरे भैया ! पागल हो गए हैं क्या ? हनुमान लाख अच्छे हों मगर इंसान नहीं बन्दर हैं. यह लोकतंत्र है, बन्दरतंत्र नहीं कि आप इंसानों को छोड़कर बंदरों को समाज का मुखिया बना दें. यह सुनकर हनुमान को दिल का दौड़ा पड़ गया. उन्हें नजदीक के एक पशुचिकत्सालय में भर्ती कराया गया.
राम स्वयं को पराजित देख गुरुदेव के पास चले गए. उन्होंने सारी घटना गुरुदेव को बताई. गुरुदेव मुस्कुराने लगे. फिर उन्होंने कहा – शांत हो जाओ राम. मुझे ही कुछ उपाय ढूँढना होगा. गुरुदेव ने अपनी तरकीब लगाई. उन्होंने मुख्यमंत्री को फोन लगाया और कहा — महोदय, समूचे आर्यावर्त की प्रतिष्ठा का विषय बन गया है अयोध्या चुनाव. इसके महत्व को समझते हुए वहाँ की सीट को पिछड़ी घोषित कर दीजिए. मैडम ने कहा ओ.के. मैं अपने निजी सचिव को बोल देती हूँ. गुरुदेव ने मैडम को धन्यवाद कह फोन का रिसीवर रख दिया तो राम उछल पड़े. गुरुदेव से राम ने पूछा. गुरुदेव पिछड़ी में कौन हमारा है, तो गुरुदेव ने कहा तुम्हारा भक्त केवट, राम !
केवट का नाम सुन राम को थोड़ी चिंता हुई. उन्होंने गुरुदेव से कहा, लेकिन केवट तो सीताराम धोबी के साथ हो गया है. गुरुदेव ने कहा धोबी की ऐसी की तैसी. केवट भी सत्ता सुख चाहता है. उसे तुम यह अवसर देकर सदा के लिए अमर हो जाओगे और सीताराम धोबी की राजनीतिक हत्या भी हो जायेगी. लेकिन बीच में केवट ने विद्रोह कर दिया तब क्या होगा गुरुदेव ? गुरुदेव ने कहा उसकी चिंता मत करो राम. उसकी ठेके की एक मोटी फाइल है मेरे पास. राम गुरु के पैरों में गिर गए. केवट की जीत हुई. राम की जय जयकार हुई. राम ने केवट से एक करोड़ रुपयों के कागजात पर अंगूठे लगवा लिए जो चुनाव में खर्च हुए. केवट जय श्री राम कहता है. जनता उसका गुणगान करती है. हम तो केवट जी का पी.ए. बनना चाहते हैं. आप भी केवट जी से ही उम्मीद करिये कि वह हम सबका विकास अवश्य करेंगे.
- अभिषेक मानव 9818965667
अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान


डा० मधु चतुर्वेदी विश्व सुविख्यात कवयित्री जिन्होंने वेदों पर पीएचडी की को अभिनव कला परिषद् भोपाल द्वारा २५ जनबरी -२०११ को अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान से नवाजा गया। और २६ जनबरी २०११ को उनकी अध्यक्षता में आयोजित एक विराट कवि सम्मलेन में सोम ठाकुर, अनुराग और जगदीश श्रीवास्तव आदि वरिष्ठ रचनाकारों ने काव्य पाठ किया। आपको इस अलंकरण एवं अध्यक्षता करने के लिए बहुत-बहुत बधाई। आपको मैं प्रणाम करता हूँ। आपके सम्मान से गौरवान्वित होता जय लोकमंगल। आपकी गजल की ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं -
ताज़ा तरीन ग़ज़ल

कल ही भोपाल से वापसी हुई २५ जनवरी सायं ‘अभिनव कला परिषद, भोपाल’ द्वारा ‘अभिनव शब्द शिल्पी’ सम्मान प्राप्त किया साथ में अन्य जिन साहित्यकारों को ये सम्मान प्रदान किया गया उनमें श्री सोम ठाकुर का नाम उल्लेखनीय है अगले दिन (२६ जनवरी) को कला निकेतन संस्था द्वारा एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें मेरी अध्यक्षता में श्री सोम ठाकुर, श्री अनुराग जी व जगदीश श्रीवास्तव सहित अन्य अनेक प्रतिठिष्ट रचनाकारों ने रचना पाठ किया
आज ४-५ दिन के बाद ब्लॉग देखा पप्पा परमार के सुदर्शन एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व को समेटे उनका छाया चित्र मन को भा गया, उन्हें आत्मिक सत्कार के साथ बधाई मानव जी, सदैव की भांति अपने चुटीले व्यंग के साथ उपस्थित हैं ‘कबीर’ पात्र के द्वारा आज की सामाजिक विकृतियों को दर्शाने का प्रयास अच्छा है हंस जी के भाव एवं भाषा दिन-व-दिन श्रेष्ठ से श्रेष्ठकर होते जा रहें हैं- बधाई नीरव जी को पल-पल प्राप्त हो रहें सम्मानों हेतु बधाई प्रिय मंजू श्री कविता अत्यंत मासूम और अल्हड भावों को उकेरते हुए बालपन कराती हैं सधन्यवाद अपनी ताज़ातरीन ग़ज़ल प्रस्तुत कर रही हूँ
नाशाद, ए अवाम, ज़रा आंख तो उठा!
बदलेगा ये निज़ाम, ज़रा आंख तो उठा!!
कीमत तेरी निगाह खुद की आंक ले अगर,
पूरा मिलेगा दाम, ज़रा आंख तो उठा!!
तू अज़मातों पे एतवार करके देख,
बिगड़े बनेंगे काम, ज़रा आंख तो उठा!!
रात काली दिन अगर धुंधला गया तो क्या,
होगी सुहानी शाम, ज़रा आंख तो उठा!!
उनका जो हक़ में खेमे गाड़ रहें हैं,
बिखेरेगा ताम-झाम, ज़रा आंख तो उठा!!
जो तू बुलन्द हौसले के साथ हो खड़ा,
हैं साथ तेरे राम, ज़रा आंख तो उठा!!
है खासियत तेरी यही, तू जान ले ‘मधू’,
तू आदमी है आम, ज़रा आंख तो उठा!!
डॉ मधु चतुर्वेदी
मेरी भी शुभ कामनाएँ
मधुलिका सिंह
Saturday, January 29, 2011
जबरदस्ती मेरे ही मात्र नगर में मुझे अतिथि बना दिया हैं
प्रस्तुती -जीतेन्द्र चाहर
मेरी शुभ कामनाएँ
श्री भगवन सिंह हंसजी आप पर पीएच दी हो रही हैं यह जानकर बहुत ख़ुशी हो रही हैं आपको बधाई. हंस तो स्वयं आत्मा हैं जिसमे सारा अस्तित्व समाहित होता हैं और फिर आप तो खुद ही भगवान हैं आपकी लीलाएं महान हैं पञ्च तत्वों का नियंत्रक भगवान. मेरी शुभ कामनाएँ
जगदीश परमार
भरत चरित्र महाकाव्य पर शोध

अजीव संयोग-बधाई


ऐतिहासिक नगर ग्वालियर में नीरवजी और परमारजी।अद्भुत संयोग। दोनों ही व्यक्तित्व और रचना के महानायक। देशप्रेम से ओत-प्रोत। क्रांति की ज्वाला के अध्येता लगता है -गहन विचार-विमर्श के प्रति गंभीर मुद्रा में। हल्की-सी मुस्कराहट लिए अपनेपन के दीवाने दीवानगी को ज्योतिर्य कर रहे हैं। आदरणीय श्री जगदीश परमारजी और पंडित सुरेश नीरवजी को बधाई देता हूँ और ऐसे दिव्य विभूतियों को मै समर्पित भाव से नमन करता हूँ। आपका अपना ही टोहता हंस। जय लोकमंगल।
बाबाजी को शत शत नमन

आदरणीय बाबाजी को चरणस्पर्श। श्री जगदीश परमारजी राजघराने के राजा हैं और स्वंत्रतता सेनानी एवं प्रसिद्ध गीतकार हैं। आज राजसी पोशाक में श्री परमारजी बड़े सुंदर लग रहे हैं। मैं आपको बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। Friday, January 28, 2011

बैतूल- बिगत दिनों गज रथ महोत्सव के अवसर पर एक अखिल भारतीय कवि संमेम्लन आयोजित किया गया
जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध हिंदी कबि पंडित सुरेश नीरव ने क़ि, मुख्या अतिथि सुप्रसिद्ध गीतकार श्री जगदीश परमार ने
क़ि, काव्य पाठ कारने वाले कवियों में थे, प्रकाश प्रलय, संगीता वर्मा, मनोज हिन्दुस्तानी, गोपाल नेपाली, कैलाश मंडेला, माधुलिक सिंह आदि रचनाकारों ने कविता पाठ किया
प्रस्तुति, पुश्यबर्घन
मानव अभय हो



श्री नीरव की काव्य यात्रा


Thursday, January 27, 2011
बड़े भाई प्रणाम
बहुत बहुत धन्यवाद .
बड़े भाई भगवान् सिंह हंस ने जो प्रेम किया है उसके लिए उनका चरणस्पर्श करता हूँ।और उम्मीद करता हूँ की भविष्य में उनका आशीर्वाद सदैव मिलता रहेगा। बी.ल.गौड़
साहब ने अपने कीमती वक़्त में से समय निकालकर आशीर्वाद दिया है तो आत्मा यही कहती है की गौड़ साहब उन उद्योगपतिओं में से एक हैं जो सचमुच मानव हैं उनका आशीर्वाद प्रेम और मार्गदर्शन मिलता रहा तो एक दिन मेरा मानव बनने और जो मानव नहीं हैं उनको मानव बनाने का सपना ज़रूर पूरा होगा। गौड़ साहब के व्यक्तित्व का सबसे सुंदर पक्ष मेरी दृष्टि में यही है की वो उम्र के इस पडाव में भी अपनी संवेदना बचाए हुए हैं और व्यापार व साहित्य में सृजन का कार्य कर रहे हैं । इश्वर आपको हर वो चीज़ प्रदान करें जो कभी आपने ने बचपन में चाहा होगा।
आपका भाई आपका बेटा आपका दोस्त आपका शुभचिंतक
अभिषेक मानव
भटके हुए पत्तरकारों का मार्गदर्शन
उपरोक्त लेख बहुत ही सार्गाभित और सत्य से परिपूर्ण है , हार्दिक बधाई
बी एल गौड़
Wednesday, January 26, 2011
आईये इन भटके हुए पत्रकारों का मार्गदर्शन करें .

सूचनाओं का क्रय विक्रय तो इसका मुख्य आकर्षण है, इसके अलावा भी तमाम कार्य मीडिया द्वारा किये जा रहे हैं. जिसने भी येन-केन-प्रकारेण प्रचुर मात्रा में धन प्राप्त कर लिया है वह इस धंधे में अपनी किस्मत आजमाने में लगा है. व्यापारी और उद्योगपति पहले पैसा लगाते हैं, फिर सरकारों और अधिकारियों को ब्लैकमेल कर खूब सारा पैसा कमाते हैं तथा समाज में जो उनका विरोधी हो उसे भी असामाजिक बना देते हैं.
मीडिया हाउस चलाने वाले लोग आये दिन पुरस्कार प्राप्त करते दिख जाते हैं, पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं देने के लिए. कोई भी यह नहीं सोचता कि देश की आजादी के आंदोलन में कलम और कलमकारों ने कैसी भूमिका निभाई थी ! हर कोई भविष्य के सुन्दर सपनों में व्यस्त है, अतीत के उन क्षणों को सभी भूलते जा रहे हैं जिन्हें कभी भी नहीं भूला जाना चाहिए. पहले पत्रकार को सभी सम्मान की दृष्टि से देखते थे. आज वास्तविक पत्रकार समाज से हाशिए पर चले गए हैं. जिनकी आत्मा मिट चुकी है, जिनके कलम की नीब टूट गयी है, जो किसी सत्य के यात्री का शोषण कर सकने में सक्षम हैं वही काफिलासालार बन गए हैं.
दुःख तो तब होता है जब पढ़ी लिखी माताएं-बहनें एम.बी.ए. की पढ़ाई करने के पश्चात नौकरी की तलाश में निकलती हैं. तब मीडिया उनसे विज्ञापन का कार्य कराती है. यदि अखबारों, चैनलों और पत्रिकाओं में विज्ञापन आवश्यक है तो उसकी मार्केटिंग भी किसी महिला द्वारा किया जाना अनिवार्य है. यदि आप इस बाज़ार में ब्रांड हैं तो फिर महिलाओं से विज्ञापन मांगने का कार्य क्यों कराते हैं ? साथ में होता है एक बहुत बड़ा टारगेट जिसके पूरा न होने पर या तो उनका वेतन रोक दिया जाता है अथवा उन महिलाओं के शीर्ष अधिकारी उनका शोषण करते हैं. विज्ञापनदाता यदि प्राइवेट क्षेत्र के हैं तब तो फिर भी गनीमत है. लेकिन सरकारी महकमों में तो इतना बुरा हाल है कि उसको लिखने से पूर्व आत्महत्या करने की इच्छा होती है, क्योंकि इस देश में देशद्रोहियों की ताकत इतनी ज्यादा है जिसकी कोई सीमा नहीं है.
भूख, भय, भ्रष्टाचार देश की मुख्यधारा पर अपना कब्ज़ा जमा चुके हैं. आज प्रत्येक ईमानदार आदमी भयभीत है. चारों स्तंभ एक होकर देश की जनता का शोषण कर रहे हैं. आवाज उठाने वालों के मुंह में भी स्वार्थ, लालच, द्वेष और भय की जाबी लगी हुई है. मनुष्य अल्पसंख्यक हो गए हैं और जिनके पास कोई मनुष्यता नहीं है वह भगत सिंह, गांधी और दीनदयाल उपाध्याय जैसी बातें बोल रहे हैं. सत्य के यात्रियों को रोटी, कपड़ा, सेक्स, सम्मान से वंचित कर उनकी आत्मा को क़त्ल करने का बेजोड़ प्रयास किया जा रहा है जिसमें उन्हें एक बड़ी सफलता भी मिल रही है. नैतिकता, त्याग, समर्पण, इमानदारी और प्रेम भ्रष्टाचारियों के घर झाडू लगा रहे हैं. स्थिति इतनी भयावह है कि समझ में नहीं आता हमारे नौनिहालों का भविष्य क्या होगा ? उनको वैचारिक तौर पर नौकर बनाया जा रहा है.
आम आदमी का बेटा यदि नौकर बन जाए तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और बड़े आदमी का बेटा बलात्कार या मर्डर कर दे तो वर्षों न्यायालयों को फैसला सुनाने में लग जाता है. आज की राजनीति, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका या मीडिया का विकल्प तलाशना भी कोई नहीं चाहता और जो चाहते हैं उन्हें इन लोगों से छुप छुप कर सांस लेना पड़ रहा है. हम जानना चाहते हैं कि क्या भारत माता सिर्फ उनकी हैं जो जिसकी पूँजी उसकी भैंस के सिद्धांत पर अमल करते हए देश की मौलिकता का नाश कर रहे हैं; जो इनकी हाँ में हाँ मिलाएगा वह सत्ता का समर्थन पायेगा और जो भारत माता के साथ रहेगा उससे भोजन भी छीन लिया जाएगा. यह कृत्य क्या मर्दानगी है ? क्या ऐसे कृत्यों के जरिये ये छद्म मनुष्य स्वयं को मनुष्य होने का दंभ भरेंगे ?
क्या यही है मीडिया का वास्तविक अर्थ जो आज चलन में है. आज भी यदि चौथे स्तंभ में कार्यरत सिपाही एकजुट होकर आपसी कटुता को भुलाकर, हम बड़ा, हम बड़ा की नीचता से ऊपर उठकर इस समस्या का हल नहीं ढूंढते तो देश हममें से किसी को भी माफ नहीं करेगा. हमारा भी वही भविष्य होगा जो आज जयचंद, मीर जाफर और केन्द्रीय मंत्री सुखराम का है.
आज मीडिया दो टके के लुक्कड़ उद्योगपतियों की जागीर बन गई है. देश की सभी विचारधाराएं इनकी मुख्यधारा का रूप ले चुकी हैं. अन्न, फल और सब्जियां सूखा दी जा रही हैं, लेकिन इंसानों की परिधि से बाहर ! वास्तविकता इतनी घनघोर है कि क्षेत्रीय पत्रकारों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि राजधानी में सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को पद्मश्री से नवाजा जा रहा है जो लाबिस्टो की गोद में बैठकर भारत माता का क्रय विक्रय कर रहे हैं, और उन पत्रकारों का दमन हो रहा है जो सच को बुलंद कर रहे हैं, अनैतिकता और अत्याचार से जूझ रहे हैं. जब सत्ता अपनी ताकत के अहंकार में मशगूल होकर इस प्रकार सत्य का दमन करना आरम्भ कर देती है तो सुना हूँ ईश्वर का अवतार होता है परन्तु अब तो समझ में नहीं आता कि ईश्वर ही ईश्वर है अथवा ये पैसे वाले !
आज कोई भी ऐसा समाचार पत्र नहीं है जो अपना कार्य ठीक ढंग से कर पा रहा हो. आज कल न्यूज चैनल टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए प्रसिद्द गणिकाओं के कार्यक्रमों और नाच गानों का आयोजन कर रहे हैं, जबकि अखबारों में नंग धरंग तस्वीरों को प्रमुखता दी जा रही है. प्रत्येक समाचार पत्र सत्य से कोसों दूर हैं. इन अखबारों के जरिये जनता में जागृति नहीं विकृति भरी जा रही है. ये अखबार जनता को दिग्भ्रमित करने का कार्य बड़ी इमानदारी और निर्भयता के साथ कर रहे हैं. आइये भारत माता के आंसू पोंछें. इन भटके हुए मीडिया कर्मियों का मार्गदर्शन करें.
- अभिषेक मानव - अभिषेक मानव 9818965667
परिवर्तन करने चला कबीरा

जब गांव को राजनीति ने दूषित कर दिया और ग्राम समाज के केन्द्र में प्रेम की जगह द्वेष प्रतिष्ठापित हो गया तो कबीर का जीना कठिन हो गया. कबीर लोगों को समझाने लगे कि द्वेष मत करो, प्रेम करो. इस बात से गांव के सत्ताधारी कबीर से नाराज हो गए. कबीर दोहा लिखते और बच्चों को सुनाते. बच्चे कबीर से प्रेम करते. राजनीतिक लोग जब कबीर को गाली देते तो बच्चे जय-जयकार करने लगते. यह देखकर गांव के बड़े आदमियों में जलन पैदा होने लगी. वो लोग कबीर को बदनाम करने लगे. कोई भी आरोप उन्होंने छोड़ा नहीं. तब घर वालों ने कबीर को विवश कर दिया, घर छोड़ने के लिए. कबीर तो बेरोजगार थे. घर पर खेतीबाड़ी में हाथ बटाते थे तो भोजन मिल जाता था. अब वह भी बंद हो गया तो पड़ोसियों से मांग कर भोजन कर लेते. एक महीने तक तो ठीक था. लेकिन फिर, लोगों की उपेक्षा कबीर को सताने लगी.
कबीर समझते थे कि लोग प्रेम में उन्हें भोजन करा देते हैं. बाद में समझ आया कि लोग तो उनके परिवार को पीड़ित करने के लिए उन्हें भोजन देते हैं. कोई चाचा-चाची, भैया-भाभी, दादा-दादी का प्रेम नहीं है. कबीर अकेले रहने लगे और ईश्वर को याद करके रोने लगे. एक दिन सपने में ईश्वर ने उनका मार्ग दर्शन किया. ईश्वर ने कहा रोयो मत कबीर. गांव छोड़ दो. तुम्हें मैंने किसी और कार्य के लिए भेजा है. तुम राजधानी में जाओ और वहाँ सत्य बोलो. धर्म का प्रचार प्रसार करो. साहित्य सृजन करो. भटकी हुई मानव जाति को एक सूत्र में पिरोकर समाज निर्माण करो. तब तक कबीर की नींद खुल गयी. देखा तो रात का सन्नाटा है, कुत्तों के रोने की आवाज आ रही है. सूर्योदय से पूर्व ही अपनी सो रही मां के पैर छूकर कबीर ने गांव छोड़ दिया.
कबीर राजधानी आ गए. दस पांच दिन इधर उधर घूमने के बाद कबीर ब्लूलाइन की बस में कंडक्टर के पद पर आसीन हो गए. यात्रियों को टिकट देने के पश्चात जो समय मिलता उस बीच कबीर अपने दोहों का सृजन करते और पुराने दोहों को गुनगुनाते रहते. थोड़े ही समय में कबीर ने इक्यावन दोहों की रचना कर डाली. ईश्वर का चमत्कार देखिये. एक दिन बस में बड़ी भीड़ थी, तभी तकरीबन अधेर उम्र की एक देवी का आगमन हुआ. वह कबीर की सीट के पास खड़ी हुई. कबीर ने उन्हें टिकट दिया और अपने दोहों में मग्न हो गए. वह देवी उन्हें ध्यान से सुनने लगी. कबीर का ध्यान जब टूटा तो उन्हें उनके संस्कारों ने विवश कर दिया. महिला के लिए उन्होंने सीट छोड़ दी. दोहों की नवीनता से प्रभावित हो महिला ने कबीर से पूछा, ये किसके दोहे गुनगुना रहे थे आप ? कबीर ने कहा यहाँ मेरा क्या है. जो है सब कुछ उन्हीं का है (ऊपर की तरफ इशारा करते हुए). देवी समझ गयी कि ये इन्हीं के स्वरचित दोहे हैं. महिला ने कबीर से कहा, आप तो साहित्यकार हैं. यहाँ क्या कर रहे हैं ? तो कबीर ने कहा वह जो करा लें (ऊपर की तरफ इशारा करते हुए). महिला ने बताया वह भी लेखन व्यवसाय से ही जुडी हैं. मेरी गाड़ी अचानक खराब हो गयी तो मुझे इस बस में चढ़ना पड़ा.
महिला ने कबीर को अपना विजिटिंग कार्ड पकड़ा दिया और कहा कि कृष्ण पक्ष में मुझे अवश्य फोन कीजियेगा नहीं तो वो आप से नाराज हो जायेंगे (ऊपर की तरफ इशारा करते हुए). उन्होंने ही मुझे भेजा है. कबीर कृष्ण पक्ष आने तक सोचते रहे, कई पत्र-पत्रिकाओं में उनका नाम और फोटो कबीर ने देखा. हालांकि उनकी लेखनी को कबीर ठीक से नहीं समझ पाते थे, फिर भी पढ़ते जरूर थे. कृष्ण पक्ष एक दो दिन बीत जाने के बाद कबीर ने पी.सी.ओ से फोन लगाया, मैडम ने फोन उठाया और बता दिया कि वो पटपड़गंज के किसी फ़्लैट में रहती हैं. फ़्लैट का पता भी दिया और रात्री के 8 बजे मिलने को कहा. कबीर की नियति ने उन्हें नियत समय पर उस देवी के समीप पहुंचा दिया. कबीर का स्वागत बड़ा भव्य हुआ. मैडम ने सिगरेट सुलगाई तो कबीर दंग रह गए. लेकिन जमाने से परिचित थे तो उन्हें कुछ बुरा नहीं लगा. धीरे से मैडम ने एक गिलास पानी में एक दवा मिलाई और कबीर को दे दिया. कबीर पी गए तो मैडम ने अंग्रेजी फिल्म चला दी. अब कबीर तो राबिनहुड हो गए. रात भर भजन कीर्तन हुआ.
सुबह कबीर रोने लगे तो मैडम ने समझा दिया कि यह सब ऊपर वाले की मर्जी से हुआ है. तब जाकर कहीं कबीर शांत हुए. फिर मैडम ने दांव खेला और बोला कि आप अभी तक कितने दोहे लिख चुके हैं ? कबीर ने बोला इक्यावन. मैडम की आँखें चमक गयीं. मैडम ने कहा, कल लाकर दीजिए मैं उनको कई समाचार पत्रों में छपवा दूँगी. तब आपको सब लोग जानेंगे. समाज में परिवर्तन होगा, देश खुशहाल होगा और लोग आप से प्रेम करेंगे. कबीर तैयार हो गए. दूसरे दिन भी शाम को कबीर मैडम के घर पहुँच गए.
दोहे सौंपकर लौटने लगे तो मैडम ने फिर ऑरेंज जूस पिला दिया. फिर हुआ दबाकर भजन कीर्तन. सुबह मैडम ने बताया कि वो एक सप्ताह के लिए शिमला जा रही हैं. कबीर ब्लूलाइन में दोहा गुनगुनाते रहे. चार पांच रोज के बाद कबीर ने अखबार में मैडम की फोटो देखा तो उछल पड़े. पढ़ने लगे तो लिखा था मैडम का दोहा संकलन आया है. कल शाम शहर के पांच सितारा होटल में इसका विमोचन हुआ. कई गणमान्य लोगों ने अपनी अभिव्यक्ति में मैडम को अमर साहित्यकार का दर्जा दिया. कई प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने एक-एक लाख कापियों का आर्डर भी दिया. यह सब पढ़ते-पढ़ते कबीर आनंद में झूमते रहे. तब तक एक सवारी आ गया, कबीर टिकट देने लगे. शाम को कबीर मैडम के घर गए, बिना फोन किये. मैडम ने दरवाजा तो खोला लेकिन कहा कि वो आज व्यस्त हैं. आगे से बिना फोन किये मत आना. तीन दिन बाद कबीर ने फोन किया तो मैडम ने फोन काट दिया. कबीर ने सौ बार फोन किया. सुबह-सुबह फिर कबीर ने फोन किया तो मैडम ने उन्हें बुलाया. कबीर जैसे ही घर में दाखिल हुए तो दो हवालदारों ने उनके कान के नीचे रपट लगाई और लेकर चले गए.
मालेस्टेशन एक्ट में कबीर अंदर हैं. साथ में टाडा भी लगा है. कोई नहीं जानता कि सच्चाई क्या है. कबीर जब अपने साथी कैदियों से कहते कि वह दोहा संकलन उनका है जो देवी जी ने चुरा लिया, तो कैदी उनपर हँसते, फब्तियां कसते. कबीर के बहुत रोने धोने पर एक दिन जेलर ने फोन पर उनकी बात देवी जी से कराई. कबीर ने पूछा ऐसा क्यों किया ? तो देवी जी ने कहा मैंने कहाँ कुछ किया, यह तो सब ऊपर वाले ने किया है. फोन कट गया.
आज के समाचार मे दिया गया है कि मैडम को दोहों के लिए एक बड़ा पुरस्कार दिया गया है. कबीर सोये हुए थे, रात्री के चौथे चरण में ईश्वर ने स्वप्न में कहा कि तैयार हो जाओ, अब तुम्हारा कार्यारम्भ करने का समय आ गया है. अब तुम संसार को समझ चुके हो. तब तक कबीर की नींद खुल गयी. दस बजे जेलर साहेब ने आकर दरवाजा खोला और कहा — कबीर ! आपको रिहा कर दिया गया है. छानबीन करने से पता चला कि आपके ऊपर केवल छेड़खानी करने का आरोप सिद्ध हुआ है. टाडा गलती से लग गया. छूटते ही कबीर ने लिखा:
मानव मानव सब कहें / मानव बने न कोय
सब मानव बन जायें तो / फिर द्वेष कहाँ से होय
यह दोहा गुनगुनाते हुए कबीर यायावर बन गए. मुझसे उनकी मुलाक़ात हुए थी. लेकिन मैं इतना व्यस्त था कि मैं उनकी बात समझ ही नहीं पाया. क्या पता, आप कुछ समझ पाएं !
- अभिषेक मानव 9818965667
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सबसे निराली शान हिंदुस्तान की
अक्षरों में ज्योति उजली , ध्वनि किरण दिनमान की है .
डा. नागेश पांडेय ' संजय ' ने सुनाया -
यह कैसा बसंत आया है ?
गूँजती तालियों से हार्दिक स्वागत

Tuesday, January 25, 2011
सह्रदय आभारी


























